मुस्लिम शिक्षक के लिए आशीर्वाद की कामना, वीलचेयर से 300 किमी चलकर जा रहे सबरीमला मंदिर

कोच्चि: अमंगट्टुचलिल कन्नन सबरीमला के दर्शन करने के लिए निकले हैं। उन्होंने अपनी यात्रा मलप्पुरम से शुरू की है और तीर्थयात्रा पर निकले उन्हें 10 दिन हो चुके हैं। आप सोचेंगे कि 10 दिन में वह सबरीमला नहीं पहुंच पाए तो जवाब है हां… क्योंकि कन्नन विकलांग हैं और अपनी यह कठिन यात्रा वीलचेयर पर कर रहे हैं। वह दर्शन करने भी अपने लिए भी अपनी मुस्लिम टीचर के लिए जा रहे हैं।

कन्नन ने कई साल पहले एक दुर्घटना में अपना बायां पैर खो दिया था और उनका दूसरा पैर आंशिक रूप से लकवाग्रस्त हो गया था। उनकी तीर्थयात्रा का मकसद उस मुस्लिम शिक्षक के लिए भगवान अयप्पा का आशीर्वाद लेना है। जब उनका सब कुछ खो गया था तब उन्हें टीचर ने उन्हें अपने सिर पर छत दिलाने में मदद की थी।

2013 में कटा था पैर

कन्नन दिहाड़ी मजदूरी करते थे। 3 दिसंबर, 2013 को एक लॉरी से लकड़ी के लट्ठे उतारते समय कन्नन ने अपना बायां पैर खो दिया था। उसका एक पैर कट गया था। तीन बेटियों और एक बेटे के पिता को अपनी जीविका चलाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था। कोंडोट्टी के गवर्नमेंट कॉलेज में असिस्टेंट प्रफेसर, और कॉलेज में राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई की समन्वयक एमपी समीरा ने उनकी मदद की। उनके लिए एक घर का निर्माण किया।

अयप्पा से मांगेंगे आशीर्वाद

कन्नन ने कहा, ‘यह समीरा टीचर ही थीं जिन्होंने मेरी जिंदगी बदल दी, और वह मेरे और मेरे परिवार के लिए भगवान के बराबर हैं। मैं अयप्पा का प्रबल भक्त हूं। यह यात्रा समीरा टीचर के लिए है। मुझे विश्वास है कि अगर मैं सबरीमाला में ईमानदारी से प्रार्थना करता हूं तो भगवान अयप्पा उन पर आशीर्वाद बरसाएंगे।’

इस तरह कर रहे सफर

15 दिसंबर को 49 वर्षीय कन्नन थडप्पारम्बा गांव से सबरीमाला के लिए निकले थे। उन्होंने कहा, ‘मैं आमतौर पर हर दिन सुबह 6 बजे व्हीलचेयर पर अपनी यात्रा शुरू करता हूं और यह दोपहर तक चलती है। सबरीमाला तीर्थयात्रियों के लिए मंदिरों या अन्नदानम काउंटरों से दोपहर का भोजन करने के बाद, मैं आराम करता हूं और थोड़ी नींद लेता हूं। यात्रा लगभग शाम 6 बजे शुरू होती है और रात 11 बजे तक चलती है। मैं मंदिरों में रातें बिताता हूं।’

पढ़ाई कर रहे सभी बच्चे

कन्नन ने बताया कि वह जनवरी के पहले हफ्ते में पंबा नदी पर पहुंच जाएंगे। यहां पहुंचने के बाद पैदल ही अयप्पा मंदिर तक चढ़ने की योजना बनाई। कन्नन की बड़ी बेटी पैरामेडिकल की छात्रा है जबकि अन्य अभी भी स्कूल में हैं। कन्नन की पत्नी सतीदेवी एक होटल में सफाई का काम करती हैं। हाल तक वह परिवार के लिए एकमात्र कमाने वाली थीं। पिछले महीने से कन्नन ने अपनी आय बढ़ाने के लिए लॉटरी टिकट बेचना शुरू किया।

प्रो समीरा ने कहा, ‘उनके लिए एक घर बनाने में मदद करने के चार साल बाद भी, भारी बारिश होने पर कन्नन अक्सर मुझे फोन करते हैं और मुझे धन्यवाद देते हैं। वह कहते हैं कि यह मेरी वजह से है कि वह बिना किसी डर के सो सकते हैं।’ समीरा ने कहा कि कन्नन ने हाल ही में नीलांबुर कॉलेज के एनएसएस शिविर में चावल का एक बोरा दान किया। जब वह चावल का पैकेट लेकर आए, तो उन्होंने मुझसे कहा कि गरीबों के लिए घर बनाना कभी बंद मत कीजिएगा।