OPINION: अब सरकार चाहे भी तो क्या माफिया और पुलिस नहीं खुलने देंगे बिहार में शराब की दुकान?

नील कमल, पटना: बिहार में पूर्ण शराबबंदी है। इसके बावजूद जहरीली शराब से मौत हो रही है। कई लोगों की जान जाने के बाद विपक्ष के नेता नीतीश सरकार पर हमलावर हैं। विपक्ष की ओर से न सिर्फ शराबबंदी को फेल बताया जा रहा है, बल्कि ये आरोप भी लगाया जा रहा है कि जेडीयू और आरजेडी के नेता भी शराब माफिया के साथ मिलीभगत कर जेब भर रहे हैं। वहीं, सत्ताधारी दल के नेता ऐसा ही आरोप बीजेपी के बड़े नेताओं पर लागाते हैं।

कई बार हाई लेवल मीटिंग करे चुके हैं नीतीश कुमार

जहरीली शराबकांड की वजह से कई लोगों की जान जा चुकी है। शराबबंदी कानून का डर ऐसा कि जहरीली शराब पीकर बीमार हुए लोग इलाज के लिए अस्पताल भी नहीं जाते। बिहार के छपरा, सिवान, मुजफ्फरपुर, पश्चिम चंपारण और गोपालगंज में जहरीली शराब की घटना के बाद गुस्से में आए नीतीश ने उच्चस्तरीय बैठक की थी। मुख्यमंत्री ने सभी प्रशासनिक और पुलिस के पदाधिकारियों को डिटेल के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया था। लेकिन मुख्यमंत्री की बैठक के बाद भी बिहार में जहरीली शराब से मौत का सिलसिला जारी है। हालांकि. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बेहद नाराज हैं। मामले में लापरवाही बरतने वाले पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई करने की भी बात कह रहे हैं।

अप्रैल 2015 में नीतीश ने पूर्ण शराबबंदी का किया था ऐलान

2015 में चुनावी वादे के तहत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अप्रैल के महीने में एक महिला के कहने पर बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून को लागू किया था। तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ये कहा था कि शराब की वजह से हजारों परिवार उजड़ रहे हैं। शराब पीने से लोगों की सेहत खराब होने के साथ-साथ परिवार के अंदर लड़ाई-झगड़े में भी इजाफा हो रहा था। उन्होंने कहा था कि शराबबंदी के बाद उन्हें राजनीतिक लाभ-हानि से मतलब नहीं बल्कि उन्हें लोगों की चिंता है। शराबबंदी की वजह से बिहार सरकार को हर साल करीब 7 हजार करोड़ रुपए के राजस्व की हानि हो रही है। बावजूद इसके नीतीश कुमार ने लोगों की भलाई के लिए बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून को लागू किया था।

जहरीली शराब से अब तक 1000 से अधिक लोगों की मौत

2015 अप्रैल से लेकर जनवरी 2023 तक जहरीली शराब के कई मामले बिहार में आ चुके हैं। साल 2022 में ही बिहार में जहरीली शराब पीकर मरने वालों की संख्या 100 से अधिक पहुंच चुकी है। छपरा, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज, सिवान और पश्चिम चंपारण समेत अन्य जिलों से भी जहरीली शराब पीकर लोगों के मरने की खबर आई। पर्व त्योहार के मौके पर जहरीली शराब से मरने वालों की तादाद अचानक बढ़ जाती है। इन घटनाओं के बाद जहां विपक्ष एक बार फिर नीतीश सरकार पर हमलावर है तो दूसरी तरफ घटना के बाद सत्ता पक्ष की ओर से भी बयानबाजी की जा रही है।

शराबबंदी कानून सख्त तो माफिया के हौसले बुलंद क्यों?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार के लोगों के हित को देखते हुए पूर्ण शराबबंदी की घोषणा की। बिहार के लोगों की सेहत अच्छी रहे, उनके परिवार न उजड़े इस सोच के साथ पूर्ण शराबबंदी कानून लागू किए गए। सवाल ये उठता है कि जब सख्त शराबबंदी कानून बनाए गए हैं तो शराब माफिया के हौसले इतने बुलंद कैसे हैं? छापेमारी के लिए जाने वाले पुलिसकर्मियों पर ही वो हमला क्यों कर रहे? आखिरकार बिहार में शराब माफिया का हौसला इतना बुलंद कैसे हो गया? वो पुलिसकर्मियों पर हमला करने के साथ-साथ उनकी हत्या करने से भी बाज नहीं आते।

