Truth of PoK-VI | कश्मीर और PoK का मामला संयुक्त राष्ट्र तक कैसे पहुंचा | Teh Tak

कश्मीर के 78 हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा बड़े हिस्से पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है। ये इलाका इतना बड़ा है कि उसमें 50 से ज्यादा दिल्ली समाहित हो जाए। पाकिस्तान इसे आजाद कश्मीर बताता है। लेकिन सच तो ये है कि आजाद नहीं बल्कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर है। इसे हम आम बोलचाल की भाषा में पीओके कहते हैं। पीओके की बात इसलिए भी इन दिनों चर्चा में है क्योंकि देश के गृह मंत्री अमित शाह ने बीते महीने लोकसभा में इसे लेकर कहा कि अगर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरी ने सही कदम उठाया होता तो पीओके आज भारत का हिस्सा होता। शाह ने कश्मीर में सीजफायर करने और इस मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के नेहरू के फैसले को ब्लंडर बताया। ऐसे में आइए जानते हैं कि कश्मीर और पीओके का मामला संयुक्त राष्ट्र कैसे पहुंचा। इसे भी पढ़ें: Truth of PoK-IV | पीओके की भारत वापसी का प्लान कितना संभव? | Teh Takकश्मीर और पीओके पर यूएन सल 1949 में संयुक्त राष्ट्र में जम्मू कश्मीर के लोगों को जमनत संग्रह का अधिकार दिया था। ये भारत सरकार की बड़ी भूल की वजह से हुआ था। वर्ष 1947 में जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को संयुक्त राष्ट्र की मदद से सुलझाने की कोशिश की गई। जबकि ये घरेलू मामला था। आजादी के तुरंत बाद अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया था और भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। जवाब में भारत की सेना पाकिस्तान से कश्मीर के वो सारे इलाके जीतकर लगातार आगे बढ़ रही थी। तभी अचानक प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने युद्ध विराम का ऐलान कर दिया। दुनिया में यह एकलौता उदाहरण है जहां जीतती हुई सेना को युद्ध विराम के कारण पीछे लौटना पड़ा। अचानक हुए इस फैसले से पाकिस्तान को जम्मू कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा करने का मौका मिल गया और युद्ध खत्म होने से पहले ही 1948 में जवाहर लाल नेहरू कश्मीर का मामला लेकर स्वयं ही संयुक्त राष्ट्र में चले गए और यहीं उनकी भूल थी। इस वजह से पाकिस्तान को पीओके से हटाया नहीं जा सका। जिसका नतीजा है कि पाकिस्तान कश्मीर को आज भी भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। इसे भी पढ़ें: Truth of PoK-V | भारत के लिए PoK क्यों है अहम? | Teh Takसंयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने जनवरी 1948 में इस मामले को उठाया। न्यायविद सर जफरुल्ला खान ने पाकिस्तानी स्थिति के पक्ष में पांच घंटे तक बात की। सरदार वल्लभभाई पटेल के निजी सचिव वी शंकर ने अपने संस्मरण स्कोफिल्ड में कहा है कि भारत की तरफ से ब्रिटिश प्रतिनिधि, फिलिप नोएल-बेकर की भूमिका से नाखुश था, कहा जाता है कि परिषद को पाकिस्तान की स्थिति की ओर धकेल रहा था। जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की ओर से किए गए हमले की हमारी शिकायत पर सुरक्षा परिषद में चर्चा ने बहुत प्रतिकूल मोड़ ले लिया है। जफरुल्ला खान, ब्रिटिश और अमेरिकी सदस्यों के समर्थन से, उस शिकायत से ध्यान हटाकर जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद की समस्या की ओर ध्यान हटाने में सफल रहा था। सरदार पटेल के निजी सचिव के अनुसार जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान के हमले को उसकी आक्रामक रणनीति के कारण पृष्ठभूमि में धकेल दिया गया था। मानों जैसेहमने उसका मुकाबला करने के लिए कुछ नम्र और रक्षात्मक मुद्रा अपना रखी हो। 20 जनवरी, 1948 को, सुरक्षा परिषद ने विवाद की जांच के लिए भारत और पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र आयोग (यूएनसीआईपी) की स्थापना के लिए एक प्रस्ताव पारित किया और मध्यस्थता प्रभाव से कठिनाइयों को दूर करने की संभावना” को अंजाम दिया। सरदार पटेल नेहरू द्वारा मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने से असहज थे, और उन्हें लगा कि यह एक गलती है। स्कोफिल्ड में उन्होंने लिखा कि न केवल विवाद लंबा चला गया है, बल्कि सत्ता की राजनीति की बातचीत में हमारे मामले की योग्यता पूरी तरह से खो गई है। माउंटबेटन का विश्वास यह अच्छी तरह से प्रलेखित है कि 15 अगस्त, 1947 से 21 जून, 1948 तक स्वतंत्रता के बाद भारत के पहले गवर्नर लॉर्ड माउंटबेटन थे। उनका मानना था कि तत्कालीन नव-स्थापित संयुक्त राष्ट्र कश्मीर विवाद को सुलझाने में मदद कर सकता है। माउंटबेटन ने 1 नवंबर 1947 को लाहौर में दो लोगों के बीच एक बैठक में मुहम्मद अली जिन्ना को यह सुझाव दिया था। अगले महीने नेहरू के लाहौर में लियाकत अली खान से मिलने के बाद, माउंटबेटन को यकीन हो गया कि एक मध्यस्थ की जरूरत है। कश्मीर इन कॉन्फ्लिक्ट के अनुसार उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मैंने महसूस किया कि गतिरोध पूरा हो गया था और अब एकमात्र रास्ता किसी तीसरे पक्ष को किसी न किसी क्षमता में लाना था। इस उद्देश्य के लिए मैंने सुझाव दिया कि संयुक्त राष्ट्र संगठन को बुलाया जाए। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 35 इस पर कुछ बहस हुई है कि क्या भारत ने संयुक्त राष्ट्र से संपर्क करने के लिए गलत रास्ता चुना है। 2019 में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि भारत संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 35 के तहत संयुक्त राष्ट्र गया था जो विवादित भूमि से संबंधित है।अगर चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत संयुक्त राष्ट्र जाते तो यह भारतीय भूमि पर पाकिस्तान द्वारा अवैध कब्जे का मामला बनता। संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड के अनुसार भारत ने सुरक्षा परिषद को भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा स्थिति की सूचना दी। जिसमें आक्रमणकारी, पाकिस्तान से सटे क्षेत्र के आदिवासी शामिल थे। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 33-38 में छह अध्याय आते हैं, “पेसेफिक सेटलमेंट ऑफ डिस्प्यूट” जिसका शीर्षक है। बहरहाल, पंडित नेहरू ने जो गलती की उसकी सजा जम्‍मू-कश्‍मीर दशकों से भुगत रहा है। पाकिस्‍तान भी लगातार नेहरू के उसी बात को हर मंच पर उठाता है, जिसके तहत उन्‍होंने यूएन का दरवाजा खटखटाया था।  इसे भी पढ़ें: Truth of PoK-VII | पीओके को हासिल करने में क्या कोई कानूनी बाध्यता है? | Teh Tak