संथालों को नहीं था ‘आत्मसमर्पण’ जैसे किसी शब्द का ज्ञान… जब तक ड्रम बजा-लड़ते रहे, जानिए 20 हजार लोगों की कुर्बानी की कहानी

दुमका: आज 22 दिसंबर को संताल परगना का अवतरण दिवस अथवा जन्मदिन है। आज से 167 साल पहले 1855 में संताल हुल में सिदो, कान्हु, चांद, भैरव, फूलो और झानो समेत लगभग 20 हजार लोगों की कुर्बानी के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने बिहार के भागलपुर और पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के कुछ हिस्सों को मिला कर संताल परगना अलग जिला का गठन किया। इसके पहले इतिहास के पन्ने में संताल परगना जंगल-तराई के नाम से दर्ज था। इसके पहले इस इलाके का प्रशासनिक देखरेख भागलपुर या वीरभूम के प्रशासनिक अधिकारियों के जिम्मे था। अंग्रेजी के संरक्षण में आमलोगों का शोषण करने वाले महाजनों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकने वाले लोगों की बुलंद आवाज को कूटनीति के सहारे दबाया जा सके। जिला गठन के 128 वर्षों के बाद एकीकृत बिहार में 1983 में संताल परगना को चार जिले दुमका, देवघर, गोड्डा और साहेबगंज में बांटकर जिला से प्रमंडल बनाने के साथ दुमका को प्रमंडलीय मुख्यालय बना दिया गया। बाद में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने साहेबगंज जिले से अलग कर पाकुड़ को भी जिला बनाया। झारखंड गठन के बाद प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की सरकार ने प्रमंडलीय मुख्यालय दुमका को उपराजधानी का दर्जा दिया। इसके साथ ही दुमका से अलग कर जामताड़ा को जिला बना दिया। इस तरह संताल परगना को छह जिलों में बांट दिया गया। जंगल नदी, झरना और पहाड़ों के मनोहारी प्राकृतिक सौंदर्य से सुसज्जित संताल की रत्नगर्भा धरती प्राकृतिक संपदा कोयला,पत्थर, चायना क्ले, बालू सहित अन्य खनिज पदार्थ को अपनी कोख में समेटे हुए है। मोती झरना, देवघर, बासुकीनाथ, दानी नाथ, शिव गादी, पंच वाहिनी, मंदिरों का गांव मलूटी, राजमहल का ऐतिहासिक महल, उधवा का जीवाश्म पार्क, माटरलू टावर, मसानजोर डैम, दिगल बांध सहित दर्जनों धार्मिक और पर्यटन स्थल है। बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि झारखंड में गंगा है। लेकिन साहेबगंज जिले में गंगा संताल परगना का चरण पखारती है। मयूराक्षी,बांसलोई, अजय, गुमानी सहित कई प्रमुख नदियां की धारा से मुझे और पवित्र बनाती है।

अंग्रेज अफसर एडन एसली बने संताल परगना के पहले उपायुक्त

22 दिसंबर 1855 में अस्तित्व में संताल परगना के प्रथम उपायुक्त के रूप में अंग्रेज अफसर एडन एसली ने इस जिले के प्रशासनिक व्यवस्था की आधारशिला रखी और यहां के लोगों के जमीन संबंधी समस्याओं के निदान की दिशा में कदम बढ़ाया। आम जनता को प्रशासन के करीब लाने के लिए खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य सहित कई सुधारात्मक कार्य शुरू किये गये। इसी क्रम में सर्वे कर रैयतों के नाम जमीन संधारण के कार्य शुरू किये गये। इसके तहत अंग्रेज अफसर मैकफर्सन, हुड और गैंजर के नेतृत्व में सर्वे सेटलमेंट के कार्य को निर्धारित समय के भीतर पूर्ण किया गया, जिससे ज़मीन पर खेती करने वाले यहां के मूल रैयतों को दस्तावेजी हक अधिकार दिए गए। इस लिहाज से संताल परगना अपने अवतरण का 167 वीं वर्षगांठ मना रहा है।

