आत्महत्याओं के सवालों में घिरा IIT इंस्टीट्यूट, काउंसलर ने दिए विस्फोटक स्थिति के संकेत

लखनऊ/कानपुर: देश की सबसे मुश्किल परीक्षाओं में से एक जेईई मेन और एडवांस को पास करने के बाद आईआईटी कैंपस में स्टूडेंट्स को जगह मिलती है। यहां पहुंचने के बाद बच्चों को अपना सपना साकार होने जैसा लगता है। हालांकि आईआईटी कैंपस में लगातार हो रहे सुसाइड से कहानी कुछ और ही दिखाई पड़ रही है। कानपुर आईआईटी में 30 दिन के अंदर ही तीन स्टूडेंट्स के सुसाइड ने सबको हिलाकर रख दिया है। एक तरफ आईआईटी कानपुर इस पर खुलकर बात नहीं कर रहा, दूसरी तरफ स्टूडेंट्स और परिजनों के मन में आईआईटी का खौफ बढ़ता जा रहा है। राज्यसभा के शीतकालीन सत्र में भी आईआईटी कैंपस समेत उच्च शिक्षण संस्थानों में स्टूडेंट्स के सुसाइड का मामला जोरशोर से उठाया गया। इन सबके बाद भी ऐसे मामले नहीं रुक रहे हैं। ऐसे में एनबीटी ने आईआईटी के कुछ पूर्व और वर्तमान स्टूडेंट्स से वहां के माहौल को समझने की कोशिश की। साथ ही कैंपस के अंदर मीडिया की पाबंदी की वजह भी जानने का प्रयास किया गया। इससे जुड़ी रिपोर्ट आपके सामने पेश है…आईआईटी बीएचयू के पूर्व छात्र और स्टूडेंट पार्लियामेंट वाइस प्रेसिडेंट साई रेड्डी ने विस्तार से माहौल व अन्य मुद्दों पर बात की। उन्होंने ने बताया कि आईआईटी बीएचयू का लाइफ स्टाइल काफी अलग है। अगर अन्य आईआईटी से तुलना करेंगे, तो यहां पर सुसाइड के आंकड़े काफी कम मिलेंगे। यहां का प्लस प्वाइंट है कि हम लोग बाहर जा सकते थे, बाहर से लोग अंदर आ सकते थे। यहां पर डिपार्टमेंट में इतनी ज्यादा सख्ती नहीं है। वहीं दूसरे आईआईटी में डिपार्टमेंट के प्रोफेसर का प्रेशर काफी ज्यादा रहता है। वहीं पीएचडी स्टूडेंट्स पर उनके प्रोफेसर ज्यादा प्रेशर डालते हैं।काउंसलिंग से कुछ खास मदद नहींसाई रेड्डी ने आगे कहा, कई बार प्रोफेसर का प्रेशर वजह बनती है। वहीं दूसरी तनाव में बड़ी वजह जोन आउट (लोगों ने अलग होना) बनती है। इस दौरान वो अकेलेपन से सुसाइड के रास्ते पर चले जाते हैं। पीएचडी के मामले में बात की जाए तो कई बार गाइड से हेल्प नहीं मिल पाती है। वहीं बीटेक और एमटेक के मामले में एक ही पेपर में कई बार बैक आने से बच्चा तनाव में चला जाता है। इस दौरान अगर दूसरे बच्चे आगे निकल जाते है तो वो सुसाइड के ख्याल से घिर जाता है। स्टूडेंट काउंसलिंग की बता की जाए तो आईआईटी में बहुत खराब माहौल है। कुछ खास मदद नहीं मिलती है। बल्कि स्टूडेंट बॉडी (पार्लियामेंट) इसमें ज्यादातर सोशल सर्विस करती है। खर्च से बच रहें संस्थानसाई रेड्डी ने बताया कि वो जब वाइड प्रेसिडेंट थे तो काउंसलिंग सर्विस बीएचयू आईआईटी में शुरू कराई थी। कई बार एडमिनिस्ट्रेशन स्टूडेंट्स को इसके बारे में आगे आकर ठीक तरीके से जानकारी नहीं देता है। बीचएयू में एक सुसाइड के बाद योर दोस्त नाम से पोर्टल बनाया गया था। तब स्टूडेंट अपनी