मनीष कश्यप और पत्रकारिता के ‘पैंतरे’…गिरफ्तारी के बाद उठ रहे गंभीर सवाल हैरान कर देंगे

Manish Kashyap News ओमप्रकाश अश्क, पटना। लाखों व्यूअरशिप वाले एक यू ट्यूब चैनल के पत्रकार मनीष कश्यप की गिरफ्तारी इन दिनों बिहार ही नहीं, पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। उनके समर्थक प्रदर्शन, सड़क जाम से लेकर बंद तक का आयोजन कर रहे हैं। मनीष ने सरेंडर के पहले एक वीडियो जारी कर कहा था कि आरजेडी नेता और बिहार के डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव के दबाव में उनकी गिरफ्तारी हुई है। उन्होंने तेजस्वी को चेतावनी भी दी थी कि 2025 में सीएम बनने का उनका सपना वह पूरा नहीं होने देंगे। सरेंडर करने के बाद मनीष कश्यप को बिहार की आर्थिक अपराध इकाई ने हिरासत में लेकर उनसे पूछताछ की। उनसे यह जानने की कोशिश की गयी कि उन्हें किन-किन लोगों से पैसे मिलते हैं। तमिलनाडु पुलिस अब अपने यहां ले जाकर उनसे पूछताछ करेगी।अब किसी को नजर नहीं आता लोकतंत्र पर खतराकेंद्र में बीजेपी के शासन के दौरान पत्रकारिता पर संकट, लोकतंत्र पर खतरा और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले का रोना रोने वाले कुछ पत्रकार और विपक्षी दलों के नेता मनीष कश्यप के मुद्दे पर खामोश हैं। आश्चर्य होता है कि बात-बात पर अभिव्यक्ति की आजादी पर संकट का रोना रोने वाले विपक्षी नेता अब यह नहीं कह रहे कि बिहारी श्रमिकों के साथ मारपीट के बहाने बिहार सरकार पर मनीष कश्यप ने जो सवाल खड़े किये, वे अब अभिव्यक्ति की आजादी से बाहर कैसे हो गये? सरकार की आलोचना करने से रोकना और इसके लिए आलोचना करने वाले के खिलाफ गिरफ्तारी-मुकदमे जैसी कार्रवाई ने राजनीतिक दलों के दोहरे चरित्र को उजागर कर दिया है।खबर सबने छापी-दिखाई तो मनीष पर ही एक्शन क्योंआश्चर्य की दूसरी बात यह है मनीष कश्यप ने तमिलनाडु की जिन घटनाओं का वीडियो फुटेज अपने यूट्यूब चैनल पर दिखाया, वही काम प्रिंट मीडिया और टीवी चैनलों ने भी किया। पर, बिहार सरकार की नजरों में उनके अपराध नहीं दिखे। इतना ही नहीं, बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने भी इसे लेकर ट्वीट किया। अपने सीनियर अधिकारियों को तमिलनाडु के अफसरों से बात करने का आदेश दिया। अफसरों की टीम भी तमिलनाडु भेजी। लेकिन यह किसी की आंखों में नहीं चुभा। और तो और, अगर मामले में सच्चाई नहीं थी, जैसा डेप्युटी सीएम तेजस्वी यादव बार-बार कहते रहे, तो मनीष के यूट्यूब चैनल को सूचना प्रसारण मंत्रालय की निगरानी रखने वाली इकाई ने प्रतिबंधित क्यों नहीं किया। हालांकि सूचना प्रसारण मंत्रालय गलत खबर दिखाने वाले चैनलों को ब्लैक लिस्टेड करने में कोताही नहीं बरतता। अब तक सौ से ऊपर ऐसे यूट्यूब चैनलों को प्रतिबंधित किया भी गया है। बिहारियों के साथ होती ही रहती हैं मारपीट की घटनाएंइसलिए मनीष कश्यप के आरोप में दम दिखता है कि बिहारियों के साथ तो अक्सर