तेजस्वी यादव पर मेहरबानी और सत्ता सौंपने की बेचैनी में क्यों हैं नीतीश कुमार? इनसाइड स्टोरी

पटना: व्यंग्यात्मक लहजे में बिहार में कुर्सी कुमार के नाम से मशहूर नीतीश कुमार अपने नए साथी आरजेडी के नेता और फिलवक्त उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को बिहार की कमान सौंपने के लिए इतने बेचैन क्यों हैं। कुर्सी के लिए समय-समय पर पाला बदलने वाले नीतीश कुमार का नामकरण जिस आरजेडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने पलटू राम रखा था, उन्हें भी नीतीश की इस बार की पलटी पर भरोसा कैसे हो गया है। और आखिर में क्या सचमुच नीतीश कुमार तेजस्वी को अपने मन से कुर्सी सौंप रहे हैं या कोई बड़ी मजबूरी है उनके सामने। ऐसे कई सवाल बिहार की राजनीति में पिछले तीन-चार दिनों से तैर रहे हैं। कुर्सी के लिए उन्होंने कभी बीजेपी तो कभी आरजेडी का साथ पसंद किया। कुर्सी के लिए ही अपने साथी जीतन राम मांझी को किनारे किया। अब उनके सामने ऐसी कौन-सी मजबूरी आ गयी है कि वह बिना किसी दबाव के अपनी कुर्सी तेजस्वी यादव को सौंपने को तैयार हो गये हैं। आइए जानते हैं, अंदर की कहानी।

लाचार हो गये हैं नीतीश कुमार!

सच बात यह है कि अपने दरकते जनाधार से नीतीश कुमार परेशान हैं। कभी बिहार में सुशासन के लिए चर्चित हुए नीतीश कुमार भले ही 6-7 प्रतिशत कुर्मी-कुशवाहा वोटरों के नेता के रूप में उभरे हों, लेकिन बाद में उन्होंने अपना जनाधार बढ़ा लिया। उनकी पैठ तकरीबन सभी जातियों के वोटरों में हो गयी। यहां तक कि आरजेडी के कोर वोटर मुस्लिम-यादव और दलित-पिछड़ों को साधने की उन्होंने कोशिश की। दलित-महादलित और पसमांदा मुसलमानों को खांचे में बांट कर वोट बैंक बढ़ाने में वे कामयाब भी रहे। लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में महज 43 सीटें आने पर उन्हें एहसास हुआ कि उनका कोर वोट बैंक दरक गया है। दरअसल, नीतीश का कोर वोटर वही था, जो पहले आरजेडी का हुआ करता था। मुसलमानों में अगड़े-पिछड़े और दलितों में दलित-महादलित का खांचा बना कर उन्होंने उन्हीं वोटरों को साधने की कोशिश की, जो परंपरागत तौर पर लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले आरजेडी के थे।

यही वजह रही कि 2015 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी के साथ जेडीयू ने जब चुनाव लड़ा तो तकरीबन बराबर सीटें उनकी भी पार्टी को मिलीं। डेढ़ साल बाद ही उन्होंने आरजेडी से पिंड छुड़ा लिया और बीजेपी के साथ सरकार बना ली। उनकी आंख तब खुली, जब 2020 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के 43 विधायक जीते और सहयोगी बीजेपी के ड्योढ़ा से कुछ अधिक। इसे नीतीश कुमार ने बीजेपी की साजिश समझी। इसलिए कि रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान ने सिर्फ जेडीयू उम्मीदवारों के खिलाफ ही अपने प्रत्याशी दिये, जो कभी एनडीए का ही हिस्सा थे और एनडीए से अलग होने के बावजूद नरेंद्र मोदी के लिए खुद को हनुमान बता रहे थे।

कुढ़नी उपचुनाव ने बची कसर निकाल दी

आरजेडी और जेडीयू का समान वोट बैंक होने के कारण उन्होंने बीजेपी से नाता तोड़ आरजेडी का साथ लेने का निर्णय ले लिया। राजनीतिक हलके में उसी वक्त से यह बात तैर रही थी कि आरजेडी और जेडीयू के बीच जो समझौता हुआ है, उसके मुताबिक नीतीश 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अपने को बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को गोलबंद करने का काम में लगायेंगे और कुछ दिनों बाद वे तेजस्वी यादव को बिहार की कमान सौंप देंगे। नीतीश को सबसे बड़ा झटका कुढ़नी विधानसभा उपचुनाव में लगा। उन्होंने अपने दल के उम्मीदवार के लिए आरजेडी से सीट तो ले ली, लेकिन कई दलों के समर्थन के बावजूद अकेली लड़ी बीजेपी से उनका उम्मीदवार हार गया। अपने-परायों की आलोचना और कुढ़नी में हार से नीतीश कुमार को एहसास हो गया है कि बिहार की राजनीति में अब उनकी छवि चुनाव जिताऊ नेता की नहीं रही।