पहचान बिना बताए समस्या लिख सकते थे। साइकेट्रिस्ट और साइकोलॉजिस्ट से मिलने के लिए फ्री में अपॉइंटमेंट बुक कर सकते थे। ये 2017 से दो साल तक चला। इसी कंपनी ने कानपुर और खड़गपुर आईआईटी में भी सुविधा शुरू की थी। जहां तक मुझे पता है कि ये शायद जारी नहीं रहा, क्योंकि इसके लिए 10 लाख रुपये हर साल भुगतान करना होता था। ये स्टूडेंट के लिए काफी अच्छी सुविधा हो सकती है। वहीं साई रेड्डी ने अपने बैच के स्टूडेंट्स के बारे में कहा, काफी बच्चे डिप्रेशन में चले गए थे। इसमें खराब ग्रेड (एग्जाम में मार्क्स) बड़ी वजह थी। उन्होंने एक वजह कैंपस के आस-पास मिलने वाले नशीले पदार्थ की भी बताई। दबाव में कुछ स्टूडेंट इसके चलते गलत कदम भी उठा लेते हैं। फियर फैक्टर का प्रेशरसाई रेड्डी ने कहा, आईआईटी के लिए एंट्रेंस एग्जाम पास कर कैंपस के अंदर आने प्रेशर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। यहां पर परफॉर्मेंस से ज्यादा फियर (डर) का प्रेशर है। आईआईटी कैंपस में आकर ऑल इंडिया रैंक वन लाने वाला स्टूडेंट भी एक बार ये महसूस करता है। पढ़ाई के साथ ही एक्स्ट्रा करिकुलम एक्टिविटी भी एक बड़ी वजह है। कई बार वेटेज नंबरों से सीट पाने वाले स्टूडेंट दूसरे बच्चे के साथ पढ़ाई में बराबरी नहीं कर पाते, ये डिप्रेशन की एक आम समस्या बन जाती है। लोग ग्रामीण परिवेश के साथ अलग भाषा वाले राज्यों से भी आईआईटी पहुंचते है, इन्हें दूसरे स्टूडेंट्स के साथ घुलने मिलने में काफी वक्त लगता है। इस दौरान भेदभाव भी देखने को मिलता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में ऐसा नहीं होता है। आईआईटी बीएचयू पासआउट साई रेड्डी ने बताया, उन्होंने बीटेक प्लस एमटेक किया था। 2013 से 2018 तक कैंपस का हिस्सा रहें। फिलहाल बतौर फाउंडर हैदराबाद में एक स्टार्टअप कंपनी के ओनर हैं।कानपुर IIT में एकेडमिक करिकुलम ज्यादा कठिनआईआईटी कानपुर 2019 से पासआउट एक्स स्टूडेंट (नाम न लिखने की शर्त पर) ने बताया कि आईआईटी में प्रेशर और फ्रस्ट्रेशन के कुछ प्रमुख कारण है। इसमें एकेडमिक प्रेशर, परिवार का प्रेशर, पर्सनल रिलेशनशिप प्रॉब्लम सबसे ज्यादा देखने को मिलती है। मेरे टाइम में हिंदी मीडियम वाले दोस्त कैंपस में थे, उनको इंग्लिश समझने में काफी दिक्कत होती थी। आईआईटी कानपुर का एकेडमिक करिकुलम दूसरे IITs के मुकाबले काफी कठिन है। कई बार उन्हें पास करने में काफी दिक्कत आती है। ऐसे में जब पेपर में बैक पर बैक लगती है तो अच्छा खासा इंसान डिप्रेशन में चला जाता है। इस बीच उन्हें परिवार की इच्छाएं भी दिखने लगती है। अपने कई दोस्तों को उस समय इमोशनल और फाइनेंस लेवल पर सपोर्ट किया, ताकि वो कोई गलत कदम न उठाएं, तब बात नहीं बिगड़ी।एमटेक-पीएचडी में इतना प्रेशर क्यों?