मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आपराधिक मामलों की लाइव स्ट्रीमिंग पर लगाई रोक
अदालती कार्यवाही के दुरुपयोग रोकने हेतु अंतरिम आदेश
भोपाल, 14 सितंबर 2025 – मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) ने सोमवार से आपराधिक मामलों की सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग (Live Streaming) पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी है। यह महत्वपूर्ण निर्णय एक जनहित याचिका (Public Interest Litigation) पर सुनवाई के बाद लिया गया है, जिसमें अदालती कार्यवाही के सोशल मीडिया (Social Media) पर दुरुपयोग की शिकायत की गई थी।
न्यायाधीशों द्वारा तत्काल प्रभाव से रोक का आदेश
मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ (Division Bench) ने शुक्रवार को एक अंतरिम आदेश (Interim Order) जारी करते हुए कहा, “रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि अगली सुनवाई की तारीख तक आपराधिक मामलों की सुनवाई कर रही सभी पीठों की लाइव स्ट्रीमिंग तुरंत रोक दी जाए।” यह आदेश 15 सितंबर से प्रभावी हो गया है।
वेबेक्स लिंक के माध्यम से वैकल्पिक व्यवस्था
अदालत ने लाइव स्ट्रीमिंग पर रोक के साथ ही एक वैकल्पिक व्यवस्था की घोषणा की है। न्यायालय ने निर्देश दिया कि रजिस्ट्री वेबसाइट पर अनियंत्रित ‘वेबेक्स लिंक’ (Webex Link) उपलब्ध कराएगी, ताकि कोई भी व्यक्ति जो कार्यवाही देखना चाहता है, वह इसके माध्यम से ऐसा कर सके। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि वेबेक्स लिंक के माध्यम से रिकॉर्डिंग (Recording) की सुविधा प्रदान नहीं की जाएगी।
वकील द्वारा उठाए गए गंभीर आरोप
जनहित याचिका दायर करने वाले वकील अरिहंत तिवारी ने फोन पर पीटीआई को बताया कि हाई कोर्ट ने इस मामले को 25 सितंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। तिवारी ने अदालत को अवगत कराया कि अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग का कई निजी संस्थाओं द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है, जो इसकी रील्स (Reels), क्लिप्स (Clips) और मीम्स (Memes) बना रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इन कार्यवाहियों को सोशल मीडिया पर गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है।
सबसे ज्यादा देखी जाने वाली अदालती कार्यवाही
वकील तिवारी ने एक महत्वपूर्ण तथ्य का खुलासा करते हुए कहा, “मैंने अदालत को यह भी बताया कि कुछ अनुमानों के अनुसार, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ऑनलाइन अदालती कार्यवाही को देश में सबसे ज्यादा देखा जाता है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि इसके गलत इस्तेमाल को रोका जाना चाहिए। यह निर्णय न्यायिक पारदर्शिता (Judicial Transparency) और डिजिटल युग में अदालती कार्यवाही की गरिमा बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
अगली सुनवाई 25 सितंबर 2025 को निर्धारित है।
