योगी जी, कुछ तो कीजिए! नोएडा का ‘वेद वन’ बनता जा रहा है फूहड़पन का अड्डा

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में पिछले साल वेद वन पार्क बनाया गया। सनातन संस्कृति और वेदों की थीम पर बने इस पार्क को बनाने के लिए नोएडा अथॉरिटी ने करोड़ों खर्च कर दिए। इस पार्क की खूबसूरती, यहां की थीम, लाइट, फब्बारे सब कुछ शानदार हैं। रात में वेदों का महत्व बताता लाइट शो किसी को भी मोहित करने की ताकत रखता है। लेकिन साल भर पहले बने इस वेद वन पार्क में माहौल बदल गया है। आप यहां जाएंगे तो वेदों से ज्यादा रील्स बनाने वाले दिख जाएंगे। पूरे पार्क में जहां-तहां नंगा नाच करने वाले इन नमूनों के दर्शन आपको हो जाएंगे। अगर आपके साथ बच्चे हैं तो हाथ से उनकी आंख मीचने की नौबत भी आ सकती है। भारतीय संस्कृति और वेदों के महत्व को दर्शाने वाला यह पार्क धीरे-धीरे अश्लीलता और फूहड़पन का अड्डा बनता जा रहा है। योगी जी! जरा इस ओर भी ध्यान दीजिए, वेद वन को बचा लीजिए।न सुरक्षाबल तैनात, न मैनेजमेंट का ध्यान पूरे पार्क में न सुरक्षाबल तैनात हैं, न ही मैनेजमेंट के पर्याप्त लोग। इसका फायदा उठा कर आत्ममुग्ध और इंस्टाग्राम की दुनिया में खोए हुए कथित इन्फ्लुएंसर सारी हदें पार कर रहे हैं। जिस पार्क में लोगों को शांति का अनुभव होना चाहिए, वहां परिवार के साथ जाना भी दुश्वार होता जा रहा है। वेद वन पार्क के गेट से एंट्री लेते ही सप्त ऋषियों की मूर्तियां दिख जाएंगी। पार्क में लगी फुलवाड़ी को देखेंगे तो आपको कल्पवृक्ष के पेड़ देखने को मिलेंगे। ये वही कल्पवृक्ष हैं, जिन्हें देवताओं का पेड़ माना जाता है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन से कल्पवृक्ष निकला। मान्यता ये भी है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा की इच्छा को पूरा करने के लिए इस कल्पवृक्ष को धरती पर लाए थे। ऐसा भी माना जाता है कल्पवृक्ष भगवान कृष्ण का ही अवतार हैं। ऋषियों की तपस्या के प्रतीक कल्पवृक्ष के आगे इस पार्क में फूहड़पन परोसा रहा है। दुख की बात है कि जिन कथित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को वेद वन के महत्व के बारे में बताना चाहिए था, वो यहां ‘बंदूक चलेगी रे… बंदूक चलेगी’ पर ठुमका लगा रहे हैं। हद तो तब हो गई जब पार्क के सेंटर में एक बोर्ड लगाया गया, जिसके आगे ऊंची पेंट पहने तमाम इन्फ्लुएंसर ठुमके लगा रहे थे। पार्क आने वाले छोटे बच्चों पर क्या पड़ेगा असर?एक और ये रंगारंग कार्यक्रम चल रहा था, तो दूसरी ओर एक 3-4 साल का बच्चा अपनी मां का हाथ पकड़े इसे बड़े गौर से देख रहा था। शायद उसे लगा होगा कि पार्क ऐसे ही रील्स बनाने के लिए होते होंगे। आजादी के नाम पर कुछ भी कैसे चल सकता है? अगर ये शहर का कोई आम पार्क होता तो समझ भी आता, लेकिन जिस पार्क का नाम ‘वेद वन’ हो वहां ये सब कैसे हो सकता है? ये सवाल न सिर्फ मैनेजमेंट के लोगों से नहीं बल्कि समाज से भी है।टेक्नॉलजी और संस्कृति के समावेश से बना है पार्कवेद वन पार्क में चारों वेदों के बोर्ड लगे हैं। उन पर शानदार कारीगरी की गई है। 