भारत को ख्रुश्‍चेव जैसा ‘धोखा’ दे सकते हैं पुतिन, रूस पर क्‍यों चेतावनी दे रहे विशेषज्ञ, मिग-21 की कहानी

वॉशिंगटन/मास्‍को: रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के एक साल हो गए हैं और यह जंग खत्‍म होने का नाम नहीं ले रही है। आलम यह है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश जहां यूक्रेन को हथियारों से पाट रहे हैं, वहीं ईरान और अब चीन रूस के साथ पूरी तरह से खड़े दिखाई दे रहे हैं। दुनिया में आ रहे इस आमूल चूल बदलाव के बीच विशेषज्ञ भारत की विदेश नीति में व्‍यापक बदलाव की ओर संकेत दे रहे हैं। साथ ही वे कमजोर रूस और चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर भारत को सोवियत संघ का उदाहरण देकर चेतावनी दे रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन को खुश करने के लिए सोवियत संघ ने क्‍यूबा मिसाइल संकट के समय भारत को मिग-21 फाइटर जेट देने में देरी कर दी थी। अमेरिका के थिंक के मुताबिक यूक्रेन युद्ध के बाद भारत की विदेश नीति में कई तरह के बदलाव आए हैं। भारत अब रूस पर से अपनी निर्भरता को घटाने में जुट गया है। रूस ने यूक्रेन युद्ध में बहुत खराब प्रदर्शन किया है। इसके अलावा अब रूस पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के बाद हथियारों का उत्‍पादन करने में काफी मुश्किलों का सामना कर रहा है। इसी वजह से भारत में अब रूस के भविष्‍य में रणनीतिक पार्टनर होने की उपयोगिता को लेकर बहस छिड़ गई है। इस रिपोर्ट में भारतीय विश्‍लेषकों के हवाले से कहा गया है कि भारत को एक कमजोर रूस के लिए खुद को तैयार करना होगा जिसकी चीन पर निर्भरता बहुत ज्‍यादा है। क्‍यूबा संकट में चीन की मदद चाहता था सोवियत संघविश्‍लेषकों ने कहा कि इसका दुष्‍प्रभाव यह हो सकता है कि रूस भारत के हितों के खिलाफ कदम उठाने के लिए मजबूर हो सकता है। इसमें आपातकालीन समय में हथियारों की आपूर्ति पर रोक शामिल है। भारतीय विश्‍लेषक इसका एक ऐतिहासिक उदाहरण भी देते हैं। साल 1962 में भारत और चीन के बीच जंग हुई थी। उस समय भारत को घातक हथियारों की बहुत सख्‍त जरूरत थी। ठीक उसी समय दुनिया में क्‍यूबा मिसाइल संकट शुरू हो गया था। भारत ने अपने दोस्‍त सोवियत संघ से मिग-21 फाइटर जेट देने की गुहार लगाई लेकिन कम्‍युनिस्‍ट देश के नेता निकिता ख्रुश्‍चेव ने भारत को मिग-21 फाइटर जेट की डिलिवरी में जानबूझकर देरी कर दिया। दरअसल, सोवियत संघ को क्‍यूबा मिसाइल संकट के दौरान अमेरिका से निपटने के लिए चीन के समर्थन की जरूरत थी। इसलिए सोवियत नेता ने भारत को मिग-21 फाइटर जेट देने में देरी कर दी। यही नहीं पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद अब इस बात का भी खतरा पैदा हो गया है कि भविष्‍य में चीन के उपकरण रूस के हथियारों के रास्‍ते भारत आ सकते हैं। इसकी वजह यह है कि रूस को अब पश्चिमी देशों को कोई सप्‍लाइ नहीं हो पा रही है। अगर ऐसा होता है तो यह भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा होगा। ‘भारत के पास रूस के लिए एक बड़ा हथियार’रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हालांकि अभी भारत के पास ऐसा हथियार है जो रूस को साथ बने रहने के लिए मजबूर कर सकता है। भारत चीन से इतर रूस का एक बड़ा व्‍यापारिक साझेदार है। अकेले भारत ने यूक्रेन युद्ध के बीच अप्रैल से लेकर दिसंबर 2022 तक रूस से 21 अरब डॉलर से ज्‍यादा का कच्‍चा तेल आयात किया है। इससे पहले भारत रूस से न के बराबर तेल खरीदता था। सैद्धांतिक रूप से भारत इसके जरिए रूस को चीन के साथ जाने से रोक सकता है। भारत रूस के हमले से खुश नहीं है और पीएम मोदी ने पुतिन को सार्वजनिक रूप से युद्ध को लेकर सुना दिया था। माओ को सबक सिखाने के लिए भारत के साथ डील! अमेरिका के स्‍टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के थिंक टैंक के मुताबिक साल 1962 में चीन और सोवियत संघ के बीच दुनिया में वामपंथी आंदोलन का नेता बनने की होड़ लगी हुई थी। सोवियत संघ के नेता ख्रुश्‍चेव और चीन के कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के सुप्रीमो माओ त्‍से तुंग के बीच वैचारिक आधार पर काफी ज्‍यादा मतभेद हो गया था। ख्रुश्‍चेव ने अचानक से चीन को दी जा रही व्‍यापक सैन्‍य सहायता को रोक दिया। इसकी जगह पर सोवियत नेता ने भारत जैसे चीन के पड़ोसी देशों के साथ रिश्‍ते मजबूत करना शुरू किया जो ड्रैगन की नीतियों से डरे हुए थे। ख्रुश्‍चेव ने भारत के साथ अत्‍याधुनिक मिग-21 फाइटर जेट की डील की ताकि नई दिल्‍ली ड्रैगन का करारा जवाब दे सके। हालांकि क्‍यूबा मिसाइल संकट ने एक बार फिर से सोवियत संघ और चीन को एकजुट कर दिया। चीनी पीएम की चाल, सोवियत संघ ने मिग-21 में कर दी देरीरिपोर्ट में कहा गया है कि सोवियत संघ को लगा कि अगर चीन क्‍यूबा मिसाइल संकट में उसका समर्थन करता है तो दुनिया के वामपंथी आंदोलन में वह अपनी खोई हुई साख को फिर से हासिल कर लेगा। क्‍यूबा पर चीन का साथ हासिल करने के लिए सोवियत नेता ख्रुश्‍चेव भारत को भी धोखा देने के लिए भी तैयार हो गए। सोवियत संघ और चीन के बीच इस सौदेबाजी की कीमत भारत को चुकानी पड़ी थी जो जानबूझकर की गई थी। चीन के सैनिकों ने जब भारत पर हमला किया तो सोवियत नेता ने भारत के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को नसीहत दी कि बीजिंग के साथ शांतिपूर्ण तरीके से विवाद का निपटारा करें। हूवर की रिपोर्ट के मुताबिक सोवियत संघ की आधिकारिक मीडिया ने सीमा विवाद पर भारत को छोड़कर चीन का समर्थन करना शुरू कर दिया। भारत और चीन के बीच युद्ध शुरू होने के 3 सप्‍ताह पहले चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने असाधरण कदम उठाते हुए सोवियत संघ के राजदूत से मिग-21 डील के बारे में बात की। ख्रुश्‍चेव ने भारत और चीन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद मिग-21 विमान देने में जानबूझकर देरी कर दी।