क्या गजब जान है यह बहादुर बच्चा! आतंकियों से भिड़ा और अब लड़ रहा जिंदगी की लड़ाई, डॉक्टर भी हैरान

नई दिल्ली: दुनिया अजब-गजब है। विरोधाभासों से भरी। कभी सामान्य उम्मीद पूरी नहीं होती तो कभी कोई कल्पना से परे करिश्मा कर जाता है! जब बंदूकों से लैस खूंखार आतंकियों की फौज अचानक घर पर दावा बोल दे तो एक 14-15 वर्ष के बच्चे से आप क्या उम्मीद करेंगे? सौम्यदीप जैना वो बहादुर बच्चा है जिसकी कहानी आपकी उम्मीदों से बहुत आगे जाती है। उसने जो किया, उसके लिए उच्च कोटि की सूझबूझ की जरूरत तो थी ही, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी था साहस जुटा पाना। वो कहते हैं न, दिमाग देना तो आसान है, खुद से कर पाना बहुत कठिन। लेकिन इस बच्चे ने वो कर दिखाया जिसकी कल्पना करना भी आसान नहीं। सौम्यदीप की सूझबूझ और साहस ने कमाल कर दिया।

पिता घर पर नहीं थे और हो गया आतंकी हमला

घटना 10 फरवरी, 2018 की है जब फिदायीन हमलावरों की एक टीम ने उसके घर पर दस्तक दे दी। पिता हरिपद उस वक्त घर पर नहीं थे। सौम्यदीप ने घबराने के बजाय शांत दिमाग से रणनीति बनाई और परिवार की जिंदगी बचा ली। वह तुरंत मां मधुमिता और नौ साल की बहन स्नेहा के साथ एक कमरे में बंद हो गया और अंदर से दरवाजा बंद कर उसे फर्नीचर और ट्रंक से ब्लॉक कर दिया। आतंकियों ने दरवाजा खोलने की खूब कोशिश की, लेकिन सौम्यदीप ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी। आतंकी लाख कोशिशों के बावजूद दरवाजा खोलने में असफल रहे तो जाते-जाते दरवाजों पर गोलियों की बौछार कर दी और घर में एक ग्रिनेड फेंक दिया। सौम्यदीप इस गोलीबारी में गंभीर रूप से घायल हो गया।

गजब जुझारू है सौम्यदीप

सौम्यदीप की आगे की कहानी तो और भी गजब है। सौम्यदीप ग्रिनेड के छर्रों की चपेट में आ गया। लेकिन सिर पर गोली लगने से वह करीब-करीब मौत के मुंह में चला गया था। उसका इलाज करने वाले एक डॉक्टर ने कहा, ‘उसका जिंदा बच जाना किसी चमत्कार से कम नहीं। ऐसे 90% मरीज मर जाते हैं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘बच्चे के अदम्य जुझारूपन और डॉक्टरों के समर्पन से करिश्मा हो गया।’ सौम्यदीप का पहले मिलिट्री हॉस्पिटल में और फिर एम्स में इलाज हुआ। पिछले साल जुलाई में सौम्यदीप की एम्स में आखिरी सर्जरी हुई।

याद्दाश्त की समस्या से जूझ रहा सौम्यदीप

सौम्यदीप को 2018 में ही से नवाजा गया था। उसे यह तो याद है कि तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उसे पुरस्कार दिया था, लेकिन फिदायीन हमले की उसे बिल्कुल याद नहीं। अब सौम्यदीप 18 वर्ष का हो गया है। अपने नाम के मुताबिक सुंदर, सुशील और शांत। बीते पांच सालों में सौम्यदीप की कई बार सर्जरी हुई। वो अब भी व्हीलचेयर पर है, फिर भी चेहरे पर तनिक भी सिकन नहीं, बिल्कुल शांत और सौम्य। वह तभी थोड़ा झुंझलाता है जब उससे आतंकी हमले से पहले की बातें याद दिलाने की कोशिश की जाती है।

आज भी याद हैं वो दिन

उसे बैडमिंटन खेलना याद है। गणित की समस्याओं को कैसे चुटकी में सुलझा देता था, उसकी भी बात करता है, लेकिन बाकी कई बातें याद नहीं। वह बैडमिंटन को बहुत मिस करता है। सौम्यदीप के पिता हरिपद ने कहा, ‘उसे बैडमिंटन पसंद था और अच्छा खेलता था। अब वह खेल नहीं सकता क्योंकि शरीर के बाएं हिस्से में लकवा मार गया है। यह सोचकर वह खीझ है।’ उन्होंने बताया कि घटना के बाद पांच सालों में सौम्यदीप की हालत में बहुत सुधार हुआ है। उन्होंने कहा कि अब सौम्यदीप हल्के सहारे से करीब 200 मीटर तक चल लेता है और उसकी आवाज भी कम लड़खड़ाती है।

12वीं में पढ़ रहा है, लेकिन…

सौम्यदीप दिल्ली कैंटोनमेंट में स्पेशल बच्चों के लिए बने आशा स्कूल में कक्षा बारहवीं का छात्र है। पिता ने बताया, ‘वह सब समझता है, लेकिन कुछ देर बाद ही भूलने भी लगता है।’ उन्होंने कहा कि वह सिर्फ 46 फॉन्ट साइज के शब्दों को ही पढ़ पाता है। उन्होंने बताया, ‘सौम्यदीप मैथ्स में बहुत अच्छा था, लेकिन अब तो हिसाब में सामान्य समस्या से भी झल्ला जाता है। वह हमारी तरह सामान्य जिंदगी चाहता है, लेकिन मौजूदा हालात देखकर तो यह संभव नहीं लगता।’

डॉक्टरों की बहुत उम्मीद

डॉक्टरों का कहना है कि सौम्यदीप साकारात्मक ऊर्जा से लबालब एक जुझारू लड़का है। इसी वजह से उसने मौत को मात दे दी। लेकिन उसकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। अच्छी बात यह है कि उसने जिस हिम्मत से आतंकियों का मुकाबला किया, उसी संकल्प से अपनी जिंदगी वापस पाने की लड़ाई लड़ रहा है। डॉक्टरों भी काफी आशान्वित हैं कि सौम्यदीप की हालत तेजी से बदलेगी।