बंगला खाली करो कि मंत्री आते हैं…! बिहार में सत्ता समीकरण बदलते ही नया ‘खेल’

पटना : सत्ता परिवर्तन के साथ ‘बंगला खाली करो कि मंत्री आते हैं’ के स्वर कुछ ऐसे ही उठते हैं कि ‘सिंहासन खाली करो कि…।’ ऐसा शायद ही कभी हुआ होगा कि सत्ता परिवर्तन के साथ बंगला खाली () करने को लेकर हुज्जत नहीं हुई हो। कभी मामला नोटिस तक गया तो कभी न्यायालय तक भी पहुंचा। देर-सवेर निदान होता ही रहा लेकिन तब तक राजनीतिक गलियारों में अपनी अपनी दुंदुभी बजाते रहे।

बिहार में फिलहाल बंगला मसला क्या है?
दरअसल, महागंठबंधन की सरकार जब सत्ता में आई तो भाजपा के मंत्री, पूर्व मंत्री हो गए। पूर्व मंत्री होते ही बंगला खाली करने का जो सामान्य निर्देश है, उसके मुताबिक एक माह के भीतर आपको अपने अनुकूल बंगला में शिफ्ट करना होता है। ऐसा नहीं होता हैं तो एक नोटिस जारी होती है। इसके बाद बंगला खाली करना अनिवार्य हो जाता है। इस बार जिन मंत्रियों को बंगला खाली करने का निर्देश मिला है, उनमें पूर्व उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद, पूर्व उपमुख्यमंत्री रेणु देवी, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा, पूर्व स्वस्थ मंत्री मंगल पाण्डेय, पूर्व मंत्री नंदकिशोर यादव और पूर्व मंत्री प्रेम कुमार जैसे महत्वपूर्ण लोग शामिल हैं। अब तारकिशोर प्रसाद के बंगले में तेजस्वी यादव को जाना है। रेणु देवी के बंगले में तेजप्रताप यादव को। विजय सिन्हा वाले बंगले में अवध बिहारी चौधरी को। इसलिए मामला ज्यादा तूल पकड़ा है।

नंदकिशोर यादव और प्रेम कुमार को मिली थी राहत

ऐसी चर्चा है कि एनडीए की सरकार में जब नंदकिशोर यादव और प्रेम कुमार शामिल नहीं हुए तो तब भी बंगला खाली करने का निर्देश मिला था। लेकिन इन दोनों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलकर उसी बंगले में रहने का निर्देश प्राप्त कर लिया था। मगर इस बार मामला कुछ दूसरा है। सरकार से बाहर रहे उन सभी पूर्व मंत्री को बंगला खाली करने का निर्देश मिला है। राजनीतिक जगत में कई ऐसे मामले आए, जो बंगला खाली कराने से जुड़ा रहा। लेकिन कुछ घटना की ज्यादा चर्चा मीडिया में मिला।

उपेंद्र कुशवाहा के बंगला मामले ने पकड़ा था तूल
एक समय था जब उपेंद्र कुशवाहा और नीतीश कुमार एक-दूसरे के पूरक हुआ करते थे। लेकिन एक समय आया, जब दोनों के बीच वैचारिक तफरका आया तो बंगला-बंगला का खेल यहां भी शुरू हुआ। किस्सा ये है कि नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा। जब तक संबंध ठीक रहा उन्हें राजधानी पटना में भी एक बंगला आवंटित रहा। लेकिन मतभेद जब चरम पर पहुंचा तो बंगला खाली कराने का दबाव बनाया गया। समय पूरा होने के बाद खाली नहीं किया तो नोटिस भेजा गया। इसके बाद भी खाली नहीं हुआ तो पुलिस-प्रशासन तक के सहयोग लेने की बात मीडिया में आई। अंततः बंगला खाली करना पड़ा। वहीं, दूसरी तरफ आरसीपी सिंह राज्यसभा के सदस्य रहते मंत्री के बंगले का उपयोग कर रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था तेजस्वी का बंगला मामला
वर्ष 2015 में जब महागंठबंधन की सरकार बनी तो तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने। उन्हें बंगला एलॉट किया गया। वहां काफी रेनोवेशन के कार्य की चर्चा हुई। 63 एसी लगने का आरोप भाजपा ने लगाया। लेकिन, 2017 में जब एक बार फिर एनडीए की सरकार बनी तो पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव बंगला खाली करने के नाम पर बड़े न्यायालय का दरवाजा तक खटखटाया। अंत में बंगला खाली करना पड़ा। तब इस मामले ने काफी तूल पकड़ा था। वर्ष 2017 में भवन निर्माण मंत्री महेश्वर हजारी ने 15 दिनों के भीतर अब्दुल बारी सिद्दीकी, चंद्रिका राय, शिव चंद्र राम सहित पांच लोगों को एक माह के भीतर बंगला खाली करने को कहा। लेकिन तब सिद्दीकी और बाकी लोग कोर्ट चले गए।

उद्योग मंत्री रहे जय नारायण सिंह बनाम रामप्रीत पासवान
2020 में जब एनडीए की सरकार बनी तो उद्योग मंत्री जय नारायण सिंह की मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं किया गया। ये बंगला भाजपा कोटे से मंत्री बने रामप्रीत पासवान को एलॉट किया गया। रामप्रीत पासवान को भी बंगला खाली कराने में पसीने छूट गए। 2020 के एनडीए सरकार में विनोद नारायण झा भी मंत्रिपरिषद से बाहर हो गए। उन्हें भी सरकार की तरफ से नोटिस मिला तो वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिले। अपनी व्यथा कही कि कहीं रहने को जगह देंगे, तभी तो शिफ्ट करेंगे। भाजपा के प्रवक्ता डॉ रामसागर सिंह कहते हैं कि तब नीतीश कुमार ने अशोक चौधरी की क्लास तक लगा दी थी।

सत्ता समीकरण बदलते ही शुरू होता है बंगला खेल
बहरहाल, ये ‘बंगला खाली करो’ प्रकरण सत्ता परिवर्तन के साथ अनवरत जारी रहा। जो समय पर खाली नहीं किए उन्हें नोटिस मिली। कोई इस नोटिस के विरुद्ध न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और राहत पाई। इसके बाद भी खाली नहीं हुआ तो किराये का 30 गुना जुर्माना हुआ। किसी ने माफ करा ली तो किसी ने जुर्माने की राशि भरी। बस ऐसे ही ‘बंगला खाली करो’ का खेल कुछ समय चलता है। फिर ये सारी घटनाएं एक समय के बाद नेपथ्य में चली जातीं हैं, शायद एक और घटना के इंतजार में।