अखिलेश के साथ जरूर खड़े पर भरोसा नहीं, क्या सैफई परिवार को एकजुट रख पाएंगी डिंपल? शिवपाल के बयान का समझिए मतलब

मैनपुरी: उत्तर प्रदेश के मैनपुरी लोकसभा सीट पर चुनावी माहौल इन दिनों गरमाया हुआ है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश संगठन से जुड़े तमाम शीर्ष नेता मैनपुरी में कैंप कर रहे हैं। जातीय समीकरणों को साध कर भाजपा समाजवादी पार्टी के गढ़ में सेंधमारी की तैयारी कर रही है। दूसरी तरफ, मुलायम कुनबा एक साथ चुनावी मैदान में उतर गया है। मैनपुरी लोकसभा उप चुनाव के नामांकन के पहले तक जो शिवपाल यादव, अखिलेश यादव से अपनी राहें अलग कर सियासत की बात कर रहे थे। वे अब बहू डिंपल यादव को जीत दिलाने के लिए दर-दर पहुंच रहे हैं। मतदाताओं को रिझा रहे हैं। मना रहे हैं। समझा रहे हैं। मुलायम सिंह यादव की विरासत के चुनाव की बात कर रहे हैं। साथ ही, बहू पर भरोसा भी जता रहे हैं। अखिलेश ने जो धोखा दे दिया है। डिंपल को साक्षी बता रहे हैं। कह रहे हैं, अब बहु साक्षी है। उसे आगे देखना होगा, अगर अखिलेश कोई गड़बड़ी किए तो। मतलब शिवपाल की राजनीति अपने स्तर से चुनाव प्रचार अभियान के पैरेलल चल रही है।

क्यों नहीं अखिलेश पर भरोसा?
शिवपाल यादव अखिलेश यादव के कारण ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में अलग-थलग पड़ गए। साल 2012 से पहले यूपी की राजनीति में शिवपाल यादव बड़ी भूमिका रखते थे। खास पर समाजवादी पार्टी में नंबर दो की। मुलायम सिंह यादव के बाद अगर किसी को जाना- पहचाना और माना जाता था तो शिवपाल यादव ही थे। सपा संस्थापक से कहीं बढ़कर। शिवपाल का सीधा जुड़ाव कार्यकर्ताओं से था, यह सबसे बड़ा कारण था। कार्यकर्ताओं को अगर नेताजी तक कोई बात पहुंचानी होती थी तो शिवपाल ही माध्यम बनते थे। लेकिन, वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल होते ही सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया।

यहीं से अखिलेश और शिवपाल के बीच की लड़ाई शुरू हुई। लड़ाई परिवार में नंबर दो बनने की। उत्तर प्रदेश के राजनीति में अपनी भूमिका की। बाद के समय में अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी को पूरी तरह से टेकओवर कर लिया। अब इस पार्टी में शिवपाल के लिए कोई स्कोप बचता नहीं दिख रहा था। शिवपाल को लेकर मुलायम सिंह यादव भी कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं दिख रहे थे। सपा में एक प्रकार से ऐसी स्थिति बना दी गई कि शिवपाल को वहां अपने लिए कोई स्थान नजर नहीं आया। यह अखिलेश का शिवपाल को बड़ा झटका था। वर्ष 2017 में स्थिति इतनी बिगड़ गई कि शिवपाल यादव को समाजवादी पार्टी से अलग राह बनाकर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का गठन करना पड़ा।

सपा से अलग होने के बाद शिवपाल और अखिलेश के बीच लगातार विवाद बढ़ता गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा- बसपा गठबंधन के सबसे खिलाफ रहने वाले नेता में शिवपाल यादव का नाम सबसे ऊपर शामिल था। हालांकि, यह गठबंधन लंबा नहीं चल पाया। फिर आया यूपी चुनाव 2022। एक बार फिर चाचा- भतीजा साथ आए। शिवपाल को अखिलेश ने भरोसा दिलाया कि परिवार एक हो जाएगा। यूपी चुनाव के मैदान में समाजवादी पार्टी ने शिवपाल यादव को स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल कर लिया। इसके बाद माना जा रहा था कि शिवपाल यादव की समाजवादी पार्टी में वापसी तय है। चुनाव हुआ। रिजल्ट आया। इसमें समाजवादी पार्टी महज 111 सीटों तक ही पहुंच पाई। इसके बाद शिवपाल यादव नजरअंदाज कर दिए गए।