कम उम्र में बीटेक लेवल पर आईआईटी क्लियर करने वाले बच्चों में कॉन्फिडेंस ज्यादा रहता है। इन्हें प्रोफेसर का भी सपोर्ट मिलता है, वो हेल्प भी करते हैं। यहां प्रोफेसर कोर्स और पास होने तक जुड़े रहते हैं। वहीं एमटेक और पीएचडी में थीसिस (शोध) जुड़ जाता है। इसमें प्रोफेसर का नाम भी जुड़ जाता है। ऐसे में प्रोफेसर की भी जिम्मेदारी बन जाती है कि थीसिस बिल्कुल नए टॉपिक पर होना चाहिए। अगर इन मानक पर ध्यान नहीं दिया गया तो ये रिजेक्ट हो जाती है। ऐसे में न चाहते हुए भी प्रोफेसर की तरफ से स्टूडेंट पर प्रेशर बढ़ जाता है। ये थीसिस नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर जाती है। ऐसा नहीं है कि प्रोफेसर कुछ गलत सोचकर प्रेशर डालते हैं, वो भी चाहते हैं कि कॉलेज और स्टूडेंट का नाम हो। सभी स्टूडेंट्स की काउंसलिंग भी जरूरीआईआईटी में हो रहे सुसाइड केस को रोकने के लिए एक्स स्टूडेंट ने कुछ सुझाव भी दिए। उन्होंने कहा कि कानपुर ही नहीं हर आईआईटी कॉलेज में एक काउंसलिंग कमेटी होनी चाहिए। कम से कम एमटेक और पीएचडी स्टूडेंट्स के लिए इसका खास ध्यान दिया जाए और असेसमेंट हो। ऐसा नहीं है कि इसकी आईआईटी में व्यवस्था नहीं है, लेकिन इसकी जानकारी बहुत कम है। इसे जरूरत के हिसाब से नहीं बल्कि अनिवार्य स्तर पर लागू किया जाना चाहिए। (बता दें ये एक्स स्टूडेंट 2019 में आईआईटी कानपुर से बीटेक पास आउट होने के बाद अब बैंगलोर में नौकरी कर रहे हैं।) कहीं जॉब लग जाए बस!आईआईटी बीएचयू से 2021 में बीटेक पास आउट कार्तिक का कहना है कि कोर्स को ठीक से पढ़ा जाए तो अच्छे नंबर लाए जा सकते हैं। मुझे नहीं लगता है कि इसका कोई प्रेशर होता है। हालांकि प्लेसमेंट के समय जब कंपनियां आती है तो उसके लिए 6 महीने से 1 साल तक तैयारी करने में चला जाता है। ये एक बहुत बड़ा प्रेशर है, मैंने खुद भी इसका सामना किया है। ये लगता था कि कहीं जल्दी जॉब लग जाए बस। कॉलेज लाइफ में प्लेसमेंट और जॉब को लेकर सबसे ज्यादा प्रेशर महसूस किया। उन्होंने बताया कि ज्यादातर अच्छी कंपनियां 8 कम्युलेटिव ग्रेड पॉइंट एवरेज (सीजीपीए) वाले स्टूडेंट्स को ही कैंपस प्लेसमेंट में बैठने का मौका देती हैं। फर्स्ट ईयर में स्टूडेंट कुछ ज्यादा दबाव लेते हैं। आईआईटी में सलेक्शन के साथ मनपसंद कॉलेज को लेकर भी लोगों में टेंशन रहती है। मनपसंद कॉलेज नहीं मिलने के बाद मैंने कैंपस में कुछ लोगों को दबाव महसूस करते देखा। आईआईटी बीएचयू,रुड़की, कानपुर को टॉप रैंकिंग कॉलेज में गिना जाता है। एमटेक, पीएचडी वालों के लिए मौके कमकार्तिक ने बताया कि एमटेक और पीएचडी स्टूडेंट्स के लिए प्रेशर ज्यादा होता है, क्योंकि उनके लिए प्लेसमेंट के मौके बीटेक स्टूडेंट्स के मुकाबले कम होते हैं। ज्यादातर कंपनियां बीटेक स्टूडेंट्स को लेना पसंद करती हैं। वहीं जिन स्टूडेंट्स की बीटेक बैक बची होती है, उन्हें दिक्कत आती है। लेकिन इन्हें बैक क्लियर करने के लिए जून और जुलाई समर टर्म में मौका मिलता है। स्टूडेंट्स इसके जरिए खुद को हिम्मत दे सकते हैं। इसके जरिए सुसाइड के केस होने से बचाया जा सकता है। (बता दें कि इस समय कार्तिक बेंगलुरु की एक कंपनी में नौकरी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनका इस कंपनी में कैंपस प्लेसमेंट हुआ था।)