नीतीश की नाराजगी की हैं कई वजहें, पहले से ही देते रहे हैं संकेत, समझिए I.N.D.I.A. गठबंधन से उनकी नाखुशी के कारण

पटनाः बिहार के सीएम और इंडी एलायंस के सूत्रधार की भूमिका में रहे नीतीश कुमार अपने ही गठबंधन से नाराज हैं। नीतीश नाराज हैं या खुश, इसका संकेत वे पहले से ही देने लगते हैं। विपक्षी गठबंधन का हिस्सा रहते हुए उन्होंने कई मौकों पर नाराजगी के संकेत दिए। यह अलग बात है कि उनके संकेतों को समझने में इंडी अलायंस के नेता चूक गए। अब तो उनके मन की खटास पराकाष्ठा पर पहुंच गई है। जिन्हें नीतीश कुमार थके-दगे कारतूस और गड़बड़ दिमाग वाले नेता लग रहे थे, अब उन्हें भी इस बात का एहसास हो रहा होगा कि टाइगर ‘अभी जिंदा है’। जेडीयू नेता और बिहार सरकार में मंत्री अशोक चौधरी ने भी हाल ही में यह डायलाग दिया था- ‘टाइगर अभी जिंदा है। हमारा नेता जिधर, उधर का पलड़ा भारी।‘ आइए, जानते हैं कि कब-कब नीतीश ने नाराजगी के संकेत दिए।जल्दी काम पूरा कीजिए, कभी भी हो सकते हैं चुनाव नीतीश कुमार वर्ष 2023 में दो मौकों पर कह चुके थे कि कभी भी चुनाव हो सकते हैं। आखिरी बार अगस्त 2023 में कहा था कि चुनाव कभी भी हो सकते हैं। उन्होंने कहा था- चुनाव कभी भी हो सकते हैं। यह जरूरी नहीं कि चुनाव समय पर ही हो। केंद्र वाले पहले भी चुनाव करा सकते हैं। यह बात हम पिछले सात-आठ महीने से कह रहे हैं कि ये लोग पहले भी लोकसभा चुनाव करा सकते हैं। यह बात उन्होंने नालंदा में कही थी। इससे पहले जून 2023 में ग्रामीण विभाग की योजनाओं की समीक्षा बैठक के दौरान नीतीश ने कहा था- कौन जाने कब चुनाव हो जाए। इसका कोई ठिकाना नहीं है। हम तो शुरू से ही कह रहे हैं और जल्दी कीजिए। जितना जल्दी करवा दीजिएगा, उतना अच्छा है। कब चुनउवा होगा, कोई जानता है जी! कोई जानता है कि अगले ही साल चुनाव होगा। इसलिए जरा तेजी में काम कीजिए, समझ गए न! बीजेपी एमएलसी संजय मयूख के घर प्रसाद खाने गए 26 मार्च 2023 को चैती छठ के मौके पर खरना का प्रसाद ग्रहण करने नीतीश बीजेपी के एमएलसी और राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय मयूख के घर अपनी मंडली के साथ पहुंचे थे। बीजेपी से अलग होने के बाद भी उनके रिश्ते भाजपा नेताओं से बने रहे हैं। संजय मयूख को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का काफी करीबी माना जाता है। संजय मयूख बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया हेड भी हैं। तब भी सियासी हलचल तेज हुई थी। हलचल इसलिए थी कि 2022 में नीतीश कुमार राबड़ी देवी के आवास पर आयोजित दावत-ए-इफ्तार में शामिल हुए तो बिहार में सत्ता का समीकरण ही बदल गया। नीतीश ने एनडीए छोड़ महागठबंधन के साथ सरकार बना ली थी।विपक्षी गठबंधन की बेंगलुरु बैठक में दिखी नाराजगीविपक्षी गठबंधन इंडी अलायंस की बेंगलुरु में 18 जुलाई 2023 को बेंगलुरु में दूसरी बैठक हुई। नीतीश गए तो उन्हें एयरपोर्ट से बैठक स्थल तक अपने खिलाफ नारे लिखे पोस्टर-बैनर दिखे। इससे उनका मन खट्टा हो गया। उन्हें इस बात से और चिढ़ हुई कि बैठक में वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं मिला। वे सामान्य सदस्य की तरह बैठे रहे। उसी बैठक में उन्हें संयोजक बनाने की चर्चा थी, लेकिन इस पर तो कोई बात ही नहीं हुई। नीतीश चार्टर्ड प्लेन से बेंगलुरु गए थे, लेकिन व्यस्तता बता कर प्रेस कांफ्रेंस में शामिल हुए बगैर पटना लौट आए। तब भी उनकी नाराजगी की खूब चर्चा हुई थी। हालांकि दो दिन बाद वे मीडिया के सामने आए और सफाई दी कि उन्हें अगले दिन राजगीर महोत्सव में शामिल होना था, इसलिए प्रेस कांफ्रेंस में शामिल नहीं हुए। उनकी नाराजगी की बात बेमानी है। तेजस्वी पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई से हैं नाराज वर्ष 2017 में तेजस्वी यादव के खिलाफ सीबीआई ने जब जांच शुरू की तो नीतीश ने महागठबंधन का साथ छोड़ दिया था। तब उन्होंने कहा था कि तेजस्वी अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए पहले जनता के बीच जाएं। अब ईडी-सीबीआई ने जमीन के बादले नौकरी मामले में फिर तेजस्वी को जांच के दायरे में लिया है। तेज प्रताप को छोड़ लालू यादव के पूरे परिवार को ही जांच एजेंसियों की कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। शुक्रवार को सियासी उलट-फेर की चर्चाओं के बीच शाम को राबड़ी देवी को ईडी ने नोटिस थमा दिया। लालू-राबड़ी से पटना दफ्तर में ही ईडी पूछताछ करने वाला है। ऐसे दागदार लोगों की सोहबत नीतीश कुमार जैसी शख्सियत को सूट नहीं करती है। संभव है कि नीतीश इसलिए भी उखड़े-उखड़े नजर आ रहे हैं।