10 साल पहले राहुल गांधी ने जिस अध्यादेश को फाड़ा था, उसी के चक्कर में अब कहीं चली न जाए संसद सदस्यता

नई दिल्ली : ‘मोदी सरनेम’ को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में सूरत की एक अदालत ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को आपराधिक मानहानि का दोषी ठहराया है। कोर्ट ने उन्हें 2 साल जेल की सजा सुनाई है। हालांकि, कोर्ट ने राहुल गांधी को जमानत देते हुए सजा के अमल पर 30 दिनों तक की रोक भी लगा दी है ताकि कांग्रेस नेता फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे सकें। राहुल गांधी के सजायाफ्ता होने और 2 साल की सजा के फैसले के साथ ही उनकी वायनाड से लोकसभा की सदस्यता पर भी खतरा मंडरा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2013 के अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि अगर किसी जनप्रतिनिधि (सांसद, विधायक, विधान परिषद सदस्य) को किसी मामले में कम से कम 2 साल की होती है तो उसकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से खत्म हो जाएगी। खास बात ये है कि केंद्र की तत्कालीन मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए उसी साल अध्यादेश लाने की कोशिश की थी लेकिन तब राहुल गांधी ने उसे बकवास बताते हुए उसकी प्रति फाड़कर फेंक दी थी। 2 साल या उससे ज्यादा सजा होने पर सांसद या विधायक की तत्काल जाएगी सदस्यताकरीब 10 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने उस ऐतिहासिक फैसले में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को निरस्त कर दिया था। उससे पहले तक आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए जा चुके जनप्रतिनिधियों की सदस्यता तुरंत नहीं जाती थी। उन्हें सजा के ऐलान के बाद 3 महीने के भीतर उसे चुनौती देते हुए ऊपरी अदालत में जाना होता था। ऊपरी अदालत में जबतक उसकी अपील लंबित होती थी, तबतक उसकी सदस्यता नहीं जा सकती थी। अपील पर अंतिम फैसला आने तक उसकी सदस्यता नहीं जा सकती थी। अगर हाई कोर्ट ने भी सजा पर मुहर लगा दी तो उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर सदस्यता बच जाती थी। अगर सुप्रीम कोर्ट ने भी सजा बरकरार रखा तो रिव्यू पिटिशन लंबित होने तक उसकी सदस्यता बची रहती थी। दोषी प्रतिनिधि की सदस्यता तभी जाती थी जब उसके पास कोई कानूनी चारा नहीं बचता था। एक तो बरसों ऊपरी अदालत में मामला रहता था और ऐसे मामलों में जबतक सुप्रीम कोर्ट से रिव्यू पर फैसला आता तबतक संबंधित जनप्रतिनिधि का कार्यकाल निश्चित तौर पर खत्म हो जाता। 10 जुलाई 2013 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा कि कम से कम 2 साल की सजा होने पर जनप्रतिनिधि की सदस्यता तत्काल प्रभाव से खत्म हो जाएगी। इतना ही नहीं, सजा खत्म होने के डेट से अगले 6 साल तक वह चुनाव लड़ने के लिए भी अयोग्य होगा। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद 1 अक्टूबर 2013 को सांसद राशिद मसूद की सदस्यता चली गई जिन्हें एक आपराधिक मामल में 4 साज कैद की सजा सुनाई गई थी। वह पहले ऐसे सांसद थे जिनकी सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद संसद सदस्यता गई।लिली थॉमस केस और सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला वकील लिली थॉमस और एनजीओ लोक प्रहरी के सचिव लखनऊ के वकील सत्य नारायण शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को चुनौती दी थी। ये धारा सजायाफ्ता नेताओं को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराए जाने, निर्वाचित सदस्यों की सदस्यता जाने से इस आधार पर बचाता था कि सजा के खिलाफ उनकी अपील ऊपरी अदालतों में लंबित है। इस केस को लिल थॉमस केस के नाम से जाना जाता है। 10 जुलाई 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। जस्टिस ए. के. पटनायक और जस्टिस एस. जे. मुखोपाध्याय की बेंच ने जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 8 (4) को असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अगर सांसदों और विधायकों को किसी भी आपराधिक मामले में 2 साल या उससे ज्यादा की सजा होती है तो उसकी सदस्यता तक्काल प्रभाव से खत्म हो जाएगी। सजा पूरी होने के बाद बाद अगले 6 साल तक वह चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे। इतना ही नहीं, जेल में रहते हुए किसी सजायाफ्ता नेता को वोट देने का अधिकार नहीं होगा। वे चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मनमोहन सरकार ने अध्यादेश के जरिए पलटने की कोशिश की थीखास बात ये है कि लिली थॉमस केस में आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को उसी साल डॉक्टर मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने अध्यादेश से पलटने की कोशिश की थी। यूपीए सरकार ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को बहाल करने के लिए अध्यादेश लाने की कोशिश की थी। ये भी एक संयोग है कि उस अध्यादेश को बकवास बताते हुए तब राहुल गांधी ने उसकी प्रति को फाड़कर फेंक दिया था। आज सुप्रीम कोर्ट के उसी फैसले से राहुल गांधी की संसद सदस्यता पर तलवार लटक रही है।तो क्या तत्काल खत्म हो जाएगी राहुल गांधी की संसद सदस्यता?सूरत की अदालत ने अपने फैसले को एक महीने के लिए सस्पेंड कर रखा है। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि इस अवधि में राहुल गांधी फैसले के खिलाफ अपील कर सकें। इसलिए 1 महीने तक राहुल गांधी की सदस्यता शायद ही जाए। अगर इस एक महीने में राहुल गांधी सूरत कोर्ट के फैसले पर स्टे लेने में कामयाब हो जाते हैं तो उनकी लोकसभा सदस्यता बरकरार रह सकती है।सुप्रीम कोर्ट के वकील ने लोकसभा स्पीकर से की राहुल की सदस्यता खत्म करने की मांगइस बीच सुप्रीम कोर्ट के वकील और ऐक्टिविस्ट विनीत जिंदल ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के यहां शिकायत दर्ज कराते हुए राहुल गांधी की संसद सदस्यता खत्म करने की मांग की है। न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक, शिकायत में कहा गया है कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(3) के तहत अगर किसी सांसद या विधायक को किसी अपराध में 2 साल या उससे ज्यादा की सजा होती है तो सजा वाले दिन से ही वह अयोग्य माना जाएगा। शिकायतकर्ता ने स्पीकर से राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता को तत्काल प्रभाव से खत्म करने की मांग की है।