AMU पर 1965 में संसद में दिए चागला के भाषण पर सुप्रीम कोर्ट में क्यों भिड़ गए कपिल सिब्बल और तुषार मेहता

नई दिल्ली : अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अल्पसंख्यक संस्थान है या नहीं, ये मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में इस पर सुनवाई के दौरान एएमयू ओल्ड बॉयज असोसिएशन के वकील कपिल सिब्बल और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच तगड़ी बहस हुई। खास बात ये कि दोनों ही अपनी बात रखने के लिए एक ही शख्स के भाषण का सहारा लिया। वह भी अलग-अलग मौकों या जगहों पर दिए भाषण की नहीं, बल्कि संसद में दिए भाषण की। दोनों ने सितंबर 1965 में संसद में दिए गए तत्कालीन शिक्षा मंत्री एम. सी. चागला के भाषण को कोट किया। सिब्बल जहां चागला को कोट कर ये दलील दे रहे थे कि तत्कालीन मंत्री भी एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे को बरकरार रखने के पक्ष में थे। दूसरी तरफ मेहता भी चागला को ही कोट करके ये बताने की कोशिश कर रहे थे कि उनकी मंशा तो कुछ और ही थी।1965 में केंद्र सरकार ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ऐक्ट, 1920 में संशोधन किया था। नए कानून में जो सबसे प्रमुख बदलाव था वो ये था कि प्रशासनिक शक्तियों को ‘यूनिवर्सिटी कोर्ट’ से एग्जिक्यूटिव काउंसिल को दे दिया गया। तब एएमयू को लेकर सरकार की आखिर मंशा क्या थी? क्या वह उसे एक अल्पसंख्यक संस्थान की तरह देख रही थी या एक ऐसे संस्थान में जो हर समुदाय के लिए हो? सीजेआई डी. वाई. चंद्रचूड़ की अगुआई वाली बेंच के सामने इसी मुद्दे को लेकर सिब्बल और मेहता भिड़ गए। दोनों ने ही अपनी बात रखने के लिए एम. सी. चागला के संसद में दिए गए भाषण का ही सहारा लिया। 1965 में एएमयू ऐक्ट में किए गए बदलाव के वक्त चागला ही शिक्षा मंत्री थे। वह बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाना चाहते थे लेकिन उन्होंने उनकी पेशकश ठुकरा दी थी। कपिल सिब्बल ने 3-6 सितबंर 1965 में संसद में दिए चागला के भाषण का जिक्र किया। ये वो वक्त था जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था। सिब्बल ने चागला को कोट करते हुए कहा, ‘एक अघोषित युद्ध चल रहा है। हमें सांप्रदायिक सौहार्द को बरकरार रखने के लिए हमें सबकुछ करना चाहिए जो हमारे वश में हो। हमें ऐसा एक भी शब्द नहीं बोलना चाहिए जिससे उस सौहार्द को नुकसान पहुंचे…।’ सिब्बल ने दलील दी कि आज के ‘असहिष्णु’ माहौल में ये शब्द और भी महत्वपूर्ण हैं। वरिष्ठ वकील ने कहा कि 1965 के एएमयू (अमेंडमेंट) बिल पर चर्चा के दौरान चागला ने कहा था कि इस बिल से यूनिवर्सिटी के स्पेशल करेक्टर पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इस तरह सिब्बल ने ये स्थापित करने की कोशिश की कि सांसदों ने हमेशा एएमयू को एक अल्पसंख्यक संस्थान के तौर पर ही देखा है। इतना ही नहीं, अपनी दलील के समर्थन में उन्होंने उस ऐतिहासिक तथ्य का भी जिक्र किया कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनवर्सिटी की स्थापना के लिए मुस्लिम समुदाय ने तब 30 लाख रुपये (आज उसकी कीमत करीब 500 करोड़ रुपये होगी) जुटाए थे। सिबल ने चागला को कोट करते हुए आगे कहा, ‘धर्मनिरपेक्ष भारत में यह (एएमयू) मुस्लिम संस्कृति का प्रतीक होनी चाहिए। यह बाकी दुनिया के लिए एक नजीर होनी चाहिए कि कैसे अलग-अलग समुदाय हमारे देश में एक साथ शांति और सद्भाव से रह सकती हैं…अलीगढ़ को मजबूत किया जाना चाहिए और इसे आधुनिक प्रगतिशील यूनिवर्सिटी बनना चाहिए जिसकी चमक न सिर्फ भारत में हो बल्कि दुनियाभर में हो। जो दुनिया में हमारी सामासिक संस्कृति की चमक बिखेरे।’सिब्बल ने पूछा, ‘आखिर सरकार को एक राष्ट्रीय महत्व की ऐसी यूनिवर्सिटी जिसने देश की गंगा-जमुनी संस्कृति को मजबूती दी हो, उसके अल्पसंख्यक चरित्र को नष्ट करने की कोशिश क्यों करनी चाहिए? आखिर अदालत ये फैसला क्यों दे कि ये अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है और इस तरह सदियों पुरानी विरासत को नष्ट करे?’ सिब्बल की दलीलों के जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी चागला के उसी भाषण का सहारा लिया, जिससे सिब्बल ने कोट किया था। मेहता ने उन पर आरोप लगाया कि वह चागला के भाषण के कुछ चुनिंदा अंश को ही उठा रहे हैं और उनके समूचे भाषण के मर्म को छिपा रहे हैं।मेहता ने भी 2 सितंबर 1965 को संसद में दिए गए चागला के भाषण का जिक्र किया जिसमें उन्होंने कहा था कि एएमयू की स्थापना मुस्लिम समुदाय ने नहीं, बल्कि तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत ने की थी। सॉलिसिटर जनरल ने संसद में दिए उनके भाषण को कोट किया, ‘मैं इस सदन से कहना चाहता हूं कि मुस्लिम समुदाय ने न तो एएमयू की स्थापना की है और न ही वह इसका प्रशासन करता है…सर सैयद अहमद ने उस समय की ब्रिटिश सरकार ने एक यूनिवर्सिटी स्थापित करने की मांग की थी और ब्रितानी हुकूमत ने यूनिवर्सिटी की स्थापना की। इस तरह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना विधायिका ने की, न कि किसी समुदाय ने।’चागला ने तब कहा था, ‘यह संस्थान (एएमयू) न तो अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित किया गया है, न इसका प्रशासन अल्पसंख्यक समुदाय की तरफ से हो रहा है। जहां तक आर्टिकल 30 की बात है तो कानूनी स्थिति पर मेरा यही कहना है।’मामले में अब अगली सुनवाई 23 जनवरी को होगी। इस मामले की सुनवाई कर रही बेंच में सीजेआई डी. वाई. चंद्रचूड़ के अलावा जस्टिस संजीव खन्ना, सूर्य कांत, जे बी पार्दीवाला, दीपांकर दत्ता, मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश शर्मा शामिल हैं।