आंखों पर चश्‍मा, सिर पर साफा जिनकी आन्‍सरशीट देख टीचर ने जोड़ लिए थे हाथ… इन्‍हें पहचान पाए आप?

नई दिल्‍ली: आंखों पर काला चश्‍मा, सिर पर साफा, सफेद अचकन पहने इन शख्‍स को क्‍या आप पहचान पाए? ये कोई मामूली शख्‍सीयत नहीं हैं। आजादी के आंदोलन में इनकी अहम भूमिका रही है। स्‍वतंत्र भारत के इतिहास में इन्‍होंने बड़ा योगदान द‍िया है। अगर अब तक आप गेस नहीं कर पाए हैं तो हम इनके बारे में बताते हैं। तस्‍वीर में जो व्‍यक्ति आपको काले चश्‍मे में दिख रहे हैं वह डॉ राजेंद्र प्रसाद हैं। यह तस्‍वीर 9 अगस्‍त 1958 की है। तब डॉ राजेंद्र प्रसाद (Dr Rajendra Prasad) मद्रास में वृहदेश्‍वर मंदिर में दर्शन करने गए थे। राजेंद्र प्रसाद आजादी के बाद पहले कृषि मंत्री और संविधान बनने के बाद देश के पहले राष्‍ट्रपति बने। प्रसाद इकलौते राष्‍ट्रपति रहे जिन्‍होंने लगातार इस पद पर दो कार्यकाल पूरे किए। राष्‍ट्रपति के तौर पर उनका कार्यकाल सबसे लंबा 12 साल रहा। वह 26 जनवरी 1950 से लेकर 13 मई 1962 तक राष्‍ट्रपति रहे। बतौर कृषि मंत्री उनका कार्यकाल 15 अगस्‍त 1947 से लेकर 14 जनवरी 1948 तक रहा। प्रसाद बेहद मेधावी थे। कभी इनकी आन्‍सरशीट से प्रभावित होकर टीचर ने कॉमेंट किया था- ‘परीक्षार्थी परीक्षक से बेहतर’।

राजेंद्र प्रसाद महात्‍मा गांधी के समर्थक थे। 1931 में नमक सत्‍याग्रह और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों ने उन्‍हें जेल में डाल दिया था। 1947 में आजादी मिलने के बाद प्रसाद को संविधान सभा का अध्‍यक्ष चुना गया। इसी ने संविधान बनाया। 1950 में संविधान लागू होने पर राजेंद्र प्रसाद पहले राष्‍ट्रपति बने। अपने कार्यकाल में उन्‍होंने कई मौकों पर नेहरू सरकार को परामर्श दिया। 1957 में उन्‍हें दोबारा राष्‍ट्रपति चुना गया। वह दो कार्यकाल पूरा करने वाले देश के एकमात्र राष्‍ट्रपति थे।

भाई-बहनों में सबसे छोटे थे प्रसाद
डॉ राजेंद्र प्रसाद का जन्‍म 3 दिसंबर 1884 को बिहार में सिवान जिले के कायस्‍थ परिवार में हुआ। उनके पिता महादेव सहाय श्रीवास्‍तव संस्‍कृत और फारसी के प्रखर विद्वान थे। प्रसाद की मां कमलेश्‍वरी देवी बहुत भक्ति-भाव रखने वाली महिला थीं। वह बेटे को बचपन से रामायण और महाभारत की कहानियां सुनाया करती थीं। अपने भाई-बहनों में प्रसाद सबसे छोटे थे। तीन बड़ी बहनें और एक बड़ा भाई था।

9 अगस्‍त 1958 को तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद मद्रास के तंजौर में वृहदेश्‍वर मंदिर में दर्शन के लिए गए थे। तंजौर को अब तंजावुर के नाम से जाना जाता है। ऊपर तस्‍वीर उसी समय की है।

पढ़ाई-ल‍िखाई में हर जगह गाड़े झंडे
प्रसाद बेहद मेधावी थे। एलिमेंटरी एजुकेशन के बाद उनका छपरा जिला स्‍कूल में एडमिशन हुआ। जब वह सिर्फ 12 साल के थे, उनकी शादी राजवंशी देवी से हो गई थी। यह 1896 की बात है। इसके बाद वह बड़े भाई महेंद्र प्रसाद के साथ दो साल के लिए पटना के टीके घोष अकैडमी में पढ़ने चले गए थे। कलकत्‍ता यूनिवर्सिटी के एंट्रेंस एग्‍जाम में उन्‍हें पहली पोजिशन मिली थी। स्‍कॉलरशिप के तौर पर 30 रुपये महीने अवार्ड होने लगे।

1902 में प्रसाद कलकत्‍ता में प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ने लगे। शुरू में वह विज्ञान के छात्र थे। 1905 में उन्‍होंने फर्स्‍ट डिवीजन से ग्रेजुएशन किया। उनसे प्रभावित होकर एक बार उनकी आन्‍सरशीट पर एग्‍जामिनर ने लिख दिया था – परीक्षार्थी परीक्षक से बेहतर है। 1907 में प्रसाद ने कलकत्‍ता यूनिवर्सिटी से इकनॉमिक्‍स में एमए किया। इसके बाद वह मुजफ्फरपुर में लंगत सिंह कॉलेज में इंग्लिश के प्रोफेसर बन गए। बाद वह इसके प्रिंसिपल भी बने। बाद में उन्‍होंने कॉलेज छोड़ लॉ कॉलेज में दाखिला लिया। लॉ की पढ़ाई करते हुए वह कलकत्‍ता सिटी कॉलेज में इकनॉमिक्‍स भी पढ़ाते रहे। कानून की पढ़ाई में भी उन्‍होंने झंडे गाड़े। प्रसाद गोल्‍ड मेडल लेकर पास हुए। इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय से उन्‍होंने लॉ में पीएचडी की। 1916 में वह बिहार और ओडिशा हाई कोर्ट से जुड़ गए।