20 हजार से अधिक की कुर्बानी ने संताल परगना को दिलाई अलग पहचान

1855 में महाजनों के शोषण और दमन से मुक्ति के लिए सिदो, कान्हु चांद, भैरव, फूलों झानों के नेतृत्व में लगभग 20 हजार से अधिक वनवासियों की कुर्बानी ने संताल परगना को अलग पहचान दिलायी। इस विपुल संताल विद्रोह जिसे संताल हुल भी कहा जाता है जो इतिहास के पन्नों में दर्ज है। महज कुछ महीने में इस विपुल संताल हुल ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। इस कारण ब्रिटिश हुकूमत को बिहार के भागलपुर और पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के कुछ पहाड़ी इलाके में अपनी शासन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 22 दिसंबर 1855 में संताल परगना अलग जिला गठन करने को विवश कर दिया।

अंग्रेजी इतिहासकार हंटर ने लिखी वीरता की कहानी

संताल हुल के संबंध में प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार हंटर ने अपनी पुस्तक ‘एनल्स ऑफ रूरल बंगाल’ में लिखा है- ‘‘संथालों को आत्मसमर्पण जैसे किसी शब्द का ज्ञान नहीं था। जब तक उनका ड्रम बजता रहता था, वे लड़ते रहते थे। जब तक उनमें से एक भी शेष रहा, वह लड़ता रहा। वहीं ब्रिटिश सेना में एक भी ऐसा सैनिक नहीं था, जो इस साहसपूर्ण बलिदान पर शर्मिन्दा न हुआ हो।’’ इस संघर्ष में सिद्धू और कान्हू के साथ उनके अन्य दो भाई चांद और भैरव भी मारे गये। इस घटना की याद में प्रतिवर्ष 30 जून को ‘हूल दिवस’ मनाया जाता है। कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक ‘नोट्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ में इस घटना को जनक्रांति की संज्ञा दी है।

स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई

संघर्ष की बदौलत अवतरित संताल परगना ने 167 साल के सफर में स्वतंत्रता संग्राम में भी अहम भूमिका निभाई। कई सपूतों को जन्म दिया, जिन्होंने ना केवल संताल परगना बल्कि समूचे देश में इस इलाके को गौरवान्वित किया और बड़ी-बड़ी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आजादी का अलख जगाने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, विनोबा भावे, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसे कई महान स्वतंत्रता सेनानियों का संताल परगना में आगमन हुए। इसी क्रम में इस वन भूमि ने आजादी के दीवाने पंडित विनोदानंद झा, गोड्डा जिले के कसबा गांव निवासी भागवत झा आजाद,लाल हेम्ब्रम सरीखे कई प्रमुख सपूतों को जन्म दिया। जिन्हें आजादी के बाद सांसद, विधायक के साथ मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की कमान संभालने और इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला।

संताल परगना से तीन-तीन सीएम बने

वहीं झारखंड अलग राज्य आंदोलन को धार देने के लिए संताल परगना को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले जेएमएम सुप्रीमो शिबू सोरेन, बीजेपी विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी, वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी संताल परगना ने सांसद, विधायक चुन कर केन्द्र में मंत्री और सीएम के रूप में नवगठित झारखंड राज्य की बागडोर संभालने का भी सुअवसर दिया। इसी क्षेत्र ने अपने सपूत प्रभु दयाल हिम्मतसिंहका को सदस्य के रूप में संविधान सभा में भी प्रतिनिधित्व करने का गौरव दिया। यहां तक कि आयुक्त और उपायुक्त के रूप में संताल परगना की सेवा करने वाले आईएएस अधिकारी रहे यशवंत सिन्हा केन्द्रीय वित्त और विदेश मंत्री के रूप में काम करने का मौका मिला। वहीं संताल परगना में काम कर चुके जे.एम. लिंगदोह को मुख्य चुनाव आयुक्त और उप विकास आयुक्त के पद पर इस क्षेत्र की सेवा करने वाले राजीव गोवा को केन्द्र सरकार में कैबिनेट सचिव के पद पर आसीन होने का सौभाग्य मिला।

सिंचाई की सुविधा नहीं होने से से पलायन की समस्या

167 साल के सफर में केन्द्र और राज्य सरकार की ओर से विकास के कई कार्य किये गये लेकिन सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं होने की वजह से यहां की धरती प्यासी है। खनिज सम्पदा से परिपूर्ण रहने के बावजूद इस धरती पर निवास करने वाले क्षेत्र के अधिकांश सपूत रोजगार से वंचित है और सदियों से रोजगार की तालाश में पलायन को विवश हैं।

रिपोर्ट-शिवशंकर चौधरी