MP High Court व्यभिचार के आरोपों का सच जानने बच्ची का डीएनए टेस्ट सही : हाई कोर्ट का अहम फैसला
भोपाल: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (Madhya Pradesh High Court) ने पति-पत्नी के बीच चल रहे एक जटिल विवाद में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति विवेक जैन की पीठ ने फैमिली कोर्ट (Family Court) के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें व्यभिचार (Adultery) के आरोपों की सच्चाई जानने के लिए बच्ची का डीएनए टेस्ट (DNA Test) कराने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस टेस्ट का उद्देश्य बच्ची की वैधता पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि पति द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों की पड़ताल करना है।
पत्नी की याचिका हुई खारिज, क्या है कोर्ट का तर्क?
न्यायमूर्ति विवेक जैन ने 20 जनवरी को पत्नी की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को उचित और कानूनी रूप से सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी डीएनए सैंपल (DNA Sample) देने से मना करती है, तो फैमिली कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) के तहत उसके खिलाफ प्रतिकूल अनुमान लगा सकता है। कोर्ट ने इसके मानवीय पहलू (Human Aspect) पर जोर देते हुए कहा कि यह मामला बच्चे के अधिकारों को प्रभावित करने का नहीं, बल्कि टूटे भरोसे और आरोपों की सच्चाई तक पहुंचने का है।
पति का आरोप: गर्भधारण के समय नहीं थे साथ
मामले की जड़ में भारतीय सेना (Indian Army) में तैनात पति का यह दावा है। पति का आरोप है कि अक्टूबर 2015 में पत्नी ने उन्हें कुछ दिनों के लिए घर बुलाया था। उनके लौटने के महज चार दिन बाद पत्नी ने गर्भवती होने की सूचना दी, जिससे उन्हें संदेह हुआ। बच्ची का जन्म भी अपेक्षाकृत कम समय में हुआ। इसी आधार पर पति ने तलाक (Divorce) की याचिका में दावा किया कि गर्भधारण उस समय हुआ जब वह ड्यूटी पर थे और पत्नी के साथ नहीं थे।
लंबा चला कानूनी विवाद, तीन बार दाखिल हुई तलाक की याचिका
यह कानूनी विवाद (Legal Dispute) नया नहीं है। दोनों के बीच रिश्ते में दरार के चलते अब तक तीन बार तलाक की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पहली याचिका 2019 में आपसी सहमति से खत्म हुई। उसी साल दूसरी कोशिश भी असफल रही। आखिरकार, 2021 में पति ने व्यभिचार के आधार पर तीसरी बार तलाक की याचिका (Divorce Petition) दाखिल की और डीएनए जांच (DNA Investigation) की मांग की।
फैमिली कोर्ट के 22 अगस्त के आदेश के खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसे अब खारिज कर दिया गया है। कोर्ट का मानना है कि तथ्यों के आधार पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए यह जांच आवश्यक है।