आरजेडी नेताओं के हिन्दू विरोधी बयान से नाराजगी आरजेडी ने अपने नेताओं को हिन्दू देवी-देवताओं के खिलाफ बयानबाजी की खुली छूट दे दी है। इसकी शुरुआत आरजेडी कोटे से बने बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने की थी। वे रामचरित मानस, तुलसी दास और मनुस्मृति के खिलाफ अपने बयानों के लिए कुख्यात रहे हैं। उनके साथ अब आरजेडी के ही विधायक फतेह बहादुर भी शामिल हो गए हैं। देवी-देवताओं के बारे में इनकी लगातार आ रही टिप्पणियां नीतीश जैसे सर्व धर्म समभाव वाले आदमी को नागवार लगती रही हैं। आरजेडी ने कभी इन पर अंकुश लगाने की कोशिश भी नहीं की। नीतीश ने मंत्रिमंडलीय सहयोगी होने के नाते चंद्रशेखर को समझाने की कोशिश की थी, पर उन्होंने हिन्दू विरोधी राग अलापना बंद नहीं किया। तेजस्वी यादव ने भी अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बहाने हिन्दू भावनाओं को भड़काने वाला बयान दिया। इससे नीतीश कफी असहज महसूस कर रहे हैं।सुनील सिंह और सुधाकर की बयानबाजी से भड़के नीतीश कुमार की सरकार की आलोचना से आगे बढ़ कर आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के विधायक बेटे सुधाकर सिंह ने काफी वक्त तक उनकी व्यक्तिगत आलोचना का अभियान चलाया। नीतीश की नाराजगी की खबरें आईं तो आरजेडी ने सुधाकर को शो काज तो दिया, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई आज तक नहीं हो पाई। सुधाकर के बाद राबड़ी देवी को अपनी मुंहबोली बहन बताने वाले एमएलसी सुनील कुमार सिंह ने मैदान संभाल लिया। सोशल मीडिया को उन्होंने नीतीश की आलोचना का माध्यम बनाया। नाम लिए बगैर इशारों-इशारों में सुनील सिंह ने नीतीश पर हमला अब तक जारी रखा है। नीतीश ने महागठबंधन विधानमंडल दल की बैठक में सुनील सिंह को खूब सुनाया भी था, लेकिन अंकुश नहीं लग पाया। अब तो आरजेडी के विधायक भाई वारेंद्र ने लालू की कृपा से नीतीश के सीएम बनने की बात कह कर उनके गुस्से की आग और भड़का दी है।और भी कई कारण हैं, जिनसे नीतीश नाराज हुए शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक से शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर की लड़ाई सर्वविदित है। यह जानते हुए कि केके पाठक नीतीश कुमार के भरोसेमंद अफसरों में हैं, चंद्रशेखर ने उनके खिलाफ अभियान छेड़ दिया था। हालांकि नीतीश ने इस पर काबू पा लिया और चंद्रशेखर की हेकड़ी गुम कर दी। लेकिन चंद्रशेखर के बोल तो अब भी नीतीश को परेशान करते हैं। कभी इंडी अलायंस का संयोजक बनने का इंतजार करने वाले नीतीश ने अगर संयोजक बनने से इनकार कर दिया तो यह उनके मन का गुबार ही था। चार बैठकों तक नीतीश इंतजार करते रहे। पांचवीं बैठक में उन्हें यह पद आफर हुआ भी तो इस टिप्पणी के साथ कि ममता बनर्जी उन्हें संयोजक बनाने के पक्ष में नहीं हैं। शायद ही कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में संयोजक बनना पसंद करेगा।जेडीयू को तोड़ने की आरजेडी की कोशिश से हैं दुखी नीतीश कुमार को सबसे अधिक तकलीफ उन खबरों से हुई, जिसमें कहा गया कि आरजेडी नीतीश की जगह तेजस्वी यादव को सीएम बनाने के लिए जेडीयू को तोड़ने की फिराक में है। जब उन्हें यह जानकारी हुई कि जेडीयू के कुछ विधायकों ने इस संबंध में कोई गोपनीय बैठक की है तो उन्होंने सबसे पहले अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को हटाया। उसके बाद से नीतीश की तल्खी तेज हो गई। पहली जनवरी को नये साल के साथ राबड़ी देवी का जन्मदिन भी था। नीतीश ने उन्हें शुभकामनाएं नहीं दीं। लालू आवास पर जब-तब पहुंच जाने वाले नीतीश ने आवाजाही भी बंद कर दी। पखवाड़े भर लालू से उनकी बोलचाल बंद रही। नये साल में पहली बार दही-चूड़ा भोज में दोनों नेता आमने-सामने हुए।