9 जुलाई 1992 से शुरू हुई वो कारसेवा, जब जोशी, उमा ने उठाया तगाड़… राम मंदिर का निर्माण शुरू

अयोध्या: उत्तर प्रदेश में 1991 की विधानसभा चुनाव में एक नई सरकार चुनकर आ गई थी। मुलायम सिंह यादव सरकार का पतन हो चुका था। प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। अब सब की नजर भाजपा की नई सरकार पर थी, मेरी भी। भाजपा जो 1990 से लगातार के मुद्दे को लेकर मुखर थी। प्रदेश में सरकार बनाने के बाद उसके अगले कदम की सभी प्रतीक्षा कर रहे थे। लोग देखना चाहते थे कि क्या भाजपा सरकार बनाने के बाद राम मंदिर के मुद्दे पर क्या कदम उठाती है? हालांकि, कल्याण सरकार ने शुरुआती दिनों में राम मंदिर की चर्चा के बाद कोई ठोस कदम नहीं उठाया। कोई एक्शन नहीं होने से लोगों का गुस्सा बढ़ने लगा। कल्याण सिंह सरकार तक शिक्षा- परीक्षा सुधारों के जरिए अपनी विकास की छवि को प्रदर्शित करने में लगी थी। लेकिन, लोगों की अपेक्षा राम मंदिर के मुद्दे पर भाजपा सरकार के अगले कदम पर था। सरकार भी जानती थी कि इस मुद्दे के स्तर पर उनकी ओर से कोई कदम नहीं उठाया जा सकता है। सरकार भी मुद्दे में कोर्ट के आदेशों की आने की बात करने लगी तो लोगों ने पूर्व की सरकार और कल्याण सरकार की राम मंदिर मसले पर तुलना शुरू कर दी। कल्याण सरकार लगातार लोकप्रियता खोती जा रही थी। भाजपा के सामने चुनौती ऐसे कोई मुद्दे को खड़ा करने की थी, जिससे पार्टी की छवि लोगों के बीच फिर से बढ़ाया जा सके। हिंदुत्ववादी पार्टी के तौर पर स्थापित छवि को पार्टी गिरने नहीं देना चाहती थी। केंद्र में बनी कांग्रेस की पीवी नरसिंह राव सरकार की पैनी नजर यूपी पर थी। नरसिंह राव सरकार किसी भी स्थिति में मुद्दे को हवा दिए जाने से रोकने में जुटे हुए थे। हालांकि, खुलकर कांग्रेस भी राम मंदिर के मुद्दे का विरोध करती नहीं दिख पा रही थी। 1992 के पहले तीन माह अनिश्चितता में बीत चुके थे। अब हिंदुत्वववादी संगठनों का धैर्य जवाब देने लगा था। वहीं, सरकारें कोर्ट पर भरोसा रखने का अनुरोध करती रही। मुलायम सरकार के कारसेवकों पर गोली चलाए जाने की घटना से आक्रोशित विश्व हिंदू परिषद का अब धैर्य जवाब देने लगा था। जनता भी सरकार से कार्रवाई की मांग करने लगी। ऐसे में विश्व हिंदू परिषद आगे आई। मई- जून 1992 में अयोध्या में कारसेवा का फैसला लिया गया। विश्व हिंदू परिषद ने जून के आखिर में यह घोषित किया। मैं अयोध्या जो 1990 से लगातार युद्ध में थी। वह एक बार फिर गरमाने वाली थी। प्रदेश की राजनीति में बड़ा भूचाल आने के संकेत थे। मैं अयोध्या हूं और मैं उस जुलाई 1992 की कहानी सुनाती हूं।9 जुलाई से शुरू हो गई कारसेवामैं आज से करीब 23 साल पहले भी इसी तरह से उत्साहित थी। प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद से राम मंदिर निर्माण की अफवाह उठ रही थी। जमीन पर कोई काम नहीं हो रहा था। अप्रैल- मई से इस दिशा में प्रयास शुरू हुआ। दावा किया जा रहा था कि जुलाई के पहले पखवाड़े में मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। इसके लिए 100 फीट लंबे और 80 फीट चौड़े चबूतरे का निर्माण किया जाना था। विश्व हिंदू परिषद की ओर से अंदर