पेंसिल विलेज कहे जाने वाले कश्मीर के इस गांव को पीएम मोदी ने मशहूर किया पर बदलाव नहीं आया

औखू ..! जम्मू कश्मीर में झेलम नदी किनारे 300 परिवारों वाला ये साधारण सा गांव चुपचाप बरसों से एक ऐसी चीज़ बना रहा है जिसके बिना देश में बच्चों की स्कूली पढ़ाई की शुरुआत होना तक मुमकिन नहीं. ये चीज़ कुछ और नहीं बच्चों के बस्ते और ज्योमेट्री बॉक्स की सबसे अहम वस्तु पेंसिल है. इस गांव में और आसपास पेंसिल उत्पादन का कच्चा माल बनाने वाली इतनी फैक्ट्रियां हैं कि अगर ये काम रोक दें तो पूरे भारत में अच्छी पेंसिलों की कमी हो जाए. देश भर में बनने और इस्तेमाल होने वाली 80 फीसदी पेंसिलें यहीं से तैयार हुए लकड़ी के उन स्लॉट से बनती हैं जो इस इलाके में पॉपुलर के पेड़ (poplar tree) से मिलती है. कश्मीर में पुलवामा ज़िले के औखू गांव के बारे में कश्मीर तो क्या ज़िले में भी ज्यादातर लोग तब तक नहीं जानते थे जब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘ मन की बात ‘ कार्यक्रम में इस गांव का ज़िक्र नहीं किया.
एक ज़माने में औखू गांव में सेब और अन्य फलों की पैकिंग के लिए लकड़ी की पेटियां बनाने वाले अब्दुल अज़ीज़ और गांव के ही उनके दोस्त मंजूर अहमद ने मिलकर यहां पेंसिल फैक्टरी की शुरुआत की थी. इससे पहले वे जम्मू में प्लाईवुड बनाने वाली फैक्टरियों को लकड़ी के लट्ठे सप्लाई करते थे. ये 1980 दशक की बात है. कुछ अरसे बाद देश के सबसे बड़ी पेंसिल निर्माता कंपनी हिन्दुस्तान पेन्सिल्स को इन्होंने लकड़ी सप्लाई करनी शुरू की . बाद में इस कंपनी ने इनको पूरी फिनिशिंग वाले पेंसिल के स्लॉट बनाकर सप्लाई करने को कहा. हिन्दुस्तान पेंसिल्स का बहुत बड़ा कारखाना जम्मू के बड़ी ब्रह्मणा औद्योगिक इलाके में है. हिन्दुस्तान पेन्सिल्स (एच पी -HP ) ने इस काम को करने के लिए इनको मशीनें भी मुहैया करवा दीं. तब दोनों दोस्त अब्दुल अज़ीज़ और मंजूर अहमद ने साझेदारी ख़त्म कर अलग अलग काम शुरू किया . वे अपनी – अपनी फैक्टरी से हिन्दुस्तान पेंसिल्स को माल सप्लाई करने लगे. हालांकि इनसे पहले भी श्रीनगर के पास परिमपोरा के पास ऐसी फैक्टरी लगी हुई थी लेकिन औखू की फैक्टरियों की देखादेखी आसपास संगम और लसीपोरा में भी पेंसिल उद्योग के लिए कच्चा मॉल तैयार करने की तकरीबन दो दर्जन फैक्टरियां लग गईं . इनमें करीब 3 से 4 हज़ार कर्मचारी काम करते हैं और अंदाज़न इनका सालाना टर्न ओवर 200 करोड़ से ऊपर ही कहा जाता है.