12 एकड़ में फैला वेद वन सप्तऋषियों के क्षेत्र में बंटा हुआ है। यानी सातों ऋषियों के नाम पर पार्क में छोटे-छोटे स्थान बनाए गए हैं। इनमें कश्यप, भारद्वाज, अत्रि, विश्वामित्र समेत सातों ऋषियों के बारे में जानकारी है। प्राचीन काल में गुरुकुल पद्धति के बारे में भी यहां बेहद खास तरीके से समझाने की कोशिश की गई है। पार्क के सेंटर में एक तालाब बनाया गया है जिसमें फब्बारे चलते हैं। इसके सामने अगस्त्य ऋषि की कलाकृति है। इस पार्क में वो सबकुछ है जो किसी भी व्यक्ति को भारतीय वेद-शास्त्रों और सप्तऋषियों के बारे में पर्याप्त जानकारी दे सके। यहां की हरियाली और सुंदरता भी लाजवाब है। रात में लेजर शो भी चलता है। लेकिन दुख की बात है कि टेक्नॉलजी और संस्कृति के समावेश से बना ये पार्क तेजी से फूहड़पन का अड्डा बनता जा रहा है। बिना टिकट दीवार फांदकर घुस रहे लोग वेद वन पार्क में काम करने वाले एक कर्मचारी ने नाम ने लेने की शर्त पर बताया कि यहां कई लोग बिना टिकट के ही घुस आते हैं। पार्क की दीवारें छोटी हैं, आसपास के लोग इसे फांदकर आसानी से अंदर घुस जाते हैं। दीवारों को ऊंचा करने का प्रस्ताव नोएडा अथॉरिटी के पास लंबित है। सवाल ये है कि जब करोड़ों रुपये के इस पार्क को बनाया जा रहा था तो पहले से दीवारें ऊंची क्यों नहीं की गईं? इस तरह तो पार्क में परिवार के साथ घूमने आने वाले लोगों की सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है। पार्क के बाहर खड़े यूपी पुलिस के एक जवान ने बताया कि उनकी ड्यूटी आगे चौराहे पर है। नोएडा अथॉरिटी की तरफ से पुलिस से सुरक्षा नहीं मांगी गई है, इसलिए पार्क में पुलिस बल की तैनाती नहीं है।वेद वन पार्क में मैनेजमेंट की लापरवाही साफ तौर पर देखी जा सकती है। इसी का नतीजा है कि कुछ नमूने पार्क के अंदर खुलेआम फूहड़पन का प्रदर्शन करने से नहीं चूक रहे। हमें किसी के टैलेंट से दिक्कत नहीं है। अगर अच्छे डांसर हैं तो खूब नाचिए कौन मना कर रहा है? आप नच बलिए जैसे रियलिटी शो में जाइए। नोएडा का नाम रोशन करिए। सबको आप पर नाज होगा, लेकिन ये क्या चल रहा है? क्या आप अपने घर के मंदिर में जूता पहनकर सपना चौधरी के गाने पर ऐसे ही ठुमका लगाते हैं, जैसे यहां लगा रहे हैं? किसी का इस ओर ध्यान नहींआप चाहते तो वेद वन जैसे ऐतिहासिक पार्क के महत्व के बारे में बता सकते थे। आर्यभट्ट की खोज पाई के बारे में बता सकते थे। हमारे सूर्य सिद्धांत पर रील्स बना सकते थे। इन सबके बारे में पार्क में दर्शाया गया है लेकिन सेल्फी स्टिक और स्पीकर लेकर आने वाले इन इन्फ्लुएंसर को शायद ये सब पुरानी और बेबुनियादी बातें लगती हैं। उन्हें तो रील्स बनाने से मतलब है। इसमें गलती सोशल मीडिया की नहीं है। सोशल मीडिया तो महज एक माध्यम है। आप इसे जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर कोई सब्जी काटने वाले चाकू से अपनी नाक काट रहा है तो गलती चाकू की नहीं उसकी विक्षिप्त सोच की है। ठीक वैसे ही सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी है। आप चाहे फूहड़पन कर लो या फिर अपनी संस्कृति को समझने की कोशिश। लेकिन यह बेहद गंभीर मुद्दा है, जो धीरे-धीरे और जटिल बनता जा रहा है। इस पर सरकार और प्रशासन को तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। उससे भी ज्यादा समाज को सोचना होगा कि आखिर कब तक हर गलती को यह सोचकर बर्दाश्त किया जाएगा कि सरकार देख लेगी।