राहुल नार्वेकर ने पुराने ‘बॉस’ उद्धव ठाकरे की हैसियत ही छीन ली, शिवसैनिकों का भ्रम भी तोड़ा, जानिए कैसे

मुंबई : महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष ने अपने पुराने ‘बॉस’ से पार्टी छीन ली और को सौंप दिया। साथ ही साथ, उद्धव के पॉलिटिकल सत्ता पर भी सवाल खड़े कर दिए। अपने फैसले में का संविधान पढ़कर शिवसैनिकों का भ्रम ही तोड़ दिया कि मातोश्री में बैठे उद्धव ठाकरे पावरफुल हैं। शिवसैनिक शुरू से ही बाला साहेब ठाकरे को पार्टी का चीफ मानते रहे। उनके एक मौखिक आदेश पर शिवसैनिक मुंबई की सड़कों पर उतर पड़ते थे। 2003 में बाला साहेब ने भतीजे राज ठाकरे के दावे को दरकिनार कर उद्धव ठाकरे को शिवसेना प्रमुख के पद पर ताजपोशी की थी। राहुल नार्वेकर ने कानूनी दावपेंच से यह निष्कर्ष निकाला कि शिवसेना प्रमुख पार्टी के सुप्रीम होने पावर नहीं हैं। वह 1999 का पार्टी संविधान निकाल लाए और तय कर दिया कि शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ठाकरे फैमिली से ज्यादा पावरफुल है। उद्धव ठाकरे को बाला साहेब के बेटे हो सकते हैं, मगर ‘सर्वेसर्वा’ नहीं हैं। उन्हें किसी नेता को पार्टी से निकालने का अधिकार ही नहीं है। राहुल नार्वेकर एक समय शिवसेना में थे। 2014 तक उद्धव ठाकरे ही उनके बॉस रहे। वह आदित्य ठाकरे के करीबी माने जाते रहे। 2014 में शिवसेना ने उन्हें लोकसभा का टिकट नहीं दिया था। इसके बाद वह एनसीपी में शामिल हो गए थे। बाद में वह भाजपा में शामिल हो गए। 2019 में वह मुंबई के कोलाबा से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े और विधायक चुने गए। शिवसेना में एकनाथ शिंदे के बगावत के बाद जब महायुति की सरकार बनी तो उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया। अयोग्यता पर उन्होंने अपने फैसले से उद्धव ठाकरे को शिवसेना के सर्वेसर्वा पद से बेदखल कर दिया। बाला साहेब ने बगावत को संभाल लिया था, उद्धव पार्टी भी नहीं बचा पाए उद्धव ठाकरे 1995 में पॉलिटिक्स में एक्टिव हुए। उससे पहले युवा सेना की कमान संभालने वाले उनके चचेरे भाई राज ठाकरे ने पार्टी में मजबूत पकड़ बना रखी थी। उद्धव के सक्रिय होते ही बाला साहेब ठाकरे ने पार्टी के फैसलों में शामिल करना शुरू कर दिया। 1997 के बीएमसी चुनाव में उद्धव ने कैंडिडेट के नाम पर मुहर लगाई। उस चुनाव में शिवसेना जीत गई मगर उद्धव और राज ठाकरे के बीच मनमुटाव की खबरें भी आईं। 2003 के महाबलेश्वर अधिवेशन में बाला साहेब ने उद्धव को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। उन्होंने उद्धव ठाकरे को शिवसेना का अध्यक्ष बनाया गया। नाराज राज ठाकरे ने 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाकर शिवसेना से किनारा कर लिया। विरासत में पार्टी प्रमुख का पद मिलने के बाद उन्होंने बाला साहेब की जगह ले ली। शिवसेना में बाला साहेब के जमाने में भी कई नेता बागी हुए, मगर उनकी कार्यकर्ताओं पर पकड़ के कारण पार्टी बनी रही। 1985 में छगन भुजबल और 2005 में नारायण राणे भी बागी हुए। इन दोनों नेताओं के साथ कई विधायकों ने भी पार्टी का दामन छोड़ा, मगर बाल ठाकरे की हैसियत बनी रही। बाला साहेब हमेशा सत्ता का रिमोट कंट्रोल थामे रहे। एकनाथ शिंदे की बगावत ने ठाकरे फैमिली से पार्टी ही छीन ली और उद्धव देखते रह गए। शिंदे ने उनसे पार्टी का रिमोट कंट्रोल वाला सिस्टम भी ध्वस्त कर दिया। विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने 10 जनवरी को अपने फैसले में उद्धव को निहत्था कर दिया। नई पार्टी और नए सिंबल के साथ लड़ना होगा चुनावविधायकों की अयोग्यता के मामले में अब ठाकरे गुट सुप्रीम कोर्ट में स्पीकर की फैसले के खिलाफ अपील करेगा। मगर कानूनी कार्रवाई पूरी होने तक लोकसभा चुनाव निकल जाएगा। अगर केस लंबा चला कि अक्टूबर में होने वाला विधानसभा चुनाव भी हो जाएंगे। ऐसे में उद्धव ठाकरे को नए सिंबल मशाल के साथ चुनाव में जाना होगा। पार्टी भी दो धड़ों में विभाजित हो चुकी है और तीर-कमान वाला सिंबल शिंदे गुट के पास रहेगा। पिछले दिनों हुए पंचायत चुनाव में उद्धव ठाकरे की सेना शिंदे से पिछड़ चुकी है। पंचायत चुनाव में शिंदे गुट ने 301 और ठाकरे गुट ने 115 पंचायतों में जीत हासिल की थी। स्पीकर के फैसले के बाद शिवसेना पार्टी पर पूरी तरह से एकनाथ शिंदे का कब्जा हो गया है। ऐसे में गैर शहरी क्षेत्रों में उद्धव ठाकरे को नए सिरे से अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना होगा। इसके अलावा अभी बाकी बचे समर्थकों को भी एकजुट करने की चुनौती होगी।