दूसरे राज्यों में मारपीट और भेदभाव की घटनाएं होती रहती हैं। तेजस्वी यादव के खिलाफ मनीष की टिप्पणी और तमिलनाडु में मारपीट के वीडियो दिखाना उनके लिए घातक सिद्ध हुआ। दरअसल जिस दिन मारपीट के वीडियो दिखाये गये, उसी दिन तेजस्वी यादव तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन के जन्मदिन समारोह में शामिल होने चेन्नई गये थे। ऐसा भी नहीं कि बाहर कमाने गये बिहार के लोगों के साथ वहां के लोग बदसलूकी नहीं करते। नार्थ ईस्ट के राज्य हों या दक्षिण के, महाराष्ट्र हो या गुजरात, बिहार के लोगों के साथ मारपीट की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं। इतना ही नहीं, नौकरी की प्रतियोगी परीक्षाएं देने या दूसरे राज्यों में पढ़ने गये बिहारी छात्रों के साथ मारपीट की घटनाएं आम हैं। बिहार से पलायन नहीं होता तो मारपीट नौबत नहीं आतीबिहार का दुर्भाग्य है कि आजादी के पहले या बाद में बिहार में जो उद्योग लगे, वे पिछले तीन दशक में बारी-बारी बंद होते गये। नये उद्योग तो लगे ही नहीं। कानून व्यवस्था और बेकाबू अपराध इसका सबसे बड़ा कारण रहा। लालू-राबड़ी राज में तो चालू चीनी मिलों में ताला लटक गया, जो बिहार में रोजगार का सबसे बड़े साधन थीं। रंगदारी, अपहरण और लूट की घटनाओं को देख कर कोई निवेशक बिहार आने के लिए तैयार ही नहीं होता था। नीतीश राज में शराब फैक्टरियों में ताला लटक गया। नये उद्योग लगे नहीं। ऐसे में बिहार में रोजगार की कल्पना भी कोई नहीं कर सकता। हार-थक कर रोजगार की तलाश में बिहार से लोगों का बड़े पैमाने पर पलायन होता रहा। बिहार से बाहर गये लोग दूसरे राज्यों में पिटते रहे, गालियां सुनते रहे और भगाये जाते रहे हैं। कवरेज सबने किया, पर मीडिया का साथ नहीं मनीष कोअफसोस इस बात का भी है कि मनीष कश्यप की गिरफ्तारी के खिलाफ जनता तो गोलबंद हो रही है, लेकिन मीडिया बिरादरी खामोश है। बिहार सरकार की ईमानदारी भी नहीं दिखती। तमिलनाडु की घटना को लेकर दूसरे मीडिया प्लेटफार्म पर भी खबरें आयीं, पर सरकार के निशाने पर मनीष रहे। सामान्यतया पत्रकारों के साथ अन्याय के मसले पर मीडिया से जुड़े लोग मुखर रहते हैं, लेकिन मनीष के मामले में दूसरे मीडिया हाउस या पत्रकारों के संगठन भी खामोश हैं। इसे पत्रकारिता की पैंतरेबाजी ही तो कहेंगे न! मनीष कश्यप के लिए ईओयू के एसपी ने बयान दिया कि मनीष कश्यप आरोपी बनने के बाद आत्मसमर्पण नहीं किया। वो घूम-घूमकर वीडियो बना रहे थे। वो भगोड़ा और आदतन अपराधी हैं। वह पत्रकार नहीं हैं बल्कि एजेंडा पत्रकारिता करते हैं। पेड न्यूज़ चलाते हैं। सवाल अभी भी वहीं खड़ा है कि आखिर मनीष कश्यप ने कथित तमिलनाडु हिंसा का वीडियो बनाया। उसके लिए अपराधी हैं। उसी कड़ी में उस दौरान सैकड़ों यूट्यूब चैनलों ने वीडियो चलाए। यहां तक की प्रशांत किशोर ने दावा किया कि उनके ट्वीटर पर हिंसा के जो वीडियो हैं वो सच है। पुलिस ने उन पर कार्रवाई क्यों नहीं किया?