कानपुर में स्टूडेंट्स पर प्रेशर है ज्यादाआईआईटी बीएचयू सेकेंड ईयर स्टूडेंट्स यशवंत ने बताया कि हमारे यहां फिलहाल माहौल काफी अच्छा है। बीटेक कोर्स में स्टडी और करिकुलम एक्टिविटी काफी अच्छी है। यशवंत ने कानपुर आईआईटी की हाल की घटनाओं के संबंध में कहा कि सुना है, वहां स्टूडेंट्स पर इंस्टीट्यूट में प्रेशर काफी ज्यादा है। बीएचयू आईआईटी की काउंसलिंग में बताया कि वो अभी भी वर्किंग है। साथ ही सीनियर भी अच्छी से गाइडेंस देते हैं। प्रोफेसर का बर्ताव भी उनके सभी के लिए अच्छा है।तीसरे-चौथे साल में बड़ा प्रेशरआईआईटी बीएचयू से 2018 में पास आउट एक स्टूडेंट ने नाम न लिखने की शर्त पर अपने अनुभव साझा किए। राहुल (बदला हुआ नाम) का कहना है कि हर कैंपस का अपना एक स्तर है। कानपुर कैंपस के बारे में ज्यादा एकेडमिक प्रेशर की बात हम लोगों ने भी सुनी है। आईआईटी में सबसे बड़ी बात ये है कि अलग-अलग राज्यों और शहरों से स्टूडेंट पहुंचते हैं। काफी लोगों को भाषा की दिक्कत भी आती है। कैंपस में इंग्लिश में पढ़ाया जाता है, जिससे कई स्टूडेंट पीछे छूट जाते है। कई बार ये स्टूडेंट, प्रोफेसर और दूसरे बच्चों के साथ बराबरी नहीं कर पाते। ये एक बड़ी वजह सुसाइड के केस में बन जाती है। बीटेक की बात की जाए तो तीसरे और चौथे साल में प्रेशर काफी बढ़ जाता है। ‘सारे प्रोफेसर अच्छे नहीं’राहुल ने कहा कि जब वो आईआईटी में थे, तब एक साल की फीस 1 लाख रुपये थी। मेस का खर्च अलग था। अब एक-दो साल पहले फीस 2.50 लाख रुपये कर दी गई है। उन्होंने बताया कि बीटेक के स्टूडेंट के लिए कंपनी ज्यादा आती हैं। उन्हें प्लेसमेंट मिलने में आसानी होती है। एमटेक और पीएचडी की बात की जाए तो उनके लिए मौके कम होते हैं। साथ ही इनके लिए सारे अच्छे प्रोफेसर नहीं हैं। हर आईआईटी में सपोर्ट के लिहाज से एक-दो प्रोफेसर अच्छे मिल जाएंगे। उन्होंने कहा कि ऐसे में एमटेक पूरा करने में 3 साल, पीएचडी पूरा करने में 6 साल तक का समय लग जा रहा है। ऐसे स्टूडेंट्स पर डिप्रेशन जल्दी हावी हो जाता है। पीएचडी करने वाले स्टूडेंट के संबंध में कहा कि उन्हें कैंपस में रहने लायक ही कुछ पैसे मिलते है। ऐसे में फाइनेंशियल प्रेशर भी सुसाइड के पीछे बड़ा कारण हो सकता है। कैंपस में आते ही जो सुसाइड केस हो रहे हैं, उसमें पर्सनल प्रॉब्लम भी एक बड़ा रोल हो सकता है।