प्रताप सिंह कैरों ने पंजाब से क्यों भेजे ‘स्पेशल 272’, कश्मीर में ‘वाल्मीकि’ पर क्यों छिड़ी चर्चा? पूरी कहानी

जम्मू: जम्मू-कश्मीर में चुनाव का ऐलान बहुत जल्द हो सकता है। इसे देखते हुए केंद्र सरकार वाल्मीकि समुदाय को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की योजना बना रही है। खबरों की मानें तो सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय वाल्मीकि/बाल्मीकि को एससी सूची में शामिल करने के प्रस्ताव पर काम कर रहा है। इसके बाद प्रस्ताव को केंद्रीय कैबिनेट में मंजूरी के लिए रखा जाएगा। कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद उसे संसद में पेश किया जाएगा। वाल्मीकि या बाल्मीकि समुदाय एससी सूची में पहले से ही शामिल है। लेकिन घाटी में उन्हें आरक्षण का फायदा नहीं मिल पा रहा। ऐसे में इस समुदाय का जिक्र एब बार फिर जोर पकड़ रहा। इतिहास उठाकर देंखे पहली बार ये समुदाय 1957-58 में चर्चा में आया था। जम्मू-कश्मीर में जाति वर्गीकरण पर बीजेपी काफी समय से बहुत अधिक सक्रिय रही है।

केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के पहाड़ियों को भी अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का प्रस्ताव रखा है। हालांकि, गुज्जर और बक्करवाल समुदाय ने बीजेपी सरकार के इस प्रस्ताव पर विरोध जताया है। केंद्र सरकार के प्रति इस विरोध को देखते हुए ने हाल ही में बक्करवाल और गुज्जर समुदाय को यह आश्वासन दिलाया कि पहाड़ी समुदाय को आरक्षण देने से उन दोनों समुदाय के आरक्षण कोटे पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उपराज्यपाल ने कहा कि कुछ लोग अपने सियासी फायदे के लिए इन समुदायों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।

ने और पंजाब से कनेक्शनबात सन 1957 की है। जम्मू-कश्मीर के सफाई कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे। सुंदर घाटी में कूड़े का अंबार लग गया। तब जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री नहीं, प्रधानमंत्री हुआ करते थे और कार्यभार संभाल रहे थे बक्खी गुलाम मोहम्मद। उन्होंने फैसला लिया कि दूसरे राज्य से सफाई कर्मचारी बुलाए जाएंगे। इसके लिए उन्होंने पंजाब के सीएम प्रताप सिंह कैरों से बात की। उन्होंने वादा किया था कि इन कर्मचारियों को नौकरी दी जाएगी।

अमृतसर से 272 सफाई कमर्चारी जम्मू पहुंचे। ये सभी कर्मचारी वाल्मीकि समुदाय के थे। ये वहीं बस गये और इनकी संख्या बढ़ते-बढ़ते 2.5 लाख से ज्यादा हो गई। लेकिन इस समुदाय को न तो स्थायी नागरिकता मिली और न ही सुविधाएं मिल रहीं। पूरे देश में वाल्मीकि समुदाय और अन्य दलितों को विभिन्न कानूनों के तहत अनेक प्रकार के अधिकार मिले हुए हैं। लेकिन जम्मू-कश्मीर में रह रहे इस समुदाय के लोगों के पास अब तक ऐसे किसी कानून का कोई भी प्रावधान लागू नहीं होता था। लेकिन अनुच्छेद 370 हटने के बाद अब उम्मीद जगी कि इन्हें अब सम्मान वाली जिंदगी मिलेगी।

6 दशक से उम्मीद की आसलगभग 6 दशक से जम्मू-कश्मीर में काम कर रहा ये समुदाय आज भी सुविधाओं से वंचित है। जिस धारा 370 को केंद्र सरकार न खत्म किया है, उसी की संविधान धारा 35ए की वजह से इस समुदाय को आज तक आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया है। 35ए के तहत जम्मू-कश्मीर सरकार ही तय करती है कि राज्य में स्थाई नागरिकता और राज्य सरकार का सुविधाओं का लाभ कौन ले सकता है। संविधान में जोड़ा गया है कि वाल्मीकि समुदाय बाहर से काम करने के लिए आया था। ऐसे में इन्हें यहां की नागरिकता दी जा सकती।

राज्य सरकार ने वाल्मीकि समुदाय के लोगों को अपने यहां रोजगार देने के लिए नियमों में परिवर्तन कर यह लिख दिया कि इन्हें केवल सफाई कर्मचारी के रूप में ही अस्थाई रूप से रहने का अधिकार और नौकरी दी जाएगी। इस प्रकार जब इस समुदाय का कोई बच्चा जन्म लेता है तो उसके माथे पर वैधानिक रूप से दलित लिखा होता है। वह बड़ा होकर चाहे कितनी भी पढ़ाई कर ले उसे जम्मू-कश्मीर राज्य में सफ़ाई कर्मचारी की नौकरी ही मिल सकती है। इस समुदाय के लोगों के पास स्थाई निवास प्रमाण पत्र न होने से वे राज्य में स्थाई रूप से न तो बस सकते हैं न ही संपत्ति खरीद सकते हैं। उनके बच्चों को राज्य सरकार द्वारा छात्रवृत्ति भी नहीं मिल सकती।