कालिंजर दुर्ग में ऐसा क्या था जिसे पाने के लिए मुगल से लेकर मराठा तक नजरें गड़ाए रहे

इतिहास में एक ऐसे किले का नाम भी दर्ज किया गया जिस पर न जाने कितने शासकों की नजर रही है. उसे हासिल करने के लिए कितने शासक तैयारी करके आए, लेकिन खाली हाथ ही वापस लौटे. वो है कालिंजर का दुर्ग. वर्तमान में यह उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद की सीमा में आता है. विंध्य पर्वत की 900 फुट ऊंची पहाड़ी पर बना कालिंजर का दुर्ग अपने अंदर कई खासियतें समेटे रहा है. मध्य प्रदेश के खजुराहो से 100 किमी की दूरी पर बने इस दुर्ग का इतिहास चंदेलों के शासनकाल से भी ज्यादा पुराना है.
कालिंजर दुर्ग का जिक्र बौद्ध साहित्य में भी किया गया है. भगवान बुद्ध की यात्रा वृतांत में भी इस दुर्ग का जिक्र है. यह ऐसा किला है जिसने देश के राजनीतिक और सांस्कृतिक दौर को बदलते हुए देखा है. यही वजह है कि कई इतिकासकारों की इसमें खास दिलचस्पी रही है.
इसलिए नजर गड़ाए हुए थे शासक
कालिंजर फोर्ट पर हुई रिसर्च कहती है, यह वो किला है जिस पर महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक और हुमायूं से लेकर शेर शाह सूरी तक ने कब्जा करना चाहा, लेकिन सफल नहीं हुए. उन्होंने जान की बाजी तक लगा दी. इसे हासिल करने क लिए पृथ्वीराज चौहान से लेकर पेशवा बाजीराव तक ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.
कहा जाता रहा है कि इसे जीतना रियासतों में अपने शौर्य का पताका लहराने जैसा था. यह घने जंगलों के बीच बनी पहाड़ी पर बना था. जहां तक शत्रुओं की सेना का पहुंचना लगभग नामुमकिन था. 5 मीटर मोटी दीवारों वाले इस दुर्ग की उंचाई 108 फुट थी. जिस पहाड़ी पर यह दुर्ग बना था उसकी चढ़ाई बहुत दुर्गम थी. इतना ही नहीं, उंचाई पर होने के कारण दुश्मनों के लिए तोप से हमला करके इसे ध्वस्त करना भी नामुमकिन था. इसकी गिनती अपने दौर के सबसे मजबूत किलों में की जाती थी.
इतना ही नहीं, बुंदेलखंड इलाके को पानी की कमी के लिए भी जाना जाता है, लेकिन यह जिस पहाड़ी पर बना था वहां से हमेशा पानी रिसता रहता था. यह भी अपने दौर में कौतुहल का एक विषय था. कहा जाता है कि बुंदेलखंड में सालों तक सूखा पड़ने के बाद भी कालिंजर दुर्ग की पहाड़ी से पानी रिसना बंद नहीं हुआ. इसकी इन्हीं खूबियों के कारण कई शासकों ने इस पर कब्जा जमाने का सपना देखा.

कितनों ने शासन किया?
जिस समय दिल्ली की सल्तनत पर मुगलों का राज था जब चंदेल शासन में शेर शाह सूरी ने इस किले को फतह करने की कोशिश की थी पर वो जंग में मारा गया. शेर शाह सूरी वो शासक था जिसने हुमायूं को हराकर सूरी साम्राज्य की स्थापना की थी. लेकिन 1545 में कालिंजर को हासिल करने में उसकी मौत हो गई और यह हुमायूं के लिए सुनहरा मौका साबित हुआ. नतीजा, हुमायूं ने फिर दिल्ली को जीत किया और अगले 300 सालों तक मुगलों ने राज किया.
हुमायूं ने किले को हासिल करने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे. हालांकि 1569 में अकबर ने इसे जीत कर अपने नवरत्नों में शामिल बीरबल को तोहफे में दे दिया. इस कब्जे के बाद भी शासकों में कांलिजर को पाने चाहत कम नहीं हुई. एक दौर ऐसा भी आया जब राजा छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव की मदद से बुंदेलखंड से मुग़लों को बेदखल करके दम लिया. इस तरह अंगेजों के आने तक यह राजा छत्रसाल की रिसासत का हिस्सा रहा.

क्या कहता है इतिहास?
मशहूर चीनी शोधार्थी ह्वेन त्सांग ने 7वीं शताब्दी में लिखे अपने दुर्लभ संस्मरण में कालिंजर दुर्ग के बारे में कई जानकारियां दर्ज की हैं. यह दुर्ग कितना पुराना है इसके साक्ष्य गुप्त काल से मिलते हैं. पुरातत्व विशेषज्ञों को यहां के ऐसे शिलालेख मिले हैं जो बताते हैं कि यह गुप्त काल में भी मौजूद रहा है. इसके बाद यह किला कई राजाओं की सल्तनत का हिस्सा रहा.
दुर्ग में भगवान नीलकंठ महादेव का मंदिर है
9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच इस चंदेल शासकों ने शासन किया. 400 सालों तक राज करने वाले चंदेलों ने इसे अपनी राजधानी बनाया. इसके बाद ही इस पर आक्रमण करने का सिलसिला शुरू हुआ. इस दुर्ग में गुप्त स्थापत्य शैली, चंदेल शैली, प्रतिहार शैली, पंचायतन नागर शैली के नमूने दिखते हैं. इस दुर्ग में प्रवेश के 7 रास्ते हैं. इसमें कई मंदिर हैं. यह किला हिन्दू भगवान शिव का निवास स्थान भी कहा जाता है. यहां नीलकंठ महादेव मंदिर है.
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