22 नवंबर 1991 की वो सर्द शाम, 31 साल बाद भी अनसुलझी लखनऊ के ‘ज्ञानू दादा’ की मर्डर मिस्‍ट्री

लखनऊ: थानों में उसके खिलाफ कई एफआईआर दर्ज होने के बावजूद उसका नाम लखनऊ विश्‍वविद्यालय के लोकप्रिय छात्र नेताओं में शुमार था। पुलिस उसे लुटेरा कहती थी, लेकिन विवि परिसर में जूनियर से लेकर सीनियर तक का वह ‘ज्ञानू दादा’ हुआ करता था। पुलिस का मानना था कि उसकी जगह जेल में हैं, लेकिन कैंपस के लड़के ‘ज्ञानू दादा’ के लिए जान देने तक के लिए तैयार रहते थे। 22 नवंबर 1991 की शाम कैंपस में आग की तरफ खबर फैली कि आईटी चौराहे पर ‘ज्ञानू दादा’ को गोली मार दी गई है। छात्रावासों से लड़कों का हुजूम आईटी चौराहे की तरफ दौड़ पड़ा। पुलिस की फिक्र ज्ञानू की हत्या से ज्यादा उससे फूटने वाले गुस्से और उपद्रव को लेकर थी। आनन-फानन आईटी से लेकर हजरतगंज तक के बाजार बंद करवा दिए गए।

आईटी-विश्‍वविद्यालय रोड पर आवागमन भी बंद करवा दिया गया। पुलिस ने ऐलान शुरू कर दिया कि यह कानून-व्यवस्था का मामला है। सभी छात्र छात्रावासों में लौट जाएं और पुलिस को जांच करने दें। ज्ञानू दादा यानी ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह लखनऊ विश्‍वविद्यालय छात्रसंघ की उस यूनियन में उपाध्यक्ष था, जिसके अध्यक्ष ब्रजेश पाठक (वर्तमान में यूपी के डिप्टी सीएम) थे। ज्ञानू की हत्या क्यों हुई, यह सवाल आज तक अनसुलझा ही है। पुलिस ने जिस थ्योरी के आधार पर हत्याकांड के आरोपी तय किए थे, वे सभी साक्ष्यों के अभाव में बरी हो गए। पुलिस रंजिश का परिणाम बताती रही लेकिन समर्थकों ने कैंपस में उसकी प्रतिमा ‘शहीद’ बताते हुए लगाई और हर पुण्यतिथि पर आज भी कार्यक्रम होते हैं।

1983 में लिया यूनिवर्सिटी में दाखिला
वह अस्सी का दशक था। उस दौर में लखनऊ विश्‍वविद्यालय के तीन छात्रावासों हबीबुल्लाह, बलरामपुर और तिलक का खास नाम था। छात्रसंघ चुनाव में इन छात्रावासों का ‘आशीर्वाद’ मिले बिना प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित नहीं मानी जाती थी। इसी दौरान 1983 में इलाहाबाद से आए ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह उर्फ ज्ञानू ने बीए में दाखिला लिया। हालांकि, ज्ञानू मूलरूप से बलिया का रहने वाला था, लेकिन उसका परिवार इलाहाबाद में बस गया था। लविवि आने पर ज्ञानू को हबीबुल्लाह हॉस्टल में कमरा आवंटित हुआ। उन दिनों हॉस्टल का अध्यक्ष हरिश्चंद्र सिंह था। हॉस्टल में रहते हुए ज्ञानू ने बीए, एमए (दो बार) और एलएलबी के बाद पीएचडी में दाखिला लिया था। ज्ञानू जल्द हरिश्चंद्र का करीबी दोस्त बन गया। हरिश्चंद्र ने 1989-90 में उसे छात्रसंघ उपाध्यक्ष का चुनाव लड़वाया था, लेकिन जीत नहीं सका। हालांकि 1990-91 में छात्रसंघ का उपाध्यक्ष बन गया। तब बृजेश पाठक छात्रसंघ अध्यक्ष और धीरेंद्र बहादुर सिंह महामंत्री (बीजेपी के पूर्व विधायक) निर्वाचित हुए थे।

