मम्मी-पापा से कौन पूछे लिव-इन वाली बात? उत्तराखंड UCC से ‘लुकाछिपी’ पर लगा तगड़ा कोड

अक्षत अग्रवालनई दिल्ली: 2014 केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड की चर्चा शुरू है। मौजूदा धार्मिक पारिवारिक कानूनों को बदलने के लिए समान नागरिक संहिता बनाने के विचार ने लोगों का ध्यान खींचा है। राष्ट्रीय एकता के लिए एकरूपता बीजेपी की विचारधारा के मूल में रही है। यह बहस नई नहीं है। उत्तराखंड की बीजेपी सरकार यूसीसी बिल लेकर आई है। विडम्बना यह है कि यह यूसीसी बिल राज्य स्तर पर आया है। ऐसी चर्चा है कि असम और गुजरात भी इसी तरह के यूसीसी को अपना सकते हैं। यह अपने आप में भारत में पारिवारिक कानून में एक बुनियादी बदलाव का प्रतीक है। यूसीसी अब राज्य विधानसभाओं द्वारा निर्णय लेने का मामला बन गया है।राज्यों का कानूनी आधार: क्या राज्यों के पास ऐसा अधिकार है? कुछ राज्यों ने वास्तव में राष्ट्रीय पारिवारिक कानूनों में बदलाव किए हैं। इसको लेकर बहस बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय स्तर पर हुई है। गोवा में ऐतिहासिक कारणों से नागरिक संहिता है, लेकिन अधिकांश राज्यों में ऐसा नहीं है। उत्तराखंड के विधेयक के साथ नई बहस शुरू है। यदि यूसीसी का उद्देश्य कभी राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता का प्रतिनिधित्व करना था तो राज्य-विशिष्ट यूसीसी की शुरुआत एक नई तरह की क्षेत्रीय-स्तरीय एकरूपता का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती है जो राष्ट्रीय स्तर पर विविधता को स्वीकार करती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि विधेयक, आदिवासी समुदायों को इसके दायरे से छूट देता है। क्षेत्राधिकार कैसे काम करेगा? यह विधेयक उत्तराखंड के सभी निवासियों पर लागू होता है, भले ही वे राज्य से बाहर रहते हों। यह तब भी लागू होगा जब विवाह में शामिल पक्षों में से केवल एक ही उत्तराखंड का निवासी हो। यह इस बात पर ध्यान दिए बिना होगा कि इसमें शामिल पक्ष राज्य के भीतर रहता है या राज्य के बाहर। अधिक विविधता? ऐसा लगभग प्रतीत होता है मानो यह नया शासन अधिक बहुलता का परिचय देता है, कम नहीं। इससे एकरूपता के लक्ष्य पर ही सवाल खड़ा हो जाता है। एक समान तलाक प्रक्रिया: यह विधेयक कुछ मुख्य चिंताओं को रेखांकित करता है जिन पर यूसीसी के आसपास बहस चल रही है। यह विवाह और तलाक के लिए समान नियम बनाता है। शादी के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन की शुरुआत करता है। यह बहुविवाह को गैरकानूनी घोषित करता है और मुस्लिम कानून में हलाला जैसी प्रथाओं को दंडित करता है जिन्हें अक्सर महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण माना जाता है। लिव-इन की निगरानी: ने लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन की शुरुआत की है। राज्य की ओर से रिश्तों की अधिक जांच और निगरानी का भी संकेत देता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार वयस्कों के अपनी पसंद के रिश्ते में रहने के अधिकारों को मान्यता दी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि पंजीकरण की आवश्यकताएं व्यवहारिक तौर पर कैसे लागू होती हैं।धर्म और पारिवारिक कानून: अंततः यूसीसी पारिवारिक कानून और धर्म के बीच संबंधों पर सवाल उठाता है। कानून में बहस धार्मिक कानून की धारणाओं पर आगे बढ़ती हैं। उदाहरण के लिए, कथित ‘लव जिहाद’ को लेकर विवादों के पीछे एक धारणा है कि धार्मिक कानून अंतर-धार्मिक जोड़ों को धर्म परिवर्तन के बिना शादी करने की अनुमति नहीं देता है। विवाह और तलाक के लिए समान नियम बनाने से क्या अंतर-धार्मिक विवाह आसान हो जाएगा? यूसीसी की वास्तविक क्षमता और वादा इस बात से निर्धारित होगा कि मौजूदा समस्याओं को व्यहारिक तौर पर कैसे निपटा जाता है।(लेखक फैमिली लॉ पर पीएचडी कर रहे हैं)