आपकी किस्मत नंबी नारायण जैसी… 14 साल बाद जेल से बरी हुए MBBS छात्र की कहानी

आखिर कब तक दिनों को गिनता. 24 घंटे यूं ही एक आस में बीत जाते थे. सुबह जेलकर्मी आवाज लगाते थे तो उठ जाते थे उसके बाद वही दिनचर्या खाना-पीना थोड़ा जेल के अंदर काम करना. उसके बाद अपनी बैरक में वापस आना और एक उम्मीद के साथ कि अगले दिन जब सूरज उगेगा तो उसकी जिंदगी का अंधेरा भी कम होगा मगर ये सोचते-सोचते 14 साल बीत गए. गुनाह भी ऐसा था जो उसने किया नहीं था. अब वो सिर्फ कैलेंडर को देखकर मुस्कराता था लेकिन इसके कोई मायने नहीं रह गए थे. वक्त के साथ उम्मीद ने भी जवाब दे दिया. फिर लगने लगा कि शायद किस्मत को यही मंजूर होगा. ये कहानी है MBBS के छात्र चंद्रेश मार्सकोले की. जोकि अपनी मेडिकल स्टडी के अंतिम साल में था. तभी एक झटके में उसका सबकुछ उजड़ गया. अपनी गर्लफ्रेंड की हत्या के आरोप में 14 साल जेल में बिताने पड़े. मगर जब हकीकत सामने आई तो पता चला कि उसने वो गुनाह किया ही नहीं था.
भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाले चंद्रेश मार्सकोले को सितंबर 2008 में प्रेमिका की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था. उस वक्त चंद्रेश मार्सकोले एमबीबीएस अंतिम वर्ष के छात्र थे. इसके बाद कोर्ट में तारीखें लगती गईं, बहस और दलीलों के बीच जिंदगी तम तोड़ रही थी. इसी साल मई महीने में उसको रिहा कर दिया गया. उसकी उम्र 36 है. अदालत ने माना है कि मामले की जांच गलत तरीके से की गई. मार्सकोले बालाघाट जिले के वारासोनी के एक गोंड आदिवासी समुदाय से आते हैं. जब मेडिकल में उनका सेलेक्शन हुआ तो पूरे समुदाय को उनपर गर्व हुआ. परिवार को लगा अब हमारा बच्चा डॉक्टर बनेगा. मगर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था. उन पर प्रमिका श्रुति हिल हत्या का आरोप लगा और अदालत ने उनको उम्रकैद की सजा सुनाई. इसी साल आठ मई को हाईकोर्ट ने सभी आरोपों से बरी करते हुए उनकी तुलना इसरो वैज्ञानिक नंबी नारायणन के साथ की, जिन्हें जासूसी के लिए झूठा फंसाया गया था. कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को मुआवजे के तौर पर 42 लाख रुपये भुगतान करने का आदेश दिया था.
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने किया था बरी
जस्टिस अतुल श्रीधरन और सुनीता यादव के 78 पन्नों के आदेश में पुलिस और उनकी जांच के खिलाफ कड़ी आलोचना की गई. जस्टिस ने उनकी वैज्ञानिक नंबी नारायणन के भाग्य से तुलना की. दोनों न्यायाधीशों ने कहा कि इस मामले में अपीलकर्ता ने बहुत कठिनाई के साथ वक्त बिताया मगर संविधान में विश्वास रखने के लिए धन्यवाद किया. जजों ने कहा कि वो एमबीबीएस के चौथे वर्ष में था. वह एक पूर्ण चिकित्सक अपने परिवार के लिए एक सहारा और समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत बनने की कगार पर था. हालांकि इस मामले के कारण उनका पूरा जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. एचसी ने 4 मई को कहा, ‘वह एक प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण जांच की वेदी पर सत्य की बलि चढ़ाने का शिकार हुआ है. राज्य सरकार को 90 दिनों के भीतर उसे 42 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया, जिसमें विफल रहने पर ब्याज लगाया जाएगा। 9% प्रति वर्ष पर.’
न मुआवजा मिला ने डिग्री का भरोसा
मार्सकोले 9 मई को भोपाल सेंट्रल जेल से रिहा हुए. छह महीने बीत चुके हैं लेकिन न तो गृह विभाग ने हाईकोर्ट के आदेश का पालन किया है और न ही चिकित्सा शिक्षा विभाग यह स्पष्ट कर पाया है कि वह एमबीबीएस फिर से शुरू कर सकता है या नहीं. वहीं श्रुति का असली कातिल अभी भी अज्ञात है. मार्सकोले ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए कहा, ‘मैं अपनी लड़ाई लड़ूंगा. मैं अपनी पढ़ाई खत्म करना चाहता हूं और प्रैक्टिस शुरू करना चाहता हूं. चिकित्सा शिक्षा विभाग ने मेरी मेडिकल डिग्री को जारी रखने के लिए मेरा आवेदन राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग नई दिल्ली को भेज दिया है. मुझे नहीं पता कि इसमें कितना समय लगेगा. मेरे लिए हर दिन महत्वपूर्ण है. मैं पहले ही 14 साल खो चुका हूं.’
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
एडिशनल डीसीपी राम सनेही मिश्रा ने कहा कि राज्य सरकार ने उनके बरी होने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और मेडिकल एजुकेशन डिपार्टमेंट इस बात को लेकर असमंजस में है कि मार्सकोले को एमबीबीएस पूरा करने की अनुमति दी जाए या नहीं. चिकित्सा शिक्षा निदेशक (डीएमई) जितेंद्र शुक्ला ने कहा कि मार्सकोले अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं क्योंकि उन्हें बरी कर दिया गया है. कोई भी व्यक्ति अपनी पढ़ाई जारी रख सकता है इसमें कोई प्रतिबंध नहीं है. उन्होंने कहा कि मार्सकोले का आवेदन नहीं आया है. हालांकि, एक अन्य अधिकारी ने कहा कि 2015 में नियम बदले गए और एमबीबीएस को 10 साल में पूरा करना होगा.
हर दिन कैसे काटे हम ही जातने हैं- पिता
मार्सकोले के पिता जुग्राम मार्सकोले दुआ कर रहे हैं कि उन्हें मेडिकल की डिग्री मिल जाए. वे कहते हैं कि पिछले 14 साल बुरे सपने थे. आज भी ऐसा लगता है जैसे कोई अंत न हो. जुग्राम ने कहा, “मैं बालाघाट में था जब मुझे भोपाल पुलिस से फोन आया कि मेरे बेटे को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है. हम तबाह हो गए थे. केवल हम ही जानते हैं कि हम उस दिन से कैसे पीड़ित और जीवित रहे हैं. मिल के पूर्व कर्मचारी ने कहा उनकी सारी मेहनत की कमाई चंद्रेश का मुकदमा लड़ने में चली गई. पिछले 10 साल से चंद्रेश के बड़े भाई विमल की कमाई पर परिवार का गुजारा चल रहा है. मेरे बेटे को झूठे मामले में फंसाया गया. वह जीवन में दूसरा मौका पाने का हकदार है.