बिहार की राजनीति में सीमांचल क्यों बना इतना अहम, अभी से लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू

पूर्णिया: लोकसभा चुनाव का वोटिंग ट्रेंड इस बार सीमांचल तय करने जा रहा है। यह मैं नहीं, बल्कि राज्य की प्रभावी पार्टियां की ओर से सीमांचल को प्राथमिकता देने के बाद बिहार को नए वोटिंग ट्रेंड से गुजरने के कयास लगाए जा रहे हैं। हो यह रहा है कि बीजेपी ने सीमांचल को प्राथमिकता क्या दी सभी प्रमुख पार्टियां भेड़ चाल की तरह पिछलग्गू बनकर सीमांचल से ही एक तरह से लोकसभा चुनाव का आगाज करते दिखी।

बीजेपी की इस शुरुआत के बाद महागठबंधन ने अपनी रैली की जगह सीमांचल यानी पूर्णिया से की। पिछले कुछ चुनाव से प्रमुखता में AIMIM भी आज शनिवार 18 मार्च को सीमांचल से ही चुनावी आगाज करने जा रही है।क्या है बीजेपी की रणनीतिजाहिर है बीजेपी ने अपने कार्यक्रमों के जरिए यह तो कह ही दी है कि इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए सीमांचल अहम है और एक बड़ा मकसद भी इसके पीछे छुपा है। जेडीयू का साथ छूटने के बाद बीजेपी अब बिहार की राजनीति को एक नया मोड़ देना चाहती है। बीजेपी उत्तरप्रदेश की तरह बिहार में उस राजनीति को जन्म देना चाहती है, जहां हिंदूवाद के पथ पर चलकर छोटी-छोटी जातियों के कद्दावर नेताओं को एक प्लेटफार्म पर लाया जाए। बीजेपी को यह विश्वास है कि मंडल को कमंडल से ही टक्कर दे सकता है। इस प्लेटफार्म पर लाने की कवायद में एलजेपी, वीआईपी, हम और राष्ट्रीय लोक दल जैसी पार्टियां भी हैं। बीजेपी का सीमांचल पर जोर की दूसरी वजह यह है कि जिस तरह से बीजेपी नीत केंद्र सरकार ने पसमांदा मुस्लिम को योजनाओं से जोड़कर एक हद तक बीजेपी का वोट देश में हासिल किया था, बिहार में वही प्रयोग भी बीजेपी करना चाहती है।

सीमांचल की यात्रा को लेकर बीजेपी इसलिए भी ज्यादा उत्साहित है कि इस क्षेत्र के चार लोक सभा क्षेत्र पर कभी न कभी बीजेपी को जीत हासिल हुई है।एक समय था जब किशनगंज से बीजेपी के शाहनवाज हुसैन ने जीत दर्ज की थी। कटिहार से निखिल चौधरी, पूर्णिया से उदय सिंह और अररिया से कभी सुखदेव पासवान तो कभी प्रदीप सिंह जीता करते थे। बीजेपी इन सीटों पर जीत का समीकरण तैयार करना चाहती है तो उसे हिंदुत्व के मुद्दे को उभारना होगा। इसके लिए अमित शाह दो दो बार सीमांचल की यात्रा की। और इस आगमन के साथ अमित शाह ने पसमांदा मुस्लिम के मुद्दे को विश्वास के साथ उठाया भी।

बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडे की काट को लेकर महागठबंधन ने पूर्णिया में रैली कर सेक्युलरिज्म के कार्ड से हिंदुत्व के मुद्दे पर शिथिल करने की कोशिश की। आरजेडी, जेडीयू और वामदलों ने बीजेपी के बांटने की राजनीति की काफी आलोचना करते राज्य की राजनीति को धर्म के मुद्दे से अलग रखने की रणनीति पर लाने की कोशिश की गई।

हालांकि AIMIM भले अपनी राजनीति के विस्तार के लिए बिहार आई है, लेकिन इसका एक सिरा बीजेपी से जुड़ जाता रहा है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में ओवैसी की इस भागीदारी को लेकर एक आम धारणा बनाई गई है कि यह बीजेपी की बी टीम है। खास कर राज्य में हुए तीन उपचुनावों में बीजेपी की दो सीटों पर जीत का कारण को AIMIM के काटे गए वोट को माना जा रहा है।

वैसे सीमांचल में पांच विधानसभा सीटों पर जीत हासिल कर ओवैसी ने अपनी ताकत का अहसास करा दिया है। मिली जानकारी के अनुसार ओवैसी अब अपनी पार्टी का विस्तार मध्य बिहार के उन क्षेत्रों में करने जा रहे हैं, जहां मुस्लिम और दलितों की संख्या ज्यादा हो। महागठबंधन की परेशानी का कारण भी यही है कि अब पूरे बिहार में ओवैसी की पार्टी लोकसभा चुनाव में भागीदारी करती है तो यह MY (मुस्लिम+यादव) समीकरण को तोड़ने का कारक बनेंगे। और यह अपरोक्ष रूप से बीजेपी के लिए लाभकारी होगा। क्या कहते हैं विशेषज्ञकांग्रेस के प्रवक्ता असीत नाथ तिवारी कहते हैं कि बीजेपी को फॉलो करते हुए महागठबंधन की सबसे बड़ी गलती है पूर्णिया में रैली करना। यह कहीं न कहीं बीजेपी के मुद्दे को ही मजबूत कर गया है।

यह कहीं न कहीं हिंदू गोलबंदी का कारण बनेगा। बीजेपी ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए जो जाल बिछाया उसमें महागठबंधन के नेता फंस गए। फिलहाल तो महागठबंधन जाल में फंस गए हैं। लेकिन चुनाव में अभी समय है बीजेपी को परास्त करने के लिए अपनी नीति, अपनी योजनाओं के साथ वोटरों को आकर्षित करना होगा, तभी बीजेपी जैसी ताकतों को टक्कर दिया जा सकता है।