‘ज्ञानवापी पर फैसला जल्दबाजी में दिया गया’, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उठाए सवाल

नई दिल्ली/वाराणसी: ऑल इंडिया ने शुक्रवार को कहा कि वाराणसी जिला अदालत के परिसर में स्थित तहखाने में ‘पूजा’ करने की अनुमति देने संबंधी फैसले पर ‘जल्दबाजी’ की है। कहा कि वह न्याय पाने के लिए इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएगा।बोर्ड के तत्वावधान में मुस्लिम संगठनों ने कहा कि वे अपनी चिंताओं से अवगत कराने के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से समय मांग रहे हैं और वे देश के प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ को भी पत्र लिख सकते हैं। मुस्लिम संगठनों ने यह भी कहा कि देश में उत्पन्न होने वाले विवादों को रोकने के लिए पूजा स्थल अधिनियम, 1991 को अक्षरश: लागू किया जाना चाहिए।हाई कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को तत्काल राहत देने से इनकार किया ने ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर में स्थित तहखाने में पूजा की अनुमति वाले वाराणसी की अदालत के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर मस्जिद कमेटी को तत्काल राहत देने से शुक्रवार को इनकार कर दिया।ज्ञानवापी मस्जिद का प्रबंधन करने वाली अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी ने वाराणसी की अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील दायर की है। न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने मस्जिद कमेटी की अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अगली सुनवाई छह फरवरी को होगी। हालांकि, अदालत ने तहखाने में पूजा अर्चना पर रोक लगाने का कोई आदेश पारित नहीं किया।मस्जिद बनाने के लिए मंदिर तोड़ना गलत धारणा हैऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने कहा कि मस्जिद में पूजा की अनुमति देने से न केवल मुसलमानों को, बल्कि धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखने वाले अन्य धर्मों के लोगों को भी दुख हुआ है। उन्होंने कहा कि यह धारणा गलत है कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को तोड़ा गया था। इस्लाम मस्जिद बनाने के लिए किसी की जमीन छीनने की इजाजत नहीं देता है।मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को नहीं गिराया गयारहमानी ने कहा कि अदालत ने इस पर जल्दबाजी में फैसला सुनाया और दूसरे (मुस्लिम) पक्ष को विस्तार से अपनी दलीलें रखने का मौका भी नहीं दिया गया। इससे न्यायपालिका में अल्पसंख्यकों के विश्वास को ठेस पहुंची है। बाबरी मस्जिद के फैसले में यह स्वीकार किया गया था कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को नहीं गिराया गया था, बल्कि आस्था के आधार पर दूसरे पक्ष के पक्ष में फैसला किया गया था। अदालतों को तथ्यों के आधार पर फैसला देना चाहिए न कि आस्था के आधार पर। उन्होंने कहा कि पूजा स्थल अधिनियम एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानून है, क्योंकि हम इसके माध्यम से विवादों को रोक सकते हैं। अदालत ने 31 जनवरी को दिया था आदेशवाराणसी की अदालत ने 31 जनवरी को दिए अपने आदेश में हिंदू श्रद्धालुओं को ज्ञानवापी मस्जिद परिसर स्थित तहखाना में पूजा अर्चना करने की अनुमति दी थी। अदालत ने कहा था कि जिला प्रशासन अगले सात दिन में इस संबंध में आवश्यक व्यवस्था करे। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी (अरशद मदनी गुट), जमीयत प्रमुख मौलाना महमूद मदनी (महमूद मदनी गुट), एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता एस क्यू आर इलियास समेत अन्य मौजूद थे।मुस्लिमों को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गयामौलाना अरशद मदनी ने दावा किया कि मुस्लिम पक्ष को अदालत के समक्ष अपना मामला पेश करने का मौका नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि हम ऐसा करना चाहते थे और मौका नहीं दिया जाना बहुत निराशाजनक है। हम इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे। यदि इतना बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय कहता है कि वह न्यायपालिका पर विश्वास खो रहा है तो यह देश के लिए अच्छी बात नहीं है। मदनी ने कहा कि कुछ लोग कह रहे हैं कि ज्ञानवापी का मामला पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के बाद अस्तित्व में आया, लेकिन कानून का मूल सिद्धांत यह है कि पूजा स्थल जो 1947 में था, वही रहेगा।मुसलमानों को गलत ढंग से पेश किया जा रहाजमीयत के दूसरे धड़े का नेतृत्व करने वाले मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि यह देश का दुर्भाग्य है कि मुसलमानों को गलत ढंग से पेश किया जा रहा है। एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता इलियास ने कहा कि संगठन मुसलमानों से संयम बरतने की अपील करते हैं, क्योंकि अगर उन्होंने धैर्य खो दिया तो यह न तो उनके लिए अच्छा होगा और न ही देश के लिए।पूजा का अधिकार दिए जाने पर आश्चर्य जतायामुस्लिम संगठनों ने एक बयान में कहा कि हमारा मानना है कि इस बार देश की गरिमा और न्यायिक प्रणाली और प्रशासनिक मामलों की निष्पक्षता से समझौता किया गया है। समय पर इसका संज्ञान लेना सभी संवैधानिक अधिकारियों की प्रमुख जिम्मेदारी है। इसमें कहा गया है कि इस महत्वपूर्ण समय में भारतीय मुसलमानों के प्रतिनिधियों के रूप में हमने राष्ट्रपति को इन चिंताओं से अवगत कराने के लिए समय देने का अनुरोध किया है। हमें उम्मीद है कि वह अपने स्तर पर इन मुद्दों के समाधान के लिए कदम उठा सकती हैं। इसके अतिरिक्त, हमारा इरादा मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को भारत के प्रधान न्यायाधीश तक सम्मानजनक और उचित तरीके से पहुंचाने का भी है। मुस्लिम संगठनों ने ज्ञानवापी मस्जिद के तहखाने में अचानक पूजा शुरू करने पर गहरा अफसोस और चिंता व्यक्त की। मुस्लिम संगठनों के नेताओं ने वाराणसी जिला न्यायाधीश के फैसले पर आश्चर्य और निराशा व्यक्त की।