मेरे बैच टाइम भी हुई थी कई सुसाइडराहुल ने बताया कि उस दौर में काउंसलिंग जैसी सुविधा के बारे में याद नहीं। कैंपस के उन पांच साल के दौरान 3-4 स्टूडेंट्स ने सुसाइड किया था। पांचवें साल में एक काउंसलिंग सेल बना था, लेकिन अब उसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि किसी भी आईआईटी में एक-दो सुसाइड केस हर साल कॉमन से होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि आईआईटी में सुसाइड की कई वजह हैं। इसमें प्लेसमेंट, घर का दबाव, पढ़ाई की दिक्कत और क्लास में कॉम्पिटिशन, कई बार पर्सनल रिलेशन भी दिक्कत की वजह बन जाती है। उन्होंने एक बात पर जोर दिया कि बीएचयू के आस-पास ड्रग्स (गांजा) की पहुंच भी उन दिनों काफी बढ़ गई थी। ये डिप्रेशन में पहुंचाने का भी बन जाती है। उन्होंने अपने लास्ट ईयर का किस्सा याद करते हुए बताया कि एक स्टूडेंट आग लगाकर बिल्डिंग से कूद गया था। ये केस एडिक्शन की वजह से होने की बात कॉलेज प्रशासन ने कही थी।(बता दें कि एक्स स्टूडेंट ने बीटेक प्लस एमटेक 2013-2018 बैच में पास किया। इसके बाद दो साल जॉब की और फिर आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए किया। अब इन्होंने बैंगलोर में एक अच्छी नौकरी ज्वाइन कर ली है।)क्या कहते हैं कानपुर के सीनियर जर्नलिस्टकानपुर के सीनियर जर्नलिस्ट हैदर नकवी ने बताया कि वो आईआईटी से जुड़ी खबरें करीब 15 वर्षों से लिख रहे हैं। उन्होंने एक महीने के अंदर तीन स्टूडेंट की सुसाइड पर अपना व्यू एनबीटी के साथ साझा किया। उन्होंने बताया कि पल्लवी चिल्का को छोड़कर अन्य तीन सुसाइड एमटेक और पीएचडी स्टूडेंट्स से जुड़ी हैं। उन्होंने बताया कि इससे पहले 2022 में भी पीएचडी के स्टूडेंट प्रशांत सिंह ने भी सुसाइड की थी। यहां सुसाइड केस ग्रेजुएशन वालों से ज्यादा पीएचडी और पीजी (एमटेक) के सामने आ रहे हैं। कानपुर आईआईटी में प्रियंका जायसवाल (पीएचडी स्टूडेंट) की सुसाइड के बाद ये स्पष्ट हो गया है कि यहां कैंपस में कोई दिक्कत बड़े स्तर पर पनप रही है। इन स्टूडेंट्स में डर का भाव काफी ज्यादा है। इस पर आईआईटी कानपुर कुछ भी स्पष्ट नहीं बता रहा है।प्रेशर से निकलना बड़ा मुश्किलउन्होंने आगे कहा, आईआईटी में कॉम्पिटिशन बहुत ज्यादा है। टॉपर बच्चे भी इसमें पिछड़ जाते है। इस रेस में जो पीछे रह जाता है, वो डिप्रेशन में चला जाता है। मुझे पूर्व के काउंसलर ने बताया है कि इस स्तर के प्रेशर से निकलना हर किसी के बस की बात नहीं है। बच्चे इसमें एकांत में रहने लगते हैं। इसी दबाव में वो सुसाइड जैसे कदम बढ़ा रहे है। कोविड के बाद कैंपस में सामाजिक ताना-बाना काफी खराब हुआ है। पहले सीनियर भी नए स्टूडेंट्स की मदद कर देते थे। इस वक्त कानपुर कैंपस में अलग-अलग ग्रुप बनने जैसी स्थिति हो गई है।