Prajatantra: Milind Deora ने क्यों छोड़ी कांग्रेस, पार्टी को कितना होगा नुकसान, शिंदे से क्या हुई है डील

कांग्रेस ने रविवार को मणिपुर से भारत जोड़ो न्याय यात्रा की शुरुआत की। हालांकि इससे ठीक पहले वरिष्ठ नेता मिलिंद देवड़ा ने पार्टी छोड़ने का फैसला कर लिया। हालांकि, मिलिंद देवड़ा को लेकर कई दिनों से अटकलें का दौर जारी था। बावजूद इसके पार्टी नेताओं की ओर से उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की गई। मिलिंद देवड़ा कांग्रेस की दूसरी पीढ़ी के बड़े नेताओं में से एक थे जिन्हें राहुल गांधी का बेहद करीबी माना जाता था। हालांकि बारी-बारी से ज्यादातर नेता इससे गायब हो चुके हैं जिसमें सबसे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया, उसके बाद जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह और अब मिलिंद देवड़ा का नाम आ गया है। मिलिंद देवड़ा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए। बावजूद इसके कांग्रेस सीधे तौर पर भाजपा पर निशाना साथ रही है। कांग्रेस का साफ तौर पर कहना है कि भाजपा की प्लानिंग के तहत मिलिंद देवड़ा ने पार्टी छोड़ी है।  इसे भी पढ़ें: Prajatantra: मोदी, योगी और श्री राम, चर्चा में ये तीन नाम, विपक्ष का कहां है ध्यानमुंबई दक्षिण लोकसभा सीटमिलिंद देवड़ा का अगर कांग्रेस से मोहभंग हुआ है तो उसका बड़ा कारण मुंबई दक्षिण लोकसभा सीट है। कांग्रेस की सहयोगी उद्धव ठाकरे की शिवसेना लगातार इस सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर रही थी जिससे देवड़ा बिल्कुल भी खुश नहीं थे। देवड़ा ने अपनी शिकायत को आलाकमान तक पहुंचा दिया था। बावजूद इसके उन्हें ठोस जवाब नहीं मिला था। फिलहाल इस सीट से उद्धव ठाकरे की शिवसेना के अरविंद सावंत सांसद है। ऐसे में आगामी चुनाव में यह सीट शिंदे गुट को जा सकता है। हालांकि, भाजपा की इस सीट पर अपनी दावेदारी कर रही है। वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर और मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा जैसे नाम चर्चा में है। ऐसी स्थिति में देवड़ा संसद में राज्यसभा के जरिए जा सकते हैं। शिवसेना यूबीटी के अनिल देसाई के स्थान पर मिलिंद देवड़ा को राज्यसभा भेजा जा सकता है।, संभाली पिता की विरासतदेवड़ा पहली बार 2004 में मुंबई दक्षिण से लोकसभा में पहुंचे, इस सीट पर उनके पिता दिवंगत मुरली देवड़ा कई बार रहे थे। वह उस समय भारत के सबसे युवा सांसदों में से एक थे। देवड़ा पहली बार 2004 में 50.3% वोट शेयर के साथ लोकसभा के लिए चुने गए थे। 2009 में, उन्होंने 42.5% के साथ मुंबई दक्षिण सीट फिर से जीती। तब से, 2014 और 2019 के चुनावों में उनका वोट शेयर गिरकर 31.6% और 41% हो गया। देवड़ा ने रक्षा, नागरिक उड्डयन, अनुमान, शहरी विकास और सूचना प्रौद्योगिकी पर संसदीय समितियों में विभिन्न पदों पर कार्य किया और मनमोहन सरकार में संचार और सूचना प्रौद्योगिकी और शिपिंग राज्य मंत्री के रूप में भी कार्य किया। लेकिन एक दूरदर्शी, व्यापार-हितैषी और महानगरीय नेता के रूप में अपनी छवि बनाने के बावजूद, देवड़ा 2014 में मोदी लहर के दौरान अपनी सीट नहीं बचा सके। देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक मुकेश अंबानी के समर्थन के बावजूद वह पांच साल बाद फिर हार गए। इसे भी पढ़ें: Prajatantra: ताला खुलवाने का दम भरने वाली कांग्रेस अयोध्या से क्यों बना रही दूरी, जानें इनसाइड स्टोरीकांग्रेस को नुकसानदेवड़ा, हालांकि एक जन नेता नहीं हैं, लेकिन कांग्रेस के भीतर, खासकर दक्षिण मुंबई में उनका काफी दबदबा है। इस क्षेत्र के नगरसेवकों, विधायकों और नेताओं की पीढ़ियों से देवड़ा के प्रति निष्ठा रही है, जिसमें मिलिंद के पिता मुरली भी शामिल हैं, जो मुंबई के मेयर और बाद में केंद्रीय कैबिनेट मंत्री थे। उनके पार्टी छोड़ने से पार्टी में भगदड़ हो सकता है जिससे कांग्रेस को काफी नुकसान होगा। चार बार की धारावी विधायक वर्षा गायकवाड़ को पार्टी की मुंबई इकाई का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद से मुंबई कांग्रेस के भीतर एक समूह नाखुश है। यह समूह पूरे शहर में फैला हुआ है और इसमें देवड़ा भी शामिल थे। शिवसेना में शामिल होने के बाद मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस की तीखी आलोचना भी की थी और कहा था कि कांग्रेस अब उद्योगपतियों के खिलाफ हो गई है। देवड़ा को खोकर, कांग्रेस ने अपना एकमात्र उपलब्ध उम्मीदवार खो दिया है जो मुंबई दक्षिण लोकसभा सीट से चुनाव लड़ सकता था। कांग्रेस ने एक प्रमुख नेता भी खो दिया है जो मारवाड़ी और गुजराती दोनों समुदायों के व्यापार क्षेत्र के बहुत करीब था और मुंबई जैसे महानगरीय और बहुसांस्कृतिक शहर में उसकी व्यापक स्वीकार्यता थी।