ही अंदर तैयारी चल रही थी। लेकिन, जैसे ही यह मामला जुलाई की शुरुआत में आम लोगों के बीच आया, अचानक 9 जुलाई 1992 को मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को शुरू कर दिया गया। इस घटना ने देश की राजनीति के मूड को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। वीएचपी ने जिस प्रकार से निर्माण की योजना पर काम शुरू किया, उससे साफ था कि यह एक पूरी प्लानिंग के तहत इस कार्य को किया गया।क्या हुआ था 8 जुलाई को8 जुलाई 1992 को अयोध्या में हलचल अचानक तेज हो गई थी। कई बड़े नेता अयोध्या में कैंप कर रहे थे। 8 जुलाई की रात विनय कटियार विवादित स्थल पर पहुंचे। वहां पर 1989 में मंदिर के शिलान्यास के बाद उस स्थल पर जो छतरी लगाई गई थी। उन लोगों ने उसे हटा दिया। विनय कटियार और उनके साथियों के इस एक्शन ने 9 जुलाई की सुबह होने वाली कार्रवाई का भेद खोल दिया। 9 जुलाई की सुबह विवादास्पद स्थल पर सर्वदेव अनुष्ठान की तैयारी थी। महंत रामचंद्र परमहंस उस सुबह अन्य साधु- संतों और तीर्थयात्रियों के साथ वहां पहुंचे। उनके साथ कुछ कारसेवक छोटे- छोटे कलश में सरयू का जल लेकर आए थे। शिलान्यास स्थल के आसपास की जमीन पर जल छिड़ककर उसे पवित्र किया गया। शिलान्यास स्थल के छोटे चबूतरे पर निर्माण शुरू करने के लिए जैसे ही दीपक जलाए गए। साधु- संतों ने शंख की ध्वनि से पूरे इलाके को गूंजायमान कर दिया।विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता और साधु- संत उस स्थल पर पूरी कार्रवाई कर रहे थे, जिसे हाई कोर्ट ने विवादित घोषित कर दिया था। हाई कोर्ट ने बाबरी परिसर के 2.77 एकड़ जमीन के हिस्से को विवादित घोषित करते हुए इसे राज्य सरकार को अधिग्रहित कर दिया था। इसका सीधा मतलब यह था कि वहां किसी प्रकार का निर्माण नहीं किया जा सकता है।जोशी ने शुरू किया निर्माणरामभक्त 9 जुलाई से कारसेवा की शुरुआत कर रहे थे। प्रदेश में कल्याण सरकार थी। ऐसे में किसी प्रकार की दमनात्मक कार्रवाई की उम्मीद कारसेवकों को भी थी। हालांकि, यह कारसेवा अक्टूबर 1990 जैसी बड़ी नहीं थी। इसके बाद भी करीब 10 हजार कारसेवक अयोध्या पहुंचे हुए थे। पूजन का कार्यक्रम संपन्न होने के बाद निर्माण कार्य शुरू किया जाना था। निर्माण कार्य के लिए मजदूरों को बुलाया गया था। राम जन्मभूमि न्यास की ओर से ठेकेदार को काम दिया गया था। श्रमिक जब तक आते, तब तक निर्माण कार्य शुरू करने की बेचैनी कहें या उत्सुकता तब नेताओं को बर्दाश्त नहीं हो रही थी। सुबह 11 बजे वीएचपी के अशोक सिंघल, सांसद विनय कटियार, उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा जैसे नेताओं ने तगाड़ उठाया। वे गारा उठाकर शिलान्यास स्थल की ओर बढ़ने लगे। देखते ही देखते चार हजार साधु और स्वयंसेवक गारा उठाने के लिए लाइन में लग गए थे। पूरा वातावरण जय श्रीराम के नारों से गूंज उठा। मुरली मनोहर जोशी को हाथ में करनी (निर्माण में लगने वाला उपकरण) लिए निर्माण स्थल पर बैठे देखा गया। अलग ही नजारा था। सुबह 11.30 बजे से निर्माण का काम राम जन्मभूमि न्यास की ओर से नियुक्त ठेकेदारों और करीब 50 मजदूरों के जिम्मे आ गया था। हालांकि, कारसेवकों