तवांग के यांग्त्से की चोटी पर आखिर क्यों चढ़ने के लिए तड़प रहा चीन, 17 हजार फीट ऊपर ऐसा क्या खास? जानें

बीजिंग : अरुणाचल प्रदेश में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई झड़प ने एक बार फिर एलएसी पर तनाव को बढ़ा दिया है। पिछले शुक्रवार को हुई इस भिड़ंत में दोनों तरफ के सैनिक घायल हुए हैं। सैन्य सूत्रों ने सोमवार को जानकारी दी कि भारतीय जवानों ने चीनी सैनिकों के घुसपैठ के मंसूबों को नाकाम कर दिया। द ट्रिब्यून ने सूत्रों के हवाले बताया कि यह झड़प अरुणाचल प्रदेश के पश्चिमी भाग में तवांग से करीब 35 किमी उत्तर-पूर्व में यांग्त्से क्षेत्र में एलएसी के विवादित हिस्से पर हुई।

फिलहाल इसमें किसी के जान गंवाने की खबर सामने नहीं आई है। अक्टूबर 2020 में पूर्वी लद्दाख के रिनचेन ला के पास हुई झड़प के बाद से यह दोनों सेनाओं के बीच पहली हिंसक झड़प है। जून 2020 में गलवान घाटी में दोनों सेनाओं के बीच भीषण खूनी संघर्ष हुआ था। इसे थोड़ा ही पहले अप्रैल 2020 में भी पैंगोंग त्सो के पास दोनों सेनाएं भिड़ गई थीं। पीएलए के 300 सैनिक पूरी तैयारी के साथ तवांग सेक्टर में एलएसी के पास आ गए थे जिन्हें भारतीय सेना ने करारा जवाब दिया।

क्यों खास है यांग्त्से की चोटी?
अरुणाचल प्रदेश के तवांग के यांग्त्से क्षेत्र में भारत और चीनी सेना का आमना-सामना पहले भी हो चुका है। अक्टूबर 2021 में भी पीएलए के सैनिकों ने घुसपैठ की कोशिश की थी। चीन का मकसद यांग्त्से की 17,000 फुट ऊंची पर चोट पर चढ़ना और वहां कब्जा करना है। इस चोटी से एलएसी के दोनों ओर का कमांडिंग व्यू मिलता है। इससे बॉर्डर के दोनों तरफ निगरानी करना आसान हो जाता है और किसी भी गतिविधि या आवागमन पर नजर रखी जा सकती है। फिलहाल चोटी और उस तक पहुंचने वाले रास्तों पर भारत का अपनी ओर से पूरा नियंत्रण है।

17,000 फुट ऊंची चोटी पर चीन की नजर
रणनीतिक रूप से भी यह चोटी बेहद अहम है। चीन की नजर इस 17,000 फुट ऊंची चोटी पर है जिस पर कब्जे का वह बार-बार प्रयास कर रहा है। यांग्त्से क्षेत्र में हुई हालिया झड़प भी ऐसा ही एक प्रयास था। दो साल पहले गलवान घाटी की झड़प में भारतीय सेना के 20 सैनिक शहीद हो गए थे। 1967 में नाथुला में भारत और चीन के सैनिकों भिड़ गए थे। उस खूनी झड़प में भारत के 88 सैनिक शहीद हुए थे। वहीं चीन के 300 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे।