I.N.D.I.A की आपत्ति के बावजूद मोदी के साथ मंच साझा, आखिर पवार ने पराये के लिए अपनों को क्यों ठुकरा दिया?

नई दिल्ली: मौजूदा दौर में से बड़ा सियासी सौदागर शायद ही कोई हो। लेकिन वो कहते हैं ना, ‘मनजु बली नहीं होत है, समय होत बलवान।’ समय ने ऐसा करवट फेरा कि विपक्ष के सिरमौर शरद पवार अपने दल के ही दिग्गजों से मात खा गए। पवार की पार्टी एनसीपी दो फाड़ हो चुकी है। यह घटना तब हुई जब शरद पवार विपक्षी एकता के रथ के सारथी की भूमिका में दिख रहे थे। उम्र में वरिष्ठ और तुजर्बे के धनी शरद पवार से विपक्षी दलों ने बहुत उम्मीदें लगा रखी थीं तभी एनसीपी टूट गई। पवार एनसीपी के एक धड़े के प्रमुख रह गए। प्रमुख नेताओं का बड़ा हिस्सा अजित पवार के नेतृत्व में अलग हो गया। अब पवार संपूर्ण विपक्ष की चिंता करें या अपने दल की? यह सवाल इसलिए बहुत मायने रखता है क्योंकि पवार ने नए I.N.D.I.A (इंडिया) की मांग को ठुकराते हुए न केवल प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा किया बल्कि उनके सम्मान पाने के भी साक्षी बने। अपनों की आपत्ति खारिज, पराये से मुलाकात!पीएम के साथ प्लैटफॉर्म साझा करने को पवार की प्रतिबद्धता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इंडिया के घटक दलों के प्रतिनिधिमंडल से मिलने तक की जहमत नहीं उठाई। पवार दिल्ली में थे तब प्रतिनिधिमंडल में शामिल अलग-अलग विपक्षी दलों के नेताओं ने उनसे मुलाकात करने का समय मांगा। उनसे मुलाकात करना तो दूर, पवार दिल्ली में रुके ही नहीं और सीधे पुणे चले आए जहां पीएम के साथ उनका कार्यक्रम था। वक्त की नजाकत और पवार का कदमपवार ने ऐसा तब किया जब गठबंधन में उनके साथी दलों ने उनसे बार-बार आग्रह किया कि वो पीएम के साथ मंच साझा करने से बाज आएं क्योंकि इससे आम जनता के बीच अच्छा ऑप्टिक्स नहीं जाएगा। राजनीति में धारणा यानी पर्सेप्शन का बहुत महत्व होता है। जनता की नजर में अगर विपक्षी गठबंधन को लेकर शक-सुबहा है तो पवार के इस कदम से वह मजबूत ही होगा। इसलिए कांग्रेस समेत इंडिया के करीब सभी दलों ने पवार को रोकने की भरपूर कोशिश की, लेकिन वो सफल नहीं रहे। अब उनकी चिंता जरूर बढ़ेगी कि मतदाताओं के बीच इसका क्या संदेश जाएगा। पर्सेप्शन के खेल में विपक्ष को एक और मात!दरअसल, विपक्ष की समस्या यह है कि अतीत की नीतियों और वर्तमान दौर के कार्यक्रमों, दोनों ही मोर्चों पर वह जनता को लुभा नहीं पा रहा है। अतीत में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की 10 साल की सरकार में घपले-घोटालों और अनिर्णय की स्थिति ने मतदाताओं को गहरी निराशा में डाल दिया था। 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार बनने के बाद वो मजबूत विपक्ष के रूप में सही मुद्दे उठाने और उन्हें आगे बढ़ाने के दायित्व पर भी खरा नहीं उतर सका। ऊपर से अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंची बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर मतदाताओं के एक बड़े वर्ग के अटूट भरोसे ने विपक्ष की मुश्किलें और बढ़ा दीं। बीजेपी अपनी ताकत तो बढ़ाती ही है, विपक्ष को कदम-कदम पर कमजोर भी करती जा रही है। चूंकि बात शरद पवार की हो रही है तो महाराष्ट्र का ही उदाहरण ले लेते हैं। वहां पहले शिवसेना के टूटने से बीजेपी सत्ता में आ गई और एनसीपी टूटी तो नए गठबंधन के जरिए विपक्ष की बढ़ती ताकत का संदेश देने की कवायद को बड़ा झटका लगा। इंडिया ने जन्म ही लिया और बरसने लगी आफतअब पवार प्रकरण से जनता में ‘एकजुट विपक्ष’ का दावा कितना मजबूत रह पाएगा, इसका तो अंदाजा लगाया ही जा सकता है। इसी अंदाजे ने तो विपक्षी दलों को शरद पवार से मिन्नतें करने को मजबूर किया था। अब सोचिए, विपक्ष एकता की कवायद में पटना की पहली बैठक में नीतीश कुमार और लालू यादव कर्ता-धर्ता दिख रहे थे और आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल की नाराजगी की खबर आई। बेंगलोर की दूसरी बैठक से पहले एनसीपी के वो चेहरे गायब हो गए जो पटना की मीटिंग में शामिल थे क्योंकि पार्टी टूट गई। दूसरी तरफ, नीतीश-लालू पृष्ठभूमि में चले गए और केजरीवाल फ्रंटफुट पर खेलते दिखे क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने संसद में दिल्ली सर्विसेज के मामले पर केंद्र सरकार के विधेयक का विरोध करने का आश्वासन दे दिया। अब तीसरी मीटिंग जब मुंबई में होनी है, उससे पहले शरद पवार ने ‘अपनों’ के तमाम विरोध के बावजूद पीएम मोदी के साथ मंच साझा करके उहापोह की स्थिति पैदा कर दी। पवार इतने मंझे हुए नेता हैं कि उनके इस कदम को हल्के में लिया नहीं जा सकता, खासकर तब जब गठबंधन दलों ने इस पर आपत्ति जताई हो। ‘अपनों’ की आपत्ति नजरअंदाज करके ‘पराये’ से प्लैटफॉर्म साझा करके पवार क्या बताना और जताना चाहते हैं, इस सवाल पर मंथन तो होगा। विपक्षी एकता का हाल देखिएध्यान रहे कि शरद पवार ने पुणे में आयोजित तिलक पुरस्कार समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच पर दिखे। पवार ने इस समारोह में पीएम मोदी को लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित भी किया। शिवसेना (यूबीटी) के नेता और पवार के करीबी माने जाने वाले संजय राउत ने उम्मीद जताई थी कि पवार इस समारोह से दूर रहेंगे। उन्होंने कहा था, ‘पवार इतने अनुभवी नेता हैं, हमें उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह उनपर निर्भर है कि अपने रुख पर भ्रम को दूर करें।’ अब राउत के बयान को पीएम मोदी के साथ पवार की तस्वीर को मिलाकर देखें तो पता चल जाता है कि अनुभवी पवार ने क्या किया है। विपक्ष का हाल देखें कि एक तरफ पीएम के मंच पर पवार भी आए तो दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी के कार्यकर्ता सड़क पर प्रदर्शन कर रहे थे। पवार खेमे की एनसीपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा था, ‘चूंकि यह एक गैर-राजनीतिक कार्यक्रम है, इसलिए उन्होंने (पवार ने) इसमें भाग लेने का फैसला किया होगा, लेकिन हमारी पार्टी के कार्यकर्ता सड़कों पर प्रधानमंत्री के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेंगे। विरोध प्रदर्शन एक बड़े विपक्षी अभ्यास का हिस्सा होगा, जिसमें कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और कुछ सामाजिक कार्यकर्ता भारत गठबंधन के बैनर तले महात्मा फुले मंडई स्थल के बाहर तिलक प्रतिमा के सामने होंगे, जब मोदी वहां पहुंचेंगे।’