अखिलेश ने शिवपाल को समाजवादी पार्टी का नेता ही नहीं माना। सपा की ओर से कहा गया कि प्रगतिशील समाजवादी पार्टी और सपा का गठबंधन चुनाव में हुआ था। प्रसपा के उम्मीदवार के तौर पर सपा का सिंबल शिवपाल को जारी किया गया था। बाद में अखिलेश ने यहां तक कह दिया था कि अगर शिवपाल यादव को लगता है कि उनकी उपेक्षा हो रही है तो वह जहां जाना चाहें, वहां जा सकते हैं। उनका इशारा भारतीय जनता पार्टी की तरफ था। तब शिवपाल और भाजपा की नजदीकी की खबरें लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में सुर्खियां बन रही थीं। शिवपाल कहीं नहीं गए। अखिलेश को पार्टी से निकालने तक की चुनौती दे डाली। मनमुटाव बढ़ता रहा। डीपी यादव और समाजवादी पार्टी से अलग-थलग किए गए सीनियर नेताओं को एक साथ जोड़ने की कवायद में जुट गए।

शिवपाल ने यादवलैंड की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की। इसी बीच मुलायम सिंह यादव का निधन हुआ और स्थिति बदल गई। अखिलेश यादव और शिवपाल यादव नजदीक आए हैं। मैनपुरी लोकसभा उप चुनाव के मैदान में डिंपल यादव के उतारे जाने के बाद शिवपाल यादव के सामने चुनौती बड़ी थी। नामांकन में उनके नहीं पहुंचने से परिवार की एकता पर सवाल उठा। यादवलैंड की पॉलिटिक्स की उंगली उनकी तरफ थी। उन पर परिवार को नजरअंदाज करने का आरोप लगा। परिवार का सीनियर सदस्य होने के नाते उन्होंने एक बार फिर चांस लिया है। दरसअसल, शिवपाल को मैनपुरी के चुनावी मैदान के साथ-साथ प्रदेश की यादव पॉलिटिक्स में एक विपक्षी नेता के तौर पर नहीं, मुलायम परिवार के सदस्य के तौर पर स्थापित करनी थी। डिंपल के साथ घूमते हुए वह इस बात को स्थापित कर रहे हैं।

धोखा मिला तो घाटे में रहेंगे अखिलेश
शिवपाल यादव ने मैनपुरी से राजनीति के नए समीकरण को स्थापित करने में सफलता हासिल कर ली है। जसवंतनगर विधानसभा सीट पर लगातार जनसंपर्क कर रहे हैं। दो कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन करवा चुके हैं। ऐसे में उनका ताजा बयान अखिलेश यादव को साफ संकेत है। इस बार धोखा दिया तो वे इसे ही मुद्दा बनाकर जनता के बीच पहुंच जाएंगे। अब तो उनको जिस प्रकार का भरोसा दिलाया गया है, उसकी साक्षी बहू डिंपल यादव के भी होने की बात कह रहे हैं। दरअसल, मैनपुरी सीट पर नामांकन के बाद अखिलेश और डिंपल ने इटावा में उनके आवास पर पहुंच कर मुलाकात की थी। इसके बाद से ही शिवपाल की सक्रियता काफी बढ़ी हुई है।

क्या है शिवपाल का बयान?
शिवपाल यादव ने मैनपुरी में चुनावी प्रचार अभियान के दौरान बयान दिया है कि अब जब उनकी बहू चुनाव लड़ रही है तो हम सभी लोग भी एक हो गए हैं। हमने अखिलेश से भी कह दिया है, अब हम लोग एक ही रहेंगे। डिंपल ने कहा था, अब एक ही साथ रहना है तो हमने भी डिंपल से कह दिया अगर अखिलेश गड़बड़ करें तो तुम्हें मेरे साथ ही रहना है। तुम ही गवाह हो। यहां जिस गड़बड़ शब्द का प्रयोग शिवपाल ने किया है, वहीं पर उनकी पीड़ा और अविश्वास का भाव छुपा हुआ दिखता है। हालांकि, मैनपुरी में वे घर-घर तक पहुंच कर बहू के लिए वोट मांग रहे हैं। मुलायम सिंह यादव की गैरमौजूदगी में उनकी प्रतिष्ठा का चुनाव होने की बात कर रहे हैं।