का जोश कम नहीं रहा था। राम तब हुए राजनीतिकहाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ कार्रवाई हो रही थी। केंद्र और राज्य सरकार इस मुद्दे पर कोई कार्रवाई करने के मूड में नहीं दिख रही थी। इसका कारण यह था कि केंद्र की पीवी नरसिंह राव सरकार उस दौरान हर्षद मेहता स्कैम के कारण विवादों में घिरती दिख रही थी। राव सरकार के वाणिज्य मंत्री पी. चिदंबरम पर हर्षद मेहता से कनेक्शन सामने आया। विवाद में नाम आने के कारण चिदंबरम को राव सरकार से इस्तीफा देना पड़ा। चिदंबरम पर आरोप था कि उनकी कुछ फर्जी कंपनियों ने हर्षद मेहता के फर्म में इन्वेस्ट किया था। वहीं, भाजपा सरकार भी लोकप्रियता खो रही थी। जनाधार को बचाए रखने के लिए मंदिर के मुद्दे पर चुप्पी ही कल्याण सरकार को लोकप्रिय बना सकती थी। इस कारण केंद्र और राज्य सरकार ने मंदिर निर्माण के मुद्दे को एक प्रकार से हरी झंडी दे दी। सीएम कल्याण सिंह और भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी इसे एक मौके के तौर पर देख रहे थे।भारतीय जनता पार्टी वीएचपी के राम मंदिर की घोषणा के साथ अपने पुराने मुद्दे पर वापस लौट आई। वहीं, हर्षद मेहता स्कैम से ध्यान भटकाने के लिए राव सरकार ने भी इस मुद्दे को हवा ही दी। वीएचपी के मंदिर निर्माण के कार्यक्रम की शुरुआत के बाद दिल्ली तक एक्शन शुरू हो गया। मुद्दा राम मंदिर ही बन गया। तमाम चर्चाएं थम गई। पीवी नरसिंह सरकार ने तब केंद्रीय गृह मंत्री शंकर राव चह्वाण के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल अयोध्या भेजा। केंद्रीय गृह मंत्री करीब 35 मिनट तक अयोध्या में रहे।लगता रहा मंदिर वहीं बनाएंगे का नाराशंकर राव चह्वाण जब विवादित परिसर में पहुंचे तो वहां करीब 10 हजार कारसेवकों की भीड़ जुटी हुई थी। वे निर्माण कार्य में लगे थे। मंदिर के लिए चबूतरा बने रहे कारसेवक ‘जय श्री राम’ और ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ का नारा लगा रहे थे। विवादित स्थल के दौरे के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री राम जन्मभूमि वाले इलाके में भी गए। वहां उन्होंने प्रसाद लिया। रामलला के पुजारियों ने उन्हें रामनामी चादर पहनाई। केंद्रीय गृह मंत्री के दौरे की जानकारी मिलने के बाद सीएम कल्याण सिंह ने मंत्रिमंडल सहयोगी लालजी टंडन को वहां भेजा था। लालजी टंडन केंद्रीय गृह मंत्री को विवादास्पद ढांचे के चारों तरफ घुमाया। साधु- संतों और महंतों से बातचीत की। इसके मौजूद लोगों और मीडिया ने जब उन्हें घेरा तो शंकर राव चह्वाण ने इस मामले में मैं यहां कुछ भी नहीं कह सकता हूं। मुझे अपनी रिपोर्ट कैबिनेट, संसद और राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में रखी है। चह्वाण यहां कह गए कि वैसे यह मुद्दा कोर्ट का है। यह टकराव के संकेत थे। जिसके लिए भाजपा तैयार बैठी थी।