मीडिया से बना ली है दूरीहैदर नकवी ने कहा, कानपुर आईआईटी में पहले प्रोफेसर और स्टूडेंट्स से बात हो जाया करती थी। हालांकि अब ऐसे हाल हो गए है कि मीडिया से बिल्कुल दूरी ही बन चुकी है। अभी हाल में बच्ची के सुसाइड केस (प्रियंका जायसवाल) को मीडिया कवर करना चाहता था, लेकिन कैंपस के गेट पर सुरक्षाकर्मियों ने किसी को अंदर तक नहीं जाने दिया। उन्होंने आगे कहा, ऐसे में आईआईटी कानपुर कैंपस से जुड़ी स्टोरी करना भी मुश्किल हो चुका है, क्योंकि स्टोरी करने के लिए अधिकारी का वर्जन भी जरूरी है। इसके बिना आपकी स्टोरी कंफर्म नहीं होगी। यहां सब कुछ इनकॉग्निटो मोड पर है। उन्होंने अपना एक अन्य निजी अनुभव साझा किया कि यहां एक प्रोफेसर को किसी स्टोरी पर महज हां या नहीं कहने के लिए चार दिन लग गए।प्रोफेसर या साइंटिस्ट, किसके हाथ में बच्चे?कानपुर के सीनियर जर्नलिस्ट प्रवीण मोहता ने भी आईआईटी कानपुर से जुड़े कुछ तथ्य साझा किए। उन्होंने कहा, एक महीने के अंदर लगातार तीन सुसाइड से इतना तो साफ है कि अंदर ही अंदर कुछ गड़बड़ है। अब सवाल है कि गड़बड़ क्या है? एक बात ये भी है कि कानपुर या बनारस यूनिवर्सिटी का जो टॉपर आईआईटी में पहुंचता है, अमूमन यहां दूसरे बच्चों से पिछड़ जाता है। इससे डिप्रेशन में बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि 2020 में कोविड आ गया और सारी कैंपस एक्टिविटी जीरो हो गई। इससे पहले जूनियर किसी प्रॉब्लम में फंसता था तो सीनियर के पास जाता था और कोई रास्ता निकल आता था। अब सीनियर-जूनियर का मिलना कम हो गया है।कानपुर पुलिस का रोल काफी सीमितप्रवीण मोहता ने सुसाइड के मामलों पर पुलिस जांच को लेकर भी कुछ तथ्य रखें। उन्होंने कहा कि आईआईटी सेंट्रल इंस्टीट्यूट है। यहां पुलिस कैंपस में तब पहुंचती है, जब उसे बताया जाता है। सामान्य तौर पर आईआईटी कानपुर की अपनी सिक्योरिटी और मैकेनिज्म है। मेरी जानकारी में पुलिस तीनों ही मामलों में किसी अंतिम निर्णय तक नहीं पहुंच पाई है। पुलिस का रोल काफी सीमित हो गया है। उन्होंने कहा, आईआईटी कानपुर कैंपस में छात्रों का इतना बड़ा बवाल हुआ, उस पर भी कोई बयान नहीं आया है। कानपुर आईआईटी में इस वक्त फुल टाइम डायरेक्ट और डीन ऑफ स्टूडेंट्स अफेयर्स भी नहीं हैं।हालात अभी और विस्फोटक होंगेप्रवीण मोहता ने बताया, आईआईटी कानपुर के एक काउंसलर ने नाम न लिखने की शर्त इन तीन सुसाइड के बाद कहा है कि यहां स्टूडेंट सिर पर बहुत बोझ लेकर जी रहे है। एक प्रोफेसर ने बताया कि यहां अभी ऐसे बहुत से स्टूडेंट है, जो कि डरे हुए हैं। अगर इन्हें समय रहते काउंसलिंग सर्विसेज तक नहीं भेजा गया तो हालात अभी और विस्फोटक हो सकते है। ये सिर्फ कानपुर ही नहीं पूरे देश में आईआईटी कैंपस के लिए बात निकल कर सामने आ रही है। वहीं उन्होंने कहा, आईआईटी से पास होने वाले स्टूडेंट्स बुरी से बुरी स्थिति में 1 से 3 लाख रुपये महीने कमा लेंगे, लेकिन फिर भी ऐसी क्या स्थिति है कि वो सुसाइड का रास्ता अपना रहे हैं? उन्होंने आईआईटी के माहौल और स्टूडेंट के मेंटल हेल्थ को बड़े स्तर पर सुधारने की जरूरत बताई।