नीतीश ने नालंदा में कर दी घोषणा

नालंदा में एक डेंटल कॉलेज के उद्घाटन के दौरान नीतीश ने बिहार के भावी मुख्यमंत्री के रूप में तेजस्वी यादव के नाम की घोषणा कर दी। बिना किसी लाग लपेट के नीतीश ने कहा कि अब तेजस्वी ही उनके कामों को आगे बढ़ायेंगे। अब वह खुद सीएम रहना नहीं चाहते। उन्हें पीएम पद की भी कोई लालसा नहीं है। हां, बिहार की जिम्मेदारी से मुक्त होकर वह बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दलों को गोलबंद करने में अपना समय लगायेंगे। सितंबर में यही बात आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने भी कही थी, लेकिन उनकी बात पर हंगामा बरपा था।

विपक्ष के साथ अपने भी हमलावर

दरअसल, नीतीश कुमार बढ़ती उम्र और अपने-परायों की आलोचनाओं से इतने परेशान हैं कि अब उन्हें आगे का रास्ता सूझ नहीं रहा। उनके सीएम बने रहने का नैतिक आधार भी नहीं है, इसलिए कि अपने से तकरीबन दोगुने विधायकों वाली पार्टी आरजेडी के समर्थन से वह सरकार चला रहे हैं। अपनों की आलोचनाओं का आलम यह है कि सोमवार से शुरू हुए विधानसभा के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन जेडीयू विधायक संजीव कुमार ने अपनी ही सरकार पर सवाल खड़े कर दिये। उन्होंने कहा कि बिहार में शराबबंदी फेल है। शराबबंदी की समीक्षा होनी चाहिए। शराबबंदी के नाम पर पुलिस दलितों और अति पिछड़ों पर अत्याचार कर रही है। पुलिस की मिलीभगत के कारण ही बिहार में शराब की खेप ट्रकों में भर-भर कर आ रही है। शराबबंदी को लेकर आरजेडी के एक पूर्व विधायक ने भी लगभग ऐसी ही बातें कही थीं। सरकार में सहयोगी हम के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी भी समय-समय पर शराबबंदी पर बोलते रहे हैं।

इधर आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के बेटे पूर्व मंत्री सुधाकर सिंह से नीतीश की तनातनी जगजाहिर है। सुधाकर सिंह की नीतीश से नाराजगी का आलम यह है कि उनके पिता जगदानंद सिंह नीतीश को जहां पीएम मटेरियल के रूप में देख रहे हैं, वहीं उनके बेटे सुधाकर सिंह का कहना है कि नीतीश कुमार अगर सक्षम हैं तो प्रधानमंत्री बनें। इसके लिए मेरी उन्हें शुभकामनाएं हैं। अगर उनके अंदर काबिलियत है तो वह संयुक्त राष्ट्र संघ के सचिव बन जाएं। सुधाकर सिंह ने कहा है कि अगर नीतीश कुमार सक्षम हैं तो जनता के सामने खुद को साबित करें।

विपक्ष का तो काम ही है हमला करना

विपक्ष तो हमेशा सत्ता पक्ष पर हमलावर रहता है। हमले का कोई भी मौका वह गंवाना नहीं चाहता। विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार पर जमकर हमला बोला है। सम्राट ने कहा कि नीतीश कुमार बिहार में अब अप्रासंगिक हो गए हैं। उनके पास तो किसी भी समुदाय का वोट बैंक अब रहा ही नहीं। यही वजह है कि वह बार-बार तेजस्वी यादव को आगे बढ़ाने की बात कह रहे हैं।

सम्राट शराबबंदी कानून को लेकर भी बिहार सरकार पर खूब बरसे। कहा कि बिहार में 6 साल से शराबबंदी है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 6 सालों से बिहार की जनता को शराब पिला रहे हैं। बिहार में अब कानून नाम की कोई चीज़ नहीं रह गई है। जेडीयू से निकाले गये पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह तो शराबबंदी के मुद्दे पर नीतीश को घेरने में लगे हैं। आरसीपी का कहना है कि खशराबबंदी से बिहार को रोज 5-6 करोड़ का नुकसान हो रहा है। सात साल की शराबबंदी में बिहार एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठा चुका है, जबकि गांव-गांव शराब बिक रही है और लोग पी रहे हैं।

