…जब प्लास्टिक की कुर्सी पर प्लेट रखकर खाने लगे मुलायम, लोग बोले- अरे नेताजी ये क्या!

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव को उनकी पार्टी ने नहीं, उनके रुतबे ने नहीं, उनके साथ चलने वाले लाव-लश्कर ने नहीं, बल्कि सादगी ने बड़ा नेता बनाया था. हजारों तारीखें इस बात की गवाह हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री और रक्षा मंत्री बनने से पहले और बाद तक हमेशा कार्यकर्ताओं को बहुत अहमियत दी. इसीलिए, जो लोग एक बार मुलायम सिंह यादव से सीधे जुड़ गए, वो हमेशा उन्हीं के होकर रहे.
साल 2000 और तारीख एक अप्रैल, वक्त रात करीब 12 बजे. मुलायम सिंह यादव यूपी के फतेहपुर में बिंदकी विधानसभा के तहत आने वाले पधारा गांव पहुंचे. तब वो रक्षा मंत्री के पद से हट चुके थे. लेकिन, सुरक्षा और लाव-लश्कर पूरा था. दो बार मुख्यमंत्री और एक बार रक्षा मंत्री रह चुके थे, इसलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि राष्ट्रीय राजनीति में मुलायम सिंह क्षेत्रीय क्षत्रप होने के साथ-साथ ‘नेताजी’ के तौर पर मजबूती से स्थापित हो चुके थे. वो अपने एक कार्यकर्ता के तिलक समारोह में पहुंचे थे. महेंद्र बहादुर सिंह उर्फ बच्चा ठाकुर सपा के निवर्तमान प्रदेश सचिव हैं और बिंदकी से 2012 में विधायक का चुनाव भी लड़ चुके हैं.

एक शादी समारोह में कुर्सी पर प्लेट रखकर खाने लगे ‘नेताजी’
महेंद्र बहादुर सिंह उर्फ बच्चा ठाकुर के मुताबिक, ‘नेताजी’ बहुत व्यस्त कार्यक्रम के बीच रात करीब 12 बजे पहुंचे. आते ही उन्होंने कहा कि बहुत भूख लगी है. इतना कहने के बाद जब उन्हें पंडाल की ओर ले जाया गया तो खुद ही प्लेट लेने के लिए आगे बढ़ गए. कुछ लोगों ने इशारा करके उन्हें बताया कि उनके लिए एक विशेष मंच बनाया गया है. आप वहां पर बैठिये, खाना लेकर लोग आ जाएंगे, लेकिन मुलायम सिंह ने नजर भर कर अपने आसपास के लोगों को देखा और बोले कि हम खुद अपनी प्लेट लगा लेंगे.
इतना कहकर मुलायम सिंह यादव ने प्लेट उठाई और फिर खुद ही खाना लेकर प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गए. इसके बाद उन्होंने अपने सिक्योरिटी गार्ड को इशारा किया. वो उनके लिए एक और कुर्सी ले आया. मुलायम सिंह ने सामने रखी कुर्सी को टेबल बनाया और उसी पर प्लेट रखकर खाने लगे. खाने के बाद उन्होंने हाथ धोए और तड़के करीब चार बजे तक कार्यकर्ताओं के साथ वहीं चर्चा करते रहे.

फतेहपुर के पेड़े का स्वाद मुलायम को हमेशा याद रहा
फतेहपुर जिले से मुलायम सिंह यादव का सियासी और निजी दोनों रिश्ता हमेशा बरकरार रहा. यहां राजनीतिक रूप से संगठन जितना मजबूत था, उसे लेकर ‘नेताजी’ गर्व करते थे. वो कहते थे कि फतेहपुर के संगठन में जितनी जान है, वो सब कार्यकर्ताओं के समर्पण की बदौलत है. उनके साथ फतेहपुर में कई दिनों तक दौरा करने वाले महेंद्र बहादुर सिंह बताते हैं कि मलवां के पेड़े उन्हें बहुत पसंद थे.
फतेहपुर मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर मलवां कस्बा है. वहां बेहद खास तरह के पेड़े बनाए जाते हैं. उनका स्वाद मुलायम सिंह यादव कभी नहीं भूले. यहां तक कि जब भी फतेहुपर जाते तो कार्यकर्ता उनके लिए कई किलो पेड़े बंधवा देते थे. मुलायम सिंह यादव इटावा, मैनपुरी और सैफई में बड़े चाव से अपने करीबी लोगों को मलवां के पेड़े खिलाते और उसकी तारीफ करते थे.
कानपुर से इटावा के बीच गाड़ी रुकवाकर अमरूद लेते थे मुलायम
मुलायम सिंह यादव को अमरूद बहुत पसंद था. कानपुर से इटावा के बीच वो जब भी कार से जाते थे तो रास्ते में किसान नगर पड़ता था. यहां हाईवे किनारे अमरूद के दर्जनों ठेले लगते थे. नेताजी खुद गाड़ी से उतरकर अमरूद को देखते-परखते और कई किलो अमरूद बंधवाकर साथ ले जाते थे. रास्ते भर वो अमरूद खाते और बांटते थे. उनके साथ शुरुआत से रहने वाले लोग बताते हैं कि हर जिले में अपने कार्यकर्ताओं के नाम उन्हें इस कदर याद रहते थे कि जब भी सड़क से गुजरते तो कहते कि यहां तो फलां कार्यकर्ता रहता है. चलो उसके घर चाय पीकर फिर निकलेंगे. उनकी यही बात कार्यकर्ताओं के दिल में इस कदर बसी थी कि वो लोग खुद को हमेशा मुलायम सिंह के करीब ही पाते थे.

2 कप अदरक वाली चाय, मौसमी का जूस और रात 12 बजे तक काम
करीब 40 साल तक सुबह पांच बजे उठना और फिर रात 12 बजे तक काम करना, ये रूटीन मुलायम सिंह यादव की जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा था. उनके करीबी लोग बताते हैं कि जब भी वो किसी जिले का दौरा करते थे तो वो सुबह पांच बजे उठ जाते थे. फिर दो कप अदरक वाली चाय पीते थे. इस बीच स्थानीय अखबार जरूर पढ़ते थे. थोड़ी देर बाद मौसंबी का जूस पीते और फिर हल्का नाश्ता करके कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग, जनसभा, रैलियां और खानपान का दौर चलता.
रात करीब 10 बजे वो उन कार्यकर्ताओं और जनता के लोगों की चिट्ठियां लेकर बैठते थे, जिनसे दिन-भर मिलते थे. सबकी समस्याओं का सिलसिलेवार समाधान करने के लिए जो भी उचित लगता था, वो निर्देश दिया करते थे. ये सब करते-करते हर रोज रात के 12 बज जाते थे. इसके बाद वो सोने चले जाते थे. कार्यकर्ताओं के साथ उनका ये रिश्ता शुरुआत से लेकर आखिरी के दिनों से कुछ समय पहले तक ऐसा ही बना रहा. इस तकह के तमाम किस्से उन्हें धरती पुत्र बनाते हैं.