आपको बता दें कि आईआईटी कानपुर एमटेक स्टूडेंट विकास मीणा ने 10 जनवरी को कैंपस में सुसाइड कर ली थी। ये कैंपस में एक महीने के अंदर सुसाइड की दूसरी घटना थी। नेमचंद्र मीणा ने आगे एनबीटी से कहा कि लगातार तीन सुसाइड केस से ये समझ में आ रहा है कि कहीं न कहीं एकेडमी में बच्चों पर प्रेशर डाला जा रहा है, क्योंकि सब लोग घर से नॉर्मल ही जा रहे हैं। अगर कैंपस में कोई प्रॉब्लम हो रही है, तो कम से कम पेरेंट्स को शामिल करते। यहां से कोई बच्चे के पास जाता तो शायद ऐसा नहीं होता। उन्होंने कहा, पुलिस केस दर्ज कराने के लिए उस वक्त कुछ भी समझ नहीं आ रहा था।क्या कहते हैं साइकोलॉजिस्टकल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर अस्पताल के एमएस और मनोचिकित्सक देवाशीष शुक्ला ने स्टूडेंट्स की मनोस्थिति पर बात की। उन्होंने बताया कि स्टूडेंट्स के इमोशनल पैटर्न को शुरू से गौर करने की जरूरत होती है। हाल में जिन स्टूडेंट्स ने सुसाइड किया है, उनकी हिस्ट्री चेक करेंगे तो कहीं न कहीं ऐसी चीज दिखेगी कि उसने इस मामले का जिक्र दोस्तों से जिक्र जरूर किया होगा। आज की डेट में फिजिकल हेल्थ से ज्यादा मेंटल हेल्थ जरूरी है। प्रोफेशनल स्टडीज के स्टूडेंट्स के व्यवहार में जरा सा बदलाव नजर आने पर तुरंत काउंसलर या डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। सुसाइड के ख्याल की शुरुआत के कुछ संकेत दिखते हैं। जैसे कि डिप्रेसिव बातें करना, लोगों से मिलना छोड़ देना, चिड़चिड़ापन बढ़ जाए तो आस-पास के लोगों को अलर्ट होने की जरूरत है।कानपुर पुलिस का रुखकानपुर पुलिस कमिश्नर से आईआईटी कानपुर से जुड़े मामले पर बात करने के लिए कई बार प्रयास किया गया। हालांकि उनके पीआरओ ने मीटिंग में होने की बात कही। खबर लिखे जाने तक कानपुर पुलिस की तरफ से उन्होंने कोई पक्ष नहीं दिया।कानपुर IIT से संपर्क करना मुश्किलएनबीटी कानपुर से हमारे सहयोगी सुमित शर्मा ने बताया कि यहां मीडियाकर्मी भी सीधे प्रवेश नहीं पा सकते हैं। आपको एक लंबे प्रोसेस के तहत गुजरना पड़ता है। दरअसल आईआईटी प्रशासन ने एक कंपनी को हायर किया है, उस कंपनी ने एक वाट्सग्रुप बनाया है। साथ ही कंपनी को अपने सवाल के साथ ईमेल करना होता है। इस पर कैंपस प्रशासन विचार करता है। उन्हें उपयुक्त लगने पर ही कोई जवाब या सवाल से जुड़ा वीडियो जारी किया जाता है।शिक्षा मंत्रालय इन मामलों पर कितना सख्त?दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र शर्मा आईआईटी और उच्च शिक्षण संस्थानों की लंबे समय से रिपोर्टिंग कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि राज्यसभा के शीतकालीन सत्र में यह सवाल उठा था कि क्यों आईआईटी में इतने सुसाइड केस आ रहे हैं? शिक्षा मंत्रालय की तरफ जवाब दिया गया कि आईआईटी, आईआईएम और उच्च शिक्षण संस्थानों को निर्देशित किया गया है, वो बच्चों की सुरक्षा के जरूरी कदम उठाए। इन बच्चों पर बेवजह का प्रेशर न बनाया जाए। सभी संस्थानों में काउंसलर की हर हाल में नियुक्ति की जाए। बच्चों की मदद के लिए एक कमेटी बनाई जाए तो 24 घंटे उपलब्ध हो। इसमें रैगिंग से लेकर साइकोलॉजिकल मदद के लिए मौजूद रहे। आईआईटी में आत्महत्या के इतने केस क्यों?