आडवाणी का वह ऐतिहासिक बयानकेंद्रीय गृह मंत्री के दौरे के बाद कांग्रेस ने विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और भाजपा पर आरोप लगाने का मौका दे दिया। भारतीय जनता पार्टी कहां पीछे हटने वाली थी। भाजपा सांसद विनय कटियार ने केंद्रीय गृह मंत्री के दौरे पर कहा कि अच्छा हुआ, उन्होंने अपनी आंखों से सब देख लिया। मुझे उम्मीद है कि इससे कांग्रेस प्रदेश की भाजपा सरकार के खिलाफ मामला नहीं बनाएगी। हालांकि, लोकसभा में तब लालकृष्ण आडवाणी का ऐतिहासिक बयान आया। उन्होंने कहा कि हमारे विरोधी भले ही निर्माण से विचलित हैं, पर इससे देश के करोड़ों लोगों में उत्साह भर गया है। 9 जुलाई 1992 को शुरू हुई कारसेवा 26 जुलाई तक चली थी। इन 17 दिनों में देश का माहौल गर्मा गया था। संसद से लेकर अयोध्या तक बवाल था। 13 जुलाई 1992 को केंद्रीय गृह मंत्री शंकर राव चह्वाण ने लोकसभा में बयान दिया। केंद्रीय गृह मंत्री ने संसद में कहा कि अयोध्या में चल रहे निर्माण और राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद ढांचे की सुरक्षा के लिए किए गए इंतजामों को मैंने देखा। मैंने 12 जुलाई 1992 को अयोध्या का दौरा किया। निरीक्षण के बाद मेरी राय यह है कि यूपी सरकार ने अधिग्रहीत जमीन पर निर्माण कार्य जारी रखने की इजाजत दी है। यह कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। उन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार करने की बात भी कही। इसका अर्थ यह था कि कारसेवा उस समय नहीं रोकी जानी थी।हाई कोर्ट का आदेश, साधुओं का आक्रोशविवादित स्थल पर निर्माण कार्य को तेज किया। वहीं, शहर में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ने लगी थी। टकराव जैसे हालात थी। इसी बीच 15 जुलाई 1992 को इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा आदेश आया। तत्काल कारसेवा को रोकने का अदेश दिया गया। राज्य सरकार को दो दिनों में जवाबी हलफनामा दायर करने का आदेश दिया गया। कोर्ट का फैसला आते ही साधु- संत आक्रोशित हो गए। उनकी प्रतिक्रिया स्पष्ट थी कि कारसेवा नहीं रोकी जाएगी। लोकसभा का सत्र चल रहा था। कांग्रेस और भाजपा सदन में आमने-सामने थी। इसी बीच भाजपा ने ऐलान किया कि 20 जुलाई को अयोध्या दिवस मनाया जाएगा। विपक्ष की ओर से राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। 15 जुलाई से इस पर बहस शुरू हुई। पीएम पीवी नरसिंह राव ने तीन दिनों की चर्चा के बाद 17 जुलाई को अपनी सरकार बचा ली।संसद से अयोध्या तक राजनीतिक तपिश का शिकार हो रही थी। उस समय राज्यपाल बी. सत्यनारायण रेड्‌डी ने अयोध्या में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को लागू कराने में कल्याण सरकार के फेल होने की रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में लिखा गया कि आदेश को लागू करने की इच्छाशक्ति राज्य सरकार में है ही नहीं। इसी बीच कल्याण सिंह का बयान आया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इमरजेंसी स्कीम के तहत ताकत के बल पर मंदिर निर्माण रोकना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुने बिना केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एकतरफा फैसला सुना दिया है।सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाईतत्कालीन सीएम कल्याण सिंह के बयान पर तब खूब चर्चा हुई थी। दरअसल, सरकार की ओर से अयोध्या में चबूतरा निर्माण की बात कही जा रही थी। वहीं, कल्याण सिंह ने अपने बयान में इसे मंदिर निर्माण कहा था। मामले पर 22 जुलाई 1992 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के सभी मुद्दों का हल करने के लिए बड़ी खंडपीठ की पेशकश की। शर्त लगाया गया कि राज्य सरकार को तत्काल अयोध्या में चल रहे निर्माण को रोकना होगा। संतों को मनाने में सब जुट गए। माहौल बिगड़ने लगा तो पीएम राव ने कोशिश शुरू की। 22 जुलाई को उन्होंने बीजेपी के सीनियर नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी और विजयाराजे सिंधिया से मुलाकात की। उनसे मंदिर निर्माण रुकवाने की अपील की गई।विश्व हिंदू परिषद ने मान- मनौव्वल के बाद 24 जुलाई 1992 को निर्माण कार्य रोकने की बात मान ली। वीएचपी ने रणनीति बदलते हुए मंदिर परिसर के दक्षिण पश्चिम कोने में स्थित शेषावतार मंदिर में कारसेवा का ऐलान किया। यह सरकार की ओर से अधिग्रहीत 2.77 एकड़ जमीन के बाहर था। महंत नृत्य गोपाल दास ने पीएम राव से मुलाकात के बाद कहा कि कारसेवा जारी रहेगी, जगह बदल जाएगी। 26 जुलाई 1992 को विवादास्पद स्थल पर मंदिर का निर्माण रुक गया।सरकार ने की वादाखिलाफीकारसेवा को रोकने में पीएम पीवी नरसिंह राव भी पूरी तरह से एक्टिव दिखे थे। 25 जुलाई को उनका एक प्रतिनिणि वीएचपी नेता अशोक सिंघल से मिला। अशोक सिंघल को भरोसा दिलाया गया कि प्रधानमंत्री व्यक्तिगत तौर पर मामले को देखेंगे। तीन माह में बातचीत के जरिए मुद्दे का हल निकाला जाएगा। पीएम के आश्वासन के बाद अशोक सिंघल ने निर्माण कार्य रोक दिया। ऐलान किया गया कि अक्टूबर या नवंबर में फिर कारसेव शुरू की जाएगी। इसे बाद पीएम राव बैठक करते रहे। अपनी बातों से पलटते रहे। प्रधानमंत्री ने मंदिर आंदोलन के नेताओं को भी तोड़ने का प्रयास किया। मुद्दे का सरकार के स्तर पर कोई हल नहीं निकलता देखकर वीएचपी ने 6 दिसंबर 1992 को एक बार फिर कारसेवा का ऐलान कर दिया। वहीं, राम जन्मभूमि के विवादित 2.77 एकड़ जमीन अधिग्रहण की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 3 दिसंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया। नेता इस फैसले को 6 दिसंबर से पहले आने की उम्मीद कर रहे थे। पेंच सुलझाने के लिए पीएम नरसिंह राव एक्टिव हुए। बैठकों का कोई नतीजा नहीं निकला।नाराज हुए थे आडवाणीकेंद्रीय गृह मंत्री एसबी चह्वाण और भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी की एक बैठक 17 नवंबर 1992 को हुई। इसमें कोई रास्ता नहीं निकला। 18 नवंबर को पीएम राव और आडवाणी मिले। बैठक में पीवी नरसिंह राव अपनी बात से बार- बार पलट रहे थे। इससे आडवाणी नाराज हो गए। 19 नवंबर को नरसिंह राव और सीएम कल्याण सिंह की मुलाकात हुई। इस बैठक में भी राम मंदिर मुद्दे पर बात आगे नहीं बढ़ पाई। 30 नवंबर को नरसिंह राव ने नानाजी देशमुख और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बैठक की। बैठक में प्रतीकात्मक कारसेवा पर सहमति बनी। तय किया गया कि कारसेवा अदालती झंझटों से बचते हुए होगी। बैठक में कोर्ट के फैसले का मुद्दा छिड़ा।