MP News माउंट एवरेस्ट विजेताओं में ‘विक्रम पुरस्कार’ को लेकर कानूनी लड़ाई, हाईकोर्ट ने मांगी जवाब
भोपाल: मध्यप्रदेश के शीर्ष खेल सम्मान ‘विक्रम पुरस्कार (Vikram Award)’ के लिए दो माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) विजेताओं के बीच कानूनी जंग छिड़ गई है। पर्वतारोही मधुसूदन पाटीदार (Madhusudan Patidar) ने उच्च न्यायालय में एक नई याचिका दायर कर 2023 का यह पुरस्कार साथी एवरेस्ट विजेता भावना डेहरिया (Bhavana Deheriya) को दिए जाने के फैसले को चुनौती दी है।
पाटीदार, जिन्होंने 2017 में महज 20 साल की उम्र में एवरेस्ट फतह किया था, का दावा है कि वरिष्ठता के आधार पर यह पुरस्कार उन्हें मिलना चाहिए। उनकी पिछली रिट याचिका को 8 दिसंबर को एकल पीठ ने खारिज कर दिया था, जिसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय (High Court) की खंडपीठ में रिट अपील (Writ Appeal) दायर की है।
हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर को तय की अगली सुनवाई
न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति बिनोद कुमार द्विवेदी की पीठ ने बृहस्पतिवार को इस मामले की संक्षिप्त सुनवाई की और अगली सुनवाई के लिए 15 दिसंबर की तारीख तय की। पाटीदार ने अंतरिम राहत के तौर पर अदालत से गुहार की है कि डेहरिया को पुरस्कार प्रदान करने पर रोक लगाई जाए।
“वरिष्ठता को किया नजरअंदाज”
पाटीदार की रिट याचिका (Writ Petition) में दावा किया गया है कि पर्वतारोहण (Mountaineering) के क्षेत्र में उनकी वरिष्ठता और उपलब्धियों को “मनमाने और भेदभावपूर्ण तरीके” से नजरअंदाज किया गया है। उनका तर्क है कि मध्यप्रदेश पुरस्कार नियम 2021 (Madhya Pradesh Awards Rules 2021) के तहत साहसिक खेलों की श्रेणी में यह पुरस्कार उन्हें मिलना चाहिए।
एकल पीठ ने कहा था – “पात्र नहीं”
इससे पहले, एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा था कि आठ साल पहले एवरेस्ट फतह करने वाले पाटीदार 2023 के विक्रम पुरस्कार के लिए पात्र ही नहीं थे, क्योंकि नियमों के अनुसार पिछले पांच वर्षों में निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन जरूरी है। अदालत ने माना कि सरकार का फैसला सही है।
2022 में नहीं दिया गया था पुरस्कार
अपनी अपील में पाटीदार का एक प्रमुख तर्क यह भी है कि सरकार ने 2022 में साहसिक खेलों की श्रेणी में विक्रम पुरस्कार दिया ही नहीं, इसलिए 2023 का पुरस्कार उन्हें मिलना चाहिए।
विक्रम पुरस्कार राज्य का सर्वोच्च खेल सम्मान है, जो 1972 से दिया जा रहा है। इसे पाने वाले खिलाड़ी को दो लाख रुपये, स्मृति चिह्न और अक्सर शासकीय नियुक्ति भी मिलती है। अब अदालत का अगला फैसला ही तय करेगा कि यह सम्मान किसके नाम होगा।
