सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्‍ठा और नेहरू का न आना, वो कहानी क्‍या है?

नई दिल्‍ली: कांग्रेस ने अयोध्‍या में कार्यक्रम में नहीं जाने का फैसला किया है। ट्रस्‍ट की ओर से पार्टी को कार्यक्रम में शामिल होने का न्‍योता मिला था। कांग्रेस ने इसे बीजेपी और आरएसएस का इवेंट बताकर अस्‍वीकार किया है। न्योते को ठुकराए जाने के बाद सियासत गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इसका कनेक्‍शन 73 साल पहले सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन से जोड़ दिया है। इसे लेकर बीजेपी और कांग्रेस में वार-पलटवार शुरू हो गया है। बीजेपी ने कांग्रेस पर राम विरोधी होने का आरोप लगाया है। सात दशक पहले की याद दिलाते हुए उसने पूरे मामले में देश के प्रथम प्रधानमंत्री को भी लपेट लिया है। तब नेहरू ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति को सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल होने से रोका था। दोनों के बीच इसे लेकर खुलकर मतभेद सामने आ गए थे। क्‍या था वो किस्‍सा? आइए, यहां जानते हैं। बात सात दशक पहले की है। माहौल कमोबेश अभी जैसा बन गया था। तारीख थी 11 मई 1951। गुजरात में सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन था। यह 12 ज्‍योतिर्लिंगों में से एक है। आक्रमणकारियों ने कई बार इस मंदिर को तहस-नहस किया था। औरंगजेब के आदेश पर इसे ढहा दिया गया था। आजादी के बाद इसका दोबारा पुनर्निर्माण हुआ। तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल को इसका श्रेय जाता है। 11 मई 1951 को भारत के पहले राष्‍ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने ही मंदिर में ज्‍योतिर्लिंग को स्‍थापित किया था। कार्यक्रम में राजेंद्र प्रसाद के शामिल होने पर नेहरू ने आपत्ति जताई थी। नेहरू ने इसमें शामिल होने से साफ मना कर दिया था। नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को चिट्ठी लिखकर नाखुशी जाहिर की थी। साथ ही उनसे यह भी कहा था कि वह भी कार्यक्रम में शिरकत नहीं करें। नेहरू ने प्रसाद को लिखी थी च‍िट्ठी सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम से करीब तीन महीने पहले नेहरू ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति को चिट्ठी लिखी थी। यह चिट्ठी 13 मार्च 1951 को लिखी गई थी। उन्‍होंने लिखा था- अगर आपको लगता है कि निमंत्रण अस्‍वीकार करना आपके लिए सही नहीं होगा तो मैं दबाव नहीं डालूंगा। नेहरू ने लिखा था कि प्रसाद की सोमनाथ मंदिर यात्रा राजनीतिक महत्‍व ले रही है। यह सरकारी कार्यक्रम नहीं है। लिहाजा, उन्‍हें इसमें नहीं जाना चाहिए। दरअसल, नेहरू नहीं चाहते थे कि राष्‍ट्रपति पद पर रहते हुए डॉ राजेंद्र प्रसाद किसी धार्मिक कार्यक्रम का हिस्‍सा बनें। नेहरू को लगता था कि इससे जनता में गलत मैसेज जा सकता है। इसी के चलते नेहरू ने तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति को रोकने की कोशिश की। यह और बात है कि प्रसाद ने नेहरू की एक नहीं सुनी और सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए। राजेंद्र प्रसाद ने दिया था चिट्ठी का जवाब नेहरू की चिट्ठी के जवाब में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने भी पत्र लिखा था। प्रसाद ने लिखा था- मैं अपने धर्म को बहुत मानता हूं और इससे खुद को अलग नहीं कर सकता। फिर न केवल वह उद्घाटन में शामिल हुए। अलबत्‍ता कार्यक्रम के अनुसार, शिवलिंग की स्‍थापना भी की। तत्‍कालीन गृहमंत्री सरदार वल्‍लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का प्रस्‍ताव रखा था। इसे लेकर उन्‍होंने महात्‍मा गांधी को पत्र लिखा था। गांधी ने इस प्रस्‍ताव की सराहना की थी। लेकिन, शर्त रखी थी कि इसमें सरकारी धन खर्च नहीं होना चाहिए। पटेल ने इस शर्त का अक्षरश: पालन किया था।