बिहार में सरकार के सहयोगी भी मारते हैं ताना

जाहिर है सरकारी दावों के विपरीत शराबबंदी की जमीनी हकीकत कुछ और है। विपक्ष के साथ-साथ सत्तारूढ़ महागठबंधन के भी कुछ नेता ये कहने से नहीं हिचकते कि शराबबंदी कानून को सख्ती से लागू नहीं किया जा रहा। जीतन राम मांझी, मुकेश साहनी और कांग्रेस के विधायक अजित शर्मा बयान देते रहते हैं। शराबबंदी को लेकर फिर से विचार करने जैसी बात कहकर सरकार के लिए परेशानी खड़ा कर देते हैं। शराबबंदी लागू होने के बाद से अब तक करीब 6 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए। जेल जाने वालों में ज्यादातर अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़े वर्ग से आने वाले लोग हैं। बिहार मे अब तक लाखों लीटर देसी शराब और लाखों लीटर विदेशी शराब भी जब्त की गई। मामले में 4 लाख 50 हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है। इनमें 700 से ज्यादा पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई, 400 से अधिक सरकारी कर्मचारियों पर प्राथमिकी, 200 से अधिक लोगों को बर्खास्तगी और 60 से अधिक थानाध्यक्षों को शराब मामले की वजह से हटाया जा चुका है।

शराबबंदी से सड़क दुर्घटना और हंगामे की घटना में कमी

आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल 2015 में पूर्ण शराबबंदी कानून के लागू होने के बाद से बिहार में होने वाले सड़क दुर्घटनाओं में काफी कमी आई है। वहीं, सड़क पर शराब पीकर हंगामा करने और छेड़छाड़ की घटना में भी रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई। लोगों का मानना है कि शराबबंदी के बाद भी बिहार में शराब उपलब्ध जरूर है लेकिन कानून का डर ऐसा है कि शराब पीकर लोग सड़क पर जाने से डरते हैं। यही वजह है कि सड़क पर अब शराबियों की जमात नहीं दिखती। आम लोगों का कहना है कि शराबबंदी बेहतर व्यवस्था है लेकिन, पुलिस प्रशासन की लापरवाही और मिलीभगत की वजह से शराब माफिया पनप रहे हैं। पुलिस और माफिया कभी नहीं चाहेंगे कि बिहार में शराब की दुकानें फिर खुले। माफिया और पुलिस की मिलीभगत से शराब की होम डिलीवरी की जा रही है।

शराबबंदी को लेकर आम लोगों का क्या कहना है?

पटना के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उसने खुद कई बार कम उम्र के लड़कों को शराब की होम डिलीवरी करते देखा है। पटना के ही एक अन्य शख्स ने ये सवाल किया कि पुलिस शराब पीने वाले को तो पकड़ लेती है, लेकिन शराब तस्कर को नहीं पकड़ पाती, ऐसा क्यों? उन्होंने बताया कि दरअसल, ये पुलिस और शराब माफिया की मिलीभगत है। शराब माफिया से भी पुलिस पैसे ले रही है। शराब की होम डिलीवरी करने वाले से भी वसूली कर रही है। साथ ही शराब पीने वाले को भी पकड़कर थाने ले जाती है, इसके बाद मोटी रकम लेने के बाद उसे छोड़ देती है। उन्होंने कहा कि हालात अब ऐसे हो गए हैं कि सरकार अब शराब की दुकान फिर से खोलना भी चाहे तो माफिया और पुलिस ऐसा होने नहीं देगी। क्योंकि शराब की सरकारी दुकानें खुल जाने के बाद पुलिस और माफिया की होने वाली करोड़ों की कमाई बंद हो जाएगी।