सेल्समैन पिता के बेटे ने अंडमान में की जी-20 देशों की मेजबानी, मेहनत और टैलेंट से हासिल किया ये बड़ा मुकाम

गाजीपुर: उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के रहने वाले प्रतीक जायसवाल ने छोटी उम्र में ही बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। पिछले दिनों अंडमान-निकोबार में जी-20 समूह के देशों की बैठक में इवेंट मैनेजमेंट टीम का हिस्सा रहने का उन्हें अवसर मिला। प्रतीक बेहद साधारण परिवार से आते हैं। उनके पिता पिछले 28 सालों से सेल्समैन की नौकरी करते हैं। घर की माली हालत ठीक होने नहीं होने के बाद भी प्रतीक ने होटल मैनेजमेंट जैसी महंगी पढ़ाई पढ़ने का संकल्प लिया। प्रतीक की उपलब्धियों पर समाज से ज्यादा उनके माता-पिता की निगाहें टिकी हैं, जिन्हें कभी गरीबी के कारण भूखे पेट भी सोने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

नवभारत टाइम ऑनलाइन से बात करते हुए प्रतीक जयसवाल ने बताया कि जब से उन्होंने होश संभाला है, तब से पिताजी को कपड़े की दुकान पर सेल्समैन की नौकरी करते देखे हैं। प्रतीक को अपने घर की माली हालत के बारे में युवावस्था मे ही जानकारी हो गई थी, इसलिए वह बारहवीं पास करने के साथ ही गाजीपुर के होटल में नौकरी करने लगे। यहां नौकरी करते हुए इस बात का अहसास हुआ कि अगर वह होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर लेते हैं तो उन्हें बेहतर प्लेसमेंट और बड़े पैकेज की नौकरी मिल सकती है।

ऐसे में केंद्र सरकार के पर्यटन विभाग की ओर से संचालित दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट कैटरिंग ऐंड न्यूट्रिशन में उन्होंने आवेदन किया। मेरिट के आधार पर प्रतीक को दाखिला भी मिल गया। अब प्रतीक और उनके परिजन के सामने दाखिले के समय दिए जाने वाले फीस के व्यवस्था करने की चुनौती थी। ऐसे में उनके परिजन ने रिश्तेदारों से उधार पैसा लेकर प्रतीक को दिया, जिससे वह अपने दाखिले फीस जमा कर सकें।

बेटे को ऐडमिशन दिलाने भी न जा पाए पिता

पिता ओमप्रकाश जायसवाल बताते हैं कि उनकी बहुत इच्छा थी कि वह अपने बेटे को दाखिला दिलाने के लिए उसके साथ दिल्ली जाते लेकिन उनकी आर्थिक हालत ने ऐसा होने न दिया। प्रतीक ने अपने पिता को मना किया और कहा कि 2 लोगों का किराया भाड़ा देने का कोई अर्थ नहीं बनता है। वह अकेले ही जाकर इंस्टिट्यूट में दाखिला ले लेंगे। ओम प्रकाश जायसवाल ने यह भी बताया कि वह नहीं चाहते कि उनके बेटे को उस हद तक संघर्ष करना पड़े जैसा उन्होंने किया है।

ओम प्रकाश जयसवाल के पिता उनकी पैदाइश से पहले ही गुजर चुके थे। जब वह 8 साल के हुए तो सर से मां का साया उठ गया। ऐसे में ओमप्रकाश जायसवाल के तीन बहन और दो भाइयों का ख्याल उनके मामा मामी ने रखा। बीते वक्त के साथ ओम प्रकाश को यह आभास हुआ कि उन्हें जल्द से जल्द कोई नौकरी पकड़ लेनी चाहिए। ताकि आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो सके ।ओमप्रकाश बचाते हैं कि पिछले 28 साल से वह कपड़े की दुकान पर सेल्समैन की नौकरी कर रहे हैं।