भूपेंद्र शर्मा ने बताया, आईआईटी देश के सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक है। यहां पर सोशल और इकोनॉमिक बैकग्राउंड भी काफी मायने रखता है। हिंदी बैकग्राउंड के बहुत से बच्चे आते हैं। कई बार वो क्लास और कैंपस के माहौल के बीच तालमेल नहीं बैठा पाते हैं। वो टेस्ट और इंटरनल एग्जाम को लेकर प्रेशर में आ जाते हैं। हालांकि इस प्रेशर को खत्म करने की जिम्मेदारी इंस्टीट्यूशन पर है।क्या कहती है नई शिक्षा नीतिभूपेंद्र शर्मा ने आगे नई शिक्षा नीति 2020 का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इसमें कहा गया है कि आईआईटी, आईआईएम, सेंट्रल यूनिवर्सिटी, स्टेट यूनिवर्सिटी, प्राइवेट यूनिवर्सिटी सभी 8वीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में बच्चों को स्टडी मटेरियल दें। ताकि हिंदी माध्यम के बच्चे भी पढ़ सकें। हालांकि दिक्कत ये है कि नई शिक्षा नीति 2020 को आए केवल चार साल हुए हैं। इसे पूरे तरह से लागू होने में अभी कई साल लगेंगे। अभी शुरुआत की गई है कि बच्चों को उनकी भाषा में किताब उपलब्ध कराएं। हिंदी में पढ़ने की इच्छा रखने वाले बच्चों की क्लास अलग हों। इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी हिंदी में कराने का प्रयास है।IITs में हाल में हुईं घटनाएंआईआईटी कानपुर पीएचडी छात्रा प्रियंका जायसवाल ने 18 जनवरी 2024 को कैंपस में सुसाइड की।10 जनवरी 2024 को कानपुर आईआईटी से एमटेक कर रहे विकास कुमार मीणा ने सुसाइड की।19 दिसंबर 2023 आईआईटी कानपुर में प्रोजेक्ट एग्जीक्यूटिव ऑफिसर पल्लवी चिल्लका ने सुसाइड की थी।आईआईटी कानपुर से पीएचडी कर रहे प्रशांत सिंह ने सितंबर 2022 में आत्महत्या की।यहीं कार्यरत प्रोफेसर प्रमोद सुब्रमण्यम ने जुलाई 2020 में सुसाइड कर ली थी।आईआईटी कानपुर से पीएचडी कर रहे भीम सिंह ने 2018 और 2009 में एमटेक कर रहे जे सुमन ने भी आत्महत्या कर ली थी। ऐसे अन्य भी कानपुर कैंपस के कई मामले हैं।बीएचयू आईआईटी कैंपस के पीएचडी छात्र कुलदीप सिंह ने जून 2023 में आत्महत्या कर ली थी। वहीं देश भर की बात की जाए तो इस तरह के केस काफी संख्या में दर्ज हैं।(नोट – डिप्रेशन और पढ़ाई से लेकर किसी भी स्तर के तनाव को डॉक्टर और मनोचिकित्सक की मदद से कम किया जा सकता है। इसके लिए राज्य और केंद्र सरकार कई हेल्पलाइन भी संचालित करती हैं। इस पर आप संपर्क कर सकते हैं।)सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की हेल्पलाइन – 1800-599-0019 इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज – 9868396824, 9868396841, 011-22574820 हितगुज हेल्पलाइन, मुंबई- 022- 24131212 नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस -080- 26995000