Yes Milord: बिलकिस के दोषियों को फिर जाना होगा जेल, एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा रहेगा या जाएगा, जानें इस हफ्ते कोर्ट में क्या कुछ हुआ

सुप्रीम कोर्ट से लेकर लोअर कोर्ट तक के वीकली राउंड अप में इस सप्ताह कानूनी खबरों के लिहाज से काफी उथल-पुथल वाला रहा है। सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले नए कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे पर सात जजों की संविधान पीठ में शुरू हुआ मंथन। बिलकिस बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार का फैसला पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिट एंड रन दुर्घटना पीड़ितों को मुआवजा योजना के बारे में सूचित करना चाहिए। इस सप्ताह यानी 08 जनवरी से 13 जनवरी 2024 तक क्या कुछ हुआ? कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट और टिप्पणियों का विकली राउंड अप आपके सामने लेकर आए हैं। कुल मिलाकर कहें तो आपको इस सप्ताह होने वाले भारत के विभिन्न न्यायालयों की मुख्य खबरों के बारे में बताएंगे।चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के कानून पर SC की रोक नहींमुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए गए कानून पर रोक लगाने से शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया। साथ ही इसे चुनौती देने वाली अर्जी पर सुनवाई के लिए, सहमति दे दी और सरकार को नोटिस जारी किया। नए कानून में सेलेक्शन पैनल में चीफ जस्टिस को नहीं रखा गया है। अर्जी देने वाली कांग्रेस नेता जया ठाकुर के वकील ने कहा, ‘इस कानून पर रोक लगाएं। यह अधिकारों के वंटवारे के खिलाफ है।’ कोर्ट ने कहा, ‘दूसरे पक्ष को सुने विना ऐसा नहीं कर सकते।इसे भी पढ़ें: फलस्तीनियों के नरसंहार के आरोपों पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में इजराइल ने किया अपना बचावएएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा रहेगा या जाएगासुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान है या नहीं, ये चीज कैसे मायने रखती है, क्योंकि यूनिवर्सिटी अल्पसंख्यक टैग के विना भी राष्ट्रीय महत्व का संस्थान बनी हुई है। एएमयू का अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा काफी समय से विवाद का विषय वना हुआ है। पांच जजों की संविधान पीठ ने साल 1967 में एस अजीज वाशा वनाम भारत संघ मामले में फैसला दिया था कि चूंकि एएमयू एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है, इसलिए इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना जा सकता। 1981 में एक संशोधन के जरिए सर्वोच्च अदालत के फैसले को उलटकर एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दे दिया गया। बता दें कि बुधवार को अदालत ने हैरानी जताई थी कि एएमयू की 180 मेंबर वाली गवर्निंग काउंसिल में महज 37 मुस्लिम सदस्य हैं। ऐसे में इसे अल्पसंख्यक क्यों माना जाता है।बिलकिस केस के 11 दोषियों की रिहाई रद्दसुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो गैंगरेप के 11 दोषियों को वक्त से पहले रिहा करने के राज्य सरकार के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने दोषियों को दो हफ्ते में सरेंडर करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने दोषियों की रिहाई का आदेश विना सोचे- समझे पारित किया। कोर्ट ने कहा कि एक राज्य में अपराधी के खिलाफ मुकदमा चलाया जाता है तो वही राज्य सजा में छूट पर फैसला लेने में सक्षम है। केस महाराष्ट्र में चलाया गया। गुजरात सरकार ने उन शक्तियों का इस्तेमाल किया जो उसके पास थी ही नहीं। इस आधार पर उसके माफी के आदेश को खारिज किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 13 मई, 2022 को दिए अपनी एक वेंच के उस आदेश को अमान्य माना जिसमें सजा माफी की अर्जी पर राज्य सरकार से विचार को कहा गया। कोर्ट ने कहा कि यह अदालत से धोखाधड़ी करके और तथ्यों को छिपाकर हासिल किया गया था। इस आदेश का लाभ उठाकर अन्य दोषियों ने भी सजा में छूट की अर्जी दे दी। गुजरात सरकार की इसमें मिलीभगत थी। उसने दोषियों में से एक के साथ मिलकर काम किया था।इसे भी पढ़ें: मुआवजा बढ़ाने पर विचार करे केंद्र, हिट एंड रन मामलों में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसलाहिट एंड रन मामलों में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसलासुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र को हिट-एंड-रन दुर्घटनाओं के पीड़ितों को दिए जाने वाले मुआवजे को बढ़ाने के लिए मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन करने पर विचार करने का निर्देश दिया, साथ ही सरकार को याद दिलाया कि समय के साथ पैसे का मूल्य कम हो जाता है। मोटर वाहन अधिनियम पीड़ितों को हिट-एंड-रन दुर्घटनाओं के दौरान मृत्यु के मामले में ₹2 लाख और चोटों के लिए ₹50,000 का मुआवजा देने की अनुमति देता है। न्यायाधीश एएस ओक की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हम केंद्र सरकार को इस पर विचार करने का निर्देश देते हैं कि क्या मुआवजे की राशि को धीरे-धीरे सालाना बढ़ाया जा सकता है। केंद्र सरकार आज से आठ सप्ताह के भीतर इस मुद्दे पर उचित निर्णय लेगी। सुप्रीम कोर्ट ने वकील को दिया सभी जजों से माफी मांगने का आदेशसुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक वकील को उन न्यायाधीशों से बिना शर्त माफी मांगने को कहा, जिन्हें उसने निशाना बनाया था। इस वकील को दिल्ली हाई कोर्ट एवं राष्ट्रीय राजधानी की जिला अदालतों के कई न्यायाधीशों के खिलाफ ‘दुर्भावनापूर्ण, अवांछित एवं बेबुनियाद टिप्पणियां’ करने को लेकर आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया गया था और छह माह की कैद की सजा सुनायी गयी थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने नौ जनवरी को इस वकील को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया था और छह माह कैद की सजा सुनायी थी एवं 2000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था।