उनकी कुल आय 7 से 8 हजार के बीच है। जिससे धर खर्च चलता है। ओमप्रकाश जायसवाल के अनुसार प्रतीक दिल्ली में रहकर अपने हिस्से का संघर्ष कर रहे हैं। वह पैसे के अभाव में कई दिन बिना खाए ही सो जाते हैं । या फिर रात में समोसा आदि जैसे स्नैक्स के सहारे ही पेट भर लेते हैं।ऐसा वह पैसा बचाने के लिए करते है। दिन का भोजन उन्हें संस्था की ओर से मध्यान्ह में उपलब्ध हो जाता है।

सीखने की ललक ने दिलाया मौका

प्रतीक ने बताया कि वह 1 वर्षीय डिप्लोमा कोर्स कर रहे हैं। इस दौरान उन्हें बड़ी संस्था के कामकाज की शैली समझने की जिज्ञासा हुए। ऐसे में वह दिल्ली स्थित ताज मानसिंह होटल पहुंच गए। वहां उन्होंने संबंधित अधिकारी से मिलकर कामकाज सीखने देने के अवसर को लेकर अनुरोध किया। प्रतीक को ताजमान सिंह में काम सीखने का अवसर मिल गया। प्रतीक बताते हैं कि डिप्लोमा कोर्स पूरा होने के बाद ही उन्हें इंटर्नशिप के लिए पात्र माना जाना चाहिए था। लेकिन ,ताज मानसिंह के मैनेजमेंट के लोगों ने उनके सीखने की ललक को देखते हुए उन्हें बीच में ही अवसर दिया।

इस बीच प्रतीक बताते हैं कि अंडमान में दिल्ली स्थित ताज मानसिंह होटल से 5 लोगों की टीम इवेंट हैंडलिंग के लिए भेजी जानी थी ।प्रतीक ने ताज मानसिंह में मिले काम सीखने के अवसर का इस कदर सकारात्मक उपयोग किया कि ताज मानसिंह की ओर से भेजे गए 5 लोगों की टीम में प्रतीक भी शामिल हो गए। प्रतीक बताते हैं कि उन्हें इस बात का मलाल है कि जी-20 देशों में देशों की बैठक में सुरक्षा को लेकर मोबाइल फोन ले जाने नहीं दिया गया ।नहीं तो तस्वीरों के जरिए वह इस बड़े अवसर के स्मृतियों को जरूर सजाकर रखते।

प्रतीक ने यह भी बताया कि दिन भर उनका वक्त इंस्टिट्यूट में ही बीत जाता है। रात के 12 से सुबह 8 तक वह दिल्ली के कैफ़े में काम करते हैं। इस नौकरी के बदले उन्हें हर महीने 10 हजार मिलते हैं। प्रतीक ने बताया कि वह पढ़ाई के साथ नौकरी इसलिए करना चाहते हैं कि वह पिता की ओर से रिश्तेदारों से लेकर लिया कर्ज को लौटा सकें। प्रति उनके और उनके परिजन के सामने बैंक लोन या फिर साहूकार से लोन पर पैसे लेने का विकल्प नहीं था। अगर ऐसा होता तो वह लोग ब्याज के कुचक्र में बुरी तरीके से फंस जाते हैं। ऐसे में लोन वापस करना और भी टेढ़ा काम हो जाता।

प्रतीक का एक छोटा भाई भी है।जो बीकॉम करने के बाद एसएससी की तैयारी कर रहा है। प्रतीक के पिता ओमप्रकाश सिंह ने नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से बातचीत के दौरान बेहद भावुक होकर कहा कि अब उन्हें भरोसा है कि प्रतीक ही पढ़ाई करके उनको अपने संघर्षों से निजात दिलाएगा। उन्हें उम्मीद है कि 1 वर्षीय डिप्लोमा कोर्स पूरा करने के बाद प्रतीक को किसी बड़ी होटल समूह में नौकरी मिल जाएगी। जिसके बाद परिवार के आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार हो पाएगा।

रिपोर्ट: अमितेश कुमार सिंह