इसकी वजह से लाखों लोगों को जेल जाना पड़ा है। उनका तो यह भी दावा है कि नीतीश कुमार के गांव में भी लोग शराब पी रहे हैं। जमीनी हकीकत भी आरसीपी के दावे के अनुरूप है। शराब बिक्री का तरीका बदल गया है। घर-घर इसकी डिलीवरी दोगुने दाम पर हो रही है। पहले जिन इलाकों में एक-दो शराब की लाइसेंसी दुकानें हुआ करती थीं, वहां अब गांव-गांव में दुकानें खुल गयी हैं। बेचने वालों के साथ पुलिस वाले मालामाल हो रहे हैं। पीने वालों को दोगुना दाम चुकाना पड़ रहा है। जिन राज्यों से शराब की सप्लाई हो रही है, वहां की बिक्री लगातार बढ़ रही है। इसी में नकली शराब बनाने वालों का धंधा भी चमक गया है।

विपक्ष की गोलबंदी या संन्यास का संकेत?

नीतीश कुमार की मानें तो अब वह अपने को बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को गोलबंद करने में लगायेंगे। हालांकि उनके ही दो बयानों से यह भी संकेत मिलता है कि अब वे राजनीति से किनारा करना चाहते है। 2020 में विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने कहा था कि यह उनका आखिरी चुनाव है औऔर अब कह रहे कि उन्हें सीएम-पीएम पद की कोई लालसा नहीं।

78 साल के हो रहे नीतीश राजनीतिक संन्यास भी ले लें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। बहरहाल वे विपक्ष को एकजुट करेंगे। लेकिन अब तक की जो स्थितियां हैं, उसमें उन्हें कामयाबी मिल पायेगी, यह संदिग्ध है। भारतीय जनता पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनाव में शिकस्त देने की अब तक मुहिम नाकाम होती दिख रही है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद आंध्र प्रदेश के सीएम केसी रामचंद्रन और उसके बाद नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता की जितनी कोशिशें की, उसका कोई सकारात्मक परिणाम अब तक नहीं दिखा है। सभी ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी से अलग-अलग मुलाकात की, लेकिन कांग्रेस ने कोई भाव ही नहीं दिया। अलबत्ता कांग्रेस नेताओं ने सबकी सुनी जरूर।

नीतीश कुमार ने तो अपनी ओर से पूरी कोशिश की, लेकिन वे भी अब थके-हारे लगते हैं। जेडीयू की राष्ट्रीय समिति की बैठक के आखिरी दिन खुले सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने जिस अंदाज में अपनी बातें रखीं, उससे यही लगता है कि वे अब थक चुके हैं। उन्होंने कहा कि सभी एकजुट हो जाएंगे तो बीजेपी को भगाना मुश्किल नहीं। अगर विपक्षी दलों ने ऐसा नहीं किया तो वे जानें। नीतीश कुमार विपक्षी एकता का राग भले अलापें, पर विपक्ष को एकजुट करना टेढ़ी खीर है। कांग्रेस की ओर से अब तक कोई बयान इस बाबत नहीं आया है। अलबत्ता क्षेत्रीय दलों को जरूर लगता है कि सभी एकजुट हो गये तो जिस तरह बंगाल, बिहार और झारखंड में बीजेपी को किनारे कर दिया गया, वैसा लोकसभा चुनाव में भी हो सकता है। लेकिन यह इतना आसान नहीं है।

बिहार को ही लें तो वहां महागठबंधन में आरजेडी, जेडीयू, हम (सेकुलर), कांग्रेस और वामपंथी दल एक साथ हैं। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। इनमें 16 सीटें जेडीयू के पास हैं। अगर सभी के बीच सीटों का बंटवारा हो तो सिरफुटौवल हो जाएगा। झारखंड में भी यही स्थिति है। आरजेडी अभी से चार सीटें मांग रहा है। कांग्रेस की दावेदारी भी कम नहीं होगी। जबकि हकीकत है कि झारखंड मुक्ति मोरचा की जैसी छवि लोगों में बन रही है, वह बिना किसी का सहयोग लिए सभी सीटों पर उम्मीदवार उतार दे तो उसे नुकसान नहीं होगा। इसलिए कि उसका जनाधार बड़ा है और हेमंत सोरेन के शासन में बढ़ा भी है। ऐसे नीतीश कुमार की विपक्षी एका की कामयाबी टेढ़ी खीर लगती है।

रिपोर्ट: ओमप्रकाश अश्क (वरिष्ठ पत्रकार/स्वतंत्र लेखक)