Prabhasakshi Exclusive: Indian Air Force सबसे बड़ा युद्धाभ्यास क्यों करने जा रही है? क्या सचमुच Predator Drone डील में हुआ है घोटाला?

प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क के खास कार्यक्रम शौर्य पथ में ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) जी से हमने जानना चाहा कि भारतीय वायुसेना इस साल अक्टूबर में बड़े युद्धाभ्यास का आयोजन करने जा रही है। इसके पीछे क्या उद्देश्य है? साथ ही भारत-अमेरिका रक्षा करार पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने Cabinet Committee on Security की बैठक किए बिना फिर से अपना महंगा शौक पूरा किया। कांग्रेस का आरोप है कि जो प्रीडेटर ड्रोन दूसरे देश 4 गुना कम कीमत पर खरीदते हैं, उन्हें PM मोदी 880 करोड़ रुपए प्रति ड्रोन के हिसाब से खरीद रहे हैं। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि भारतीय वायु सेना अक्टूबर में एक बड़े युद्धाभ्यास का आयोजन करेगी जिसमें करीब 12 देशों की वायु सेनाएं भाग लेंगी और इसमें सैन्य सहयोग सुधारने पर ध्यान दिया जाएगा। ‘तरंग शक्ति’ भारत में आयोजित हो रहा सबसे बड़ा वायु सैनिक अभ्यास है। ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) जी ने कहा कि माना जा रहा है कि अभ्यास में फ्रांस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और जापान की वायु सेनाएं भाग लेंगी। युद्धाभ्यास में छह देश अपने लड़ाकू विमानों, सैन्य परिवहन विमान और बीच हवा में ईंधन भर सकने वाले विमानों जैसे संसाधनों के साथ भाग लेंगे, वहीं छह अन्य देशों को पर्यवेक्षक के रूप में आमंत्रित किया जाएगा। राजस्थान सेक्टर में यह अभ्यास हो सकता है। इसके अलावा हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय वायु सेना ने पिछले कुछ महीने में अनेक बड़े अभ्यासों में हिस्सा लिया है। एक बात और ध्यान रखे जाने की जरूरत है कि जो भी देश इस युद्धाभ्यास में भाग लेंगे वह कहीं ना कहीं चीनी आक्रामकता से परेशान हैं।इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi Exclusive: घेरा बढ़ाने में जुटा है China, अकेले पड़ते Taiwan ने घबराहट में दुनिया को ये क्या संदेश दे दिया!ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) जी ने कहा कि जहां तक अमेरिका से आने वाले ड्रोनों पर सियासत की बात है तो हमें सरकार का पक्ष भी सुनना चाहिए जिसने बताया है कि भारत के लिए एमक्यू-9बी ड्रोन के वास्ते अमेरिका द्वारा प्रस्तावित औसत अनुमानित लागत वाशिंगटन से इसे खरीदने वाले अन्य देशों की तुलना में 27 प्रतिशत कम होगी। भारतीय प्रतिनिधि बातचीत के दौरान इसे और कम करने का काम करेंगे। सरकार ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि अभी तक मूल्य निर्धारण के मुद्दे पर बातचीत शुरू नहीं हुई है। हमें विश्वास है कि अंतिम कीमत अन्य देशों द्वारा वहन की जाने वाली लागत की तुलना में प्रतिस्पर्धी होगी। कीमतें तभी बढ़ाई जा सकती हैं जब भारत इन ड्रोन में अतिरिक्त विशिष्टताओं की मांग करेगा। संबंधित 31 ड्रोन की प्रस्तावित खरीद की दिशा में नवीनतम आधिकारिक घटनाक्रम रक्षा खरीद परिषद द्वारा दी गई “आवश्यकता की स्वीकृति” का रहा है, जो 15 जून को हुआ था। अमेरिका निर्मित इन ड्रोन की सांकेतिक लागत 307.2 करोड़ अमेरिकी डॉलर है। प्रत्येक ड्रोन के लिए यह कीमत 9.9 करोड़ अमेरिकी डॉलर बैठती है। इस ड्रोन को रखने वाले कुछ देशों में से एक संयुक्त अरब अमीरात को प्रति ड्रोन 16.1 करोड़ अमेरिकी डॉलर का भुगतान करना पड़ा। भारत जिस एमक्यू-9बी को खरीदना चाहता है, वह संयुक्त अरब अमीरात के बराबर है, लेकिन बेहतर संरचना के साथ है। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन द्वारा खरीदे गए ऐसे 16 ड्रोन में से प्रत्येक की कीमत 6.9 करोड़ अमेरिकी डॉलर थी, लेकिन यह सेंसर, हथियार और प्रमाणन के बिना केवल एक “हरित विमान” था। सेंसर, हथियार और पेलोड जैसी सुविधाओं पर कुल लागत का 60-70 प्रतिशत हिस्सा खर्च होता है। भारत के सौदे के आकार और इस तथ्य के कारण कि विनिर्माता ने अपने शुरुआती निवेश का एक बड़ा हिस्सा पहले के सौदों से वसूल कर लिया है, नयी दिल्ली के लिए कीमत दूसरे देशों की तुलना में कम हो रही है। भारत को इन ड्रोन के साथ अपने कुछ रडार और मिसाइलों को एकीकृत करने की आवश्यकता हो सकती है, जिससे कीमत में संशोधन हो सकता है।ब्रिगेडियर श्री डीएस त्रिपाठी जी (सेवानिवृत्त) जी ने कहा कि वायुसेना, थलसेना और नौसेना ने सभी स्तरों पर इनकी खरीद का समर्थन किया है। भारत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के हिस्से के रूप में 15-20 प्रतिशत तकनीकी जानकारी चाहता है और इंजन, रडार प्रोसेसर इकाइयों, वैमानिकी, सेंसर और सॉफ्टवेयर सहित प्रमुख घटकों एवं उपप्रणालियों का निर्माण और स्रोत यहीं से किया जाएगा। एक बार दोनों सरकारों से सौदे को अंतिम मंजूरी मिल जाने के बाद, भारत अपनी तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए इनमें से 11 ड्रोन जल्द खरीदने पर विचार कर रहा है और बाकी को देश में ही तैयार किया जाएगा। झूठी खबरें और प्रचार करके सौदे को बाधित करने का प्रयास किया जा सकता है क्योंकि उन्नत हथियारों से भारत के प्रतिद्वंद्वियों में डर और घबराहट पैदा होगी तथा इन उन्नत ड्रोन से भारत को अपने दुश्मनों पर प्रभावी ढंग से निगरानी रखने में मदद मिलेगी। इन ड्रोनों के आ जाने से हमारे दुश्मनों द्वारा हमें आश्चर्यचकित किए जाने की संभावना बहुत कम हो जाएगी। भारत और अमेरिका सरकारों के बीच होने वाला सौदा पारदर्शी एवं निष्पक्ष होना तय है।उन्होंने कहा कि अधिक ऊंचाई वाले एवं लंबे समय तक टिके रहने वाले ये ड्रोन 35 घंटे से अधिक समय तक हवा में रहने में सक्षम हैं और चार हेलफायर मिसाइल तथा लगभग 450 किलोग्राम बम ले जा सकते हैं। भारतीय नौसेना ने हिंद महासागर में निगरानी के लिए 2020 में जनरल एटमिक्स से दो एमक्यू-9बी सी गार्जियन ड्रोन एक साल की अवधि के लिए पट्टे पर लिए थे और बाद में पट्टा अवधि बढ़ा दी गई थी।