कोर्ट का फैसला आने की स्थिति में कारसेवा वैधानिक हो सकती थी। सभी नेता चाहते थे कि राज्य और केंद्र सरकार मिलकर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट से फैसले पर तेजी लाने के लिए कहें। पीएम राव से अपील की गई कि कोर्ट भले पूरा फैसला न सुनाए। कम से कम इसका ऑपरेटिव पार्ट सुना दे। इससे कारसेवा के शांतिपूर्ण संपन्न होने की उम्मीद थी।फिर पलटे पीएम नरसिंह रावपीएम कार्यालय में अयोध्या प्रकोष्ठ के प्रमुख नरेश चंद्रा ने 5 दिसंबर 1992 को इलाहाबाद हाई कोर्ट से 2.77 एकड़ विवादित जमीन के अधिग्रहण के मु्द्दे पर ऑपरेटिव हिस्से को सुनाने के अनुरोध का दावा किया। नरेश चंद्रा ने कहा कि हाई कोर्ट ने राज्य सरकार इसकी गुजारिश करेगी। केंद्र की ओर से इसका समर्थन किया जाएगा। यूपी सरकार की ओर से जब हाई कोर्ट में इससे संबंधित आवेदन किया गया तो केंद्र के वकील ही नहीं पेश हुए। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी केंद्र के खिलाफ लोगों में शक गहरा गया। इसे पीएम नरसिंह राव के एक बार फिर पलटने के रूप में देखा जाता है।कल्याण ने पहले ही दिए थे संकेतवीएचपी के कारसेवा के ऐलान के बाद तेजी से राजनीति बदलने लगी थी। पीवी नरसिंह राव से 19 नवंबर को मुलाकात के दौरान सीएम कल्याण सिंह ने कारसेवा का ब्यौरा दिा था। उन्होंने साफ किया था कि अयोध्या में कानून व्यवस्था को खराब नहीं होने दिया जाएगा। कोर्ट का कोई आदेश नहीं होने के बाद वीएचपी, आरएसएस और भाजपा ने इस मामले में माना कि कारसेवा को कानूनी मंजूरी मिली हुई है। वीएचपी की ओर से सांकेतिक कारसेवा का दावा किया जा रहा था। भाजपा नेता भी कोर्ट की ओर से पूजा- पाठ की अनुमति मिलने का दावा कर रहे थे। वीएचपी की ओर से विवादित स्थल को साफ- सुथरा करके पूजा- पाठ किए जाने की बात कही गई। इसमें सांकेतिक तौर पर एक पिलर के निर्माण की बात कही गई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने किसी प्रकार के निर्माण पर रोक लगाई थी। कोर्ट ने कारसेवा के दौरान आदेश का पालन होता देखने के लिए ऑब्जर्वर नियुक्त कर दिया था।उस रात अटल का वह भाषणराम मंदिर का जब भी जिक्र होते की अटल बिहारी वाजपेयी का भी जिक्र होता है। भले ही 6 दिसंबर 1992 की कारसेवा को लेकर अटल बिहारी वाजपेयी अयोध्या नहीं गए थे। लेकिन, 5 दिसंबर 1992 की शाम को लखनऊ में दिया गया भाषण आज भी याद किया जाता है। अटल जी ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला लिया है, उसका अर्थ मैं ये निकालता हूं कि यह कारसेवा को नहीं रोकता है। सचमुच में सुप्रीम कोर्ट ने हमें दिखा दिया है कि हम कारसेवा करेंगे, रोकने का तो सवाल ही नहीं है। कल कारसेवा करके अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट के किसी निर्णय की अवहेलना नहीं होगी। कारसेवा करके सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का सम्मान किया जाएगा। वहां नुकीले पत्थर निकले हैं, तो उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता है। तो जमीन को समतल करना पड़ेगा। बैठने लायक करना पड़ेगा। तभी तो यज्ञ का आयोजन होगा। अटल जी के इस के इस भाषण में कंकड़- पत्थर को साफ करने का मतलब, बाबरी मस्जिद को विवादित स्थल से हटाए जाने से लगाया जाता है।