मंज़ूर अहमद ने झेलम एग्रो इंडस्ट्रीज के नाम से कारखाना लगाया. वो बताते हैं कि 2012 में जब पेंसिल निर्माताओं को कच्चा माल देने की शुरुआत हुई तब से बड़े बदलाव की शुरुआत हुई. 15 स्थानीय लोगों को काम पर रखने से शुरुआत हुई . पहले धुप में लकड़ी की स्लेट सुखाई जाती थी लेकिन अब ड्राई रूम बना दिए गए हैं जिससे लकड़ी सुखाने के काम पर मौसम की मार नहीं पडती. हालांकि इससे लागत पूंजी बढ़ानी पड़ी. जम्मू कश्मीर बैंक से मिले क़र्ज़ ने जनरेटर का बन्दोबस्त हुआ. इससे काम करने को घंटे बढ़ सके क्योंकि बिजली सप्लाई में दिक्कत आती रहती थी . मशीनें रुक जाया करती थीं. मंज़ूर अहमद की इकाई अब अब्दुल अज़ीज़ के कारखाने से ज्यादा बढ़ी हो चुकी है.

आतंकवाद के आगे घुटने नहीं टेके
भारत के पेंसिल उद्योग में पुलवामा ज़िले की इन पेंसिल फैक्टरियों की अहमियत का अंदाज़ा एक और तथ्य से भी लगाया जा सकता है . एक दिन में 85 लाख पेंसिल बनाने का दावा करने वाली हिदुस्तान पेंसिल्स भारत के सबसे लोकप्रिय और सबसे ज्यादा बिकने वाले ‘ नटराज ‘ और ‘अप्सरा ‘ ( natraj – apsara ) ब्रैंड की पेंसिल बनाती है. 1958 में स्थापित एचपी पहले विदेश से पेंसिल की लकड़ी आयात करती थी लेकिन अब उसको सारा माल यहीं से सप्लाई होता है. औखू और आसपास की ये फैक्ट्रियां शायद और शुरू ही न हो पातीं या कुछ तो शुरुआत में ही बंद हो जाती अगर अब्दुल अज़ीज़ और उनके परिवार ने इस इलाके में आतंकवाद के चरम के दौरान हिम्मत न दिखाई होती. 1994 में गांव में घुसे आतंकवादी रास्ता पूछते जानने के बहाने अब्दुल अज़ीज़ के भाई 40 वर्षीय गुलाम मोहम्मद डार को अपने साथ ले गए जिसकी लाश दो दिन बाद मिली. यही नहीं उसी साल कुछ ही अरसे बाद आतंकवादियों ने बरकत सॉ मील के मालिक अब्दुल अज़ीज़ के छोटे बेटे जलालुदीन डार की भी उसी तरह हत्या कर डाली. जलालुदीन तब सिर्फ 18 साल का था . जीवन की इतनी बड़ी क्षति और खौफ के साये में भी अब्दुल अज़ीज़ के परिवार ने हौंसला नहीं छोड़ा . आतंकवाद के गढ़ जैसे नामकरण के बावजूद उन्होंने पुलवामा की मिट्टी से दूर पलायन करने की सोची तक नहीं.