दर्ज हो चुके थे कई आपराधिक मामले
लखनऊ में तैनात रहे एक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी के मुताबिक, लखनऊ विश्‍वविद्यालय में सक्रिय होने के साथ ही ज्ञानू की बैठक कई अपराधियों के साथ भी होने लगी थी। चुनाव जीतने से पहले ज्ञानू के खिलाफ अलग-अलग थानों में लूट, धमकी, वसूली और मारपीट से जुड़े आधा दर्जन से अधिक मामले दर्ज हो चुके थे। कई बार उसे जेल भी जाना पड़ा था। छात्रसंघ का उपाध्यक्ष चुने जाने के बाद ज्ञानू की दबंगई और बढ़ गई। चुनाव जीतने की खुशी में उस समय शहर के एकमात्र पांच सितारा होटल क्लार्क अवध में पार्टी हुई थी। कहते हैं कि हबीबुल्ला हॉस्टल में ज्ञानू और उनके समर्थकों के लिए खाना होटल क्लार्क अवध से ही आता था। उस दौर में नई फिल्मों के टिकट ब्लैक होते थे, लेकिन ज्ञानू की लिखी पर्ची पर समर्थक सिनेमा हॉलों में सिर्फ फ्री में मूवी ही नहीं देखते थे बल्कि उनके लिए कॉफी और कोल्ड ड्रिंक की व्यवस्था भी मैनेजर करते थे।

आईटी चौराहे पर हत्या
ज्ञानू और उसके साथियों की बैठकी रोज शाम आईटी चौराहा स्थित बंगाली दादा की मिठाई के दुकान के पास हुआ करती थी। 22 नवंबर 1991 की शाम ज्ञानू, हरिश्चंद्र सिंह के साथ किसी काम से चारबाग गया था। लौटने में देर हो गई। छात्रावास होते हुए स्कूटर से दोनों करीब सात बजे बंगाली दादा की दुकान के पास पहुंचे। रोज बैठकी में जुटने वाला कोई नहीं दिखा। इस बीच ज्ञानू के स्कूटर खड़ी करते ही पहले से मौजूद तीन-चार लड़कों ने आकर उसके पैर छूए और कुछ समझने से पहले ही पिस्टल निकालकर फायरिंग शुरू कर दी। ज्ञानू को चार गोलियां लगी और वहीं गिरकर उसकी मौत हो गई। हरिश्चंद्र ने किसी तरह भागकर दुकान में छुपकर अपनी जान बचाई। हालांकि उसके हाथ में भी एक गोली लगी। ज्ञानू को गोली मारे जाने की खबर आग की तरफ फैली। छात्रों के हंगामे के बीच पुलिस अधिकारियों ने चश्मदीद गवाह हरिश्चंद्र सिंह की तहरीर पर हसनगंज थाने में हत्या और हत्या के प्रयास की एफआईआर दर्ज करवाई। इसमें संजय सिंह, अभय सिंह और जिया खान को नामजद किया गया। उस दौरान में क्राइम रिपोर्टिंग करने वाले संजय द्विवेदी बताते हैं कि संजय और जिया दोनों ज्ञानू के साथी थे। संजय का साथी अभय सिंह भी ज्ञानू के पास आता-जाता रहता था। केस दर्ज कर पुलिस ने तीनों नामजद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।

एकजुट हुए विरोधियों को बाहुबली का संरक्षण
संजय द्विवेदी के अनुसार, हत्या की वजह जानने की कोशिश के दौरान पुलिस के सामने कई बातें आईं। पता चला कि ज्ञानू की दबंगई इतनी बढ़ गई थी कि विरोधी एकजुट होने लगे। गोरखपुर के एक बाहुबली का संरक्षण भी मिल गया था। इसके बाद विरोधियों ने ही संजय और उसके साथियों के कंधे पर हाथ रखकर हत्या करवाई। पुलिस की तफ्तीश में यह बात भी सामने आई कि एक ‘काम’ की रकम के बंटवारे को लेकर ज्ञानू और संजय सिंह में विवाद हुआ था। ज्ञानू ने सिर्फ दस फीसदी हिस्सा ही संजय सिंह को दिया था। इतना ही नहीं विरोध करने पर आईटी चौराहे पर सरेआम संजय सिंह को थप्पड़ मार दिया था। बताया जाता है कि थप्पड़ का बदला लेने के लिए ही संजय सिंह ने ज्ञानू के विरोधियों से हाथ मिला लिया था। विरोधियों में गोरखपुर की टीम के साथ संजय डे का नाम भी सामने आया। लेकिन, पुलिस किसी नतीजे पर पहुंचती, इससे पहले ही सरकार ने जांच सीबी सीआईडी को सौंप दी। सीबी सीआईडी में मामले की तफ्तीश लंबे समय तक लटकी रही और फिर फाइनल रिपोर्ट लगा दी गई। वादी हरिश्चंद्र सिंह की करीब 12 साल पहले अपने गांव में ही तालाब में डूबने से मौत हो गई। वहीं, हत्या के बाद भी लंबे समय तक लखनऊ विश्‍वविद्यालय में ज्ञानू का नाम चलता रहा। ज्ञानू के नाम पर ही ओंकार भारती बाबा पहले छात्रसंघ महामंत्री और फिर अध्यक्षी का चुनाव जीते। समर्थकों ने छात्रसंघ भवन में ज्ञानू की प्रतिमा स्थापित करवाई और हर साल पुण्यतिथि भी मनाई जाती है।