बिजली सप्लाई में कमी और महंगे डीज़ल की मार
80 की उम्र में पहुंचे अब्दुल अज़ीज़ की फैक्टरी का ज्यादा काम अब उनका बड़ा बेटा फ़िरोज़ अहमद ही सम्भाल रहा है. शुरू में इस जगह पर अब्दुल अज़ीज़ के परिवार के बच्चे और महिलाएं तक काम करते थे . मात्र 4 कर्मचारियों से शुरू हुई इस फैक्टरी में अब 100 से ज्यादा कर्मचारी हैं जिनमें 30 फीसदी स्थानीय और बाकि बंगाल , बिहार और असम जैसे दूरदराज़ इलाकों से आए मजदूर हैं. यूं अब पहले के मुकाबले हालात काफी सामान्य हैं लेकिन एहतियात के तौर पर सुबह 8 से शाम 8 बजे तक ही यहां कम होता है. इसके बाद फैक्टरी का गेट बंद कर दिया जाता है. न कोई आता है न कोई जाता है. पीएम नरेंद्र मोदी ( pm modi ) के कार्यक्रम मन की बात ( mann ki baat ) में पेंसिल गांव औखू का ज़िक्र होने से इसे लोकप्रियता ज़रूर मिली है लेकिन इससे यहां कुछ बदलाव हुआ हो अथवा यहां के पेंसिल उद्योग को फायदा हुआ हो ..! फ़िरोज़ अहमद इसका जवाब नकारात्मक देते हैं. फ़िरोज़ का कहना है हमें भी ऐसी उम्मीद तो थी लेकिन तब से अब तक यहां बिजली की सप्लाई तक नहीं सुधरी . साल में 4 महीने ऐसे होते हैं जब सिर्फ 8 घंटे नियमित पॉवर सप्लाई होती है बाकी दिनों में तो 4 से 6 घंटे बिजली आती है. काम जारी रखने के लिए डीजल जनरेटर का इस्तेमाल करना पड़ता है. डीज़ल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं. इससे मुनाफे में कमी आना स्वाभाविक है. कोविड 19 महामरी के दौर में यहां के पेंसिल कारखानों को काफी नुक्सान हुआ. शिक्षण संस्थान बंद रहने से पेंसिलों की खपत के साथ मांग कम हुई वहीं दूसरी तरफ लेबर की कमी के कारण पॉपुलर पेड़ की कटाई प्रभावित हुई. पॉपुलर उगाने वालों ने लकड़ी के दाम में 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी कर डाली जो कोविड संकट खत्म होने के बाद भी नहीं घटाई . 220 रूपये फुट मिलने वाली पॉप्लर की लकड़ी का भाव 380 पहुंच गया है.

महंगी होती पॉपुलर की लकड़ी ने मुश्किलें बढ़ाई
देवदार , कैल और फर के पेड़ों की कटाई पर रोक है . पेंसिलें बनाने के लिए पॉपुलर की लकड़ी (poplar wood ) सही रहती है जो पर्याप्त मात्रा में मुलायम और हल्की भी होती है. मुलायम लकड़ी वाला पॉपुलर झेलम किनारे रेतीले नमी वाले इलाके में बहुतायत में होता है. इसे बाढ़ वाला क्षेत्र भी कहा जाता है. तीन दशक से पेंसिल फैक्ट्री में काम कर रहे वन विभाग के पूर्व कर्मचारी और केसर की खेती करने वाले किसान गुलाम मोहम्मद डार बताते हैं कि यहां लगाए जाने वाला पॉपुलर का पेड़ सिर्फ 6 -7 साल में ही तीन फुट की मोटाई और 100 फूट उंचाई वाला हो जाता है जबकि पहाड़ी क्षेत्र में 20 -25 साल में भी इसका तना कुछ ही इंच मोटा हो पाता है. पॉपुलर के पेड़ को लेकर कोविड 19 के दौर में हुए सरकारी आदेश और उससे फैली भ्रांतियों ने भी इन फैक्टरियों के लिए मुसीबत खडी की. दरअसल पॉपुलर का पेड़ बेहद गर्मियों वाले दिनों में रोएं जैसा पराग छोड़ता है. इससे संक्रमण के फैलने के खतरे को लेकर सरकारी आदेश के बाद पॉपुलर की खेती तो हतोत्साहित हुई ही , आवासीय क्षेत्रों के आसपास आधा किलोमीटर तक फासले पर लगे पॉपुलर के पेड़ काट दिए गए . इससे भी पॉपुलर की सप्लाई प्रभावित हुई . पेंसिल ही नहीं पॉपुलर की लकड़ी का इस्तेमाल जम्मू कश्मीर में विभिन्न उद्योगों में होता है. प्लाई वुड और बोर्ड बनाने वाले कारखाने , क्रिकेट बैट और फलों की पेटियां बनाने में भी सबसे ज्यादा पॉपुलर की लकड़ी इस्तेमाल होती है.