Opinion: नीतीश जी! आपसे ये उम्मीद ना थी, आपकी सरकार ने बहुमत तो जीत लिया, लेकिन लोकतंत्र हारा

पटना: आखिरकार नीतीश कुमार ने अविश्वास के माहौल में विश्वास मत हासिल कर अपनी सरकार बचा ली। लेकिन इस खेल में लोकतंत्र जरूर हार गया। बहुमत के मैजिक नंबर के खातिर क्या क्या प्रपंच नहीं रचे गए। एक दूसरे पर पद, प्रलोभन और पैसे के आरोप भी लगे। हद तो तब हो गई जब जदयू के एक विधायक पर ही जदयू के दो विधायक के अपहरण का आरोप लगा और फिर एफआईआर तक दर्ज हुए। बड़े ही नाटकीय ढंग से एनडीए ने राजद के तीन विधायकों को वोटिंग से पहले ही अपने खेमे में मिलाकर यह संदेश दिया कि युद्ध और प्यार में सब कुछ जायज है।बहुमत की चौकीदारीयह शायद बिहार के राजनीतिक इतिहास में पहली बार हुआ है जब सत्ता और विपक्ष बहुमत की चौकीदारी करते नजर आए। दलीय आस्था तार-तार होते दिखी। नेतृत्व की कमजोरी साफ दिखी। पार्टी की नीति और सिद्धांत से परे लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ी जा रही थी। अपने-अपने कुनबा समेटने के तरकीब ढूंढे जाने लगे। बहुमत के इस खेल में शामिल लगभग सभी दल विधायकों की बाड़ेबंदी में शामिल हो गए। हां, तरीका अलग-अलग जरूर था। आइए लोकतंत्र में बहुमत के इस खेल में दलों के हथकंडे जानते हैं…बाड़ेबंदी को नीतीश की हां!राजनीतिक शुचिता और स्वच्छ राजनीति के लिए जाने वाले नीतीश कुमार का इस बार धैर्य समाप्त होता दिखा। बहुमत पाने की बाजी को लेकर नीतीश कुमार ने भी विधायकों की बाड़े बंदी को हां की। इतना जरूर था कि नीतीश कुमार का तरीका वह नहीं रहा जिसे कांग्रेस या फिर भाजपा ने अंजाम दिया। लेकिन डिनर डिप्लोमेसी के तहत विधायकों को सहेजने की कोशिश जरूर की। इस कोशिश में नीतीश कुमार की ओर से प्रशासन के उपयोग करने का आरोप भी लगा। विजय मंडल ने अधिकारियों के फोन आने की बात स्वीकार की। विधायक डॉ. संजीव को तो प्रशासन के सहयोग से पटना लाया गया। डॉक्टर संजीव ने कहा पुलिस ने डिटेन किया। बिहार में अफसरशाही से वे नाराज थे। आधी रात में तो प्रशासन ने पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी आवास का दरवाजा भी खटखटाया। राजद के प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने तो नीतीश सरकार पर आरोप लगाया कि हमारे विधायक चेतन आनंद, प्रह्लाद यादव और नीलम कुमारी पर दवाब बनाकर उन्हें सचेतक के कमरा में रखा गया। इन तीनों विधायकों का बैकग्राउंड जाने और फिर समझे लोकतंत्र के मंदिर में किस तरह का खेला हुआ।अविश्वास के माहौल में भाजपाअनुशासित भाजपा के भीतर भी काफी अविश्वास का माहौल दिखा। नतीजतन भाजपा नेतृत्व को भी अपने विधायकों को जोड़े रखने के लिए बाड़ेबंदी करनी पड़ी। और सभी विधायकों को बोधगया के एक रेजॉर्ट में रखा गया। भले बीजेपी इसे प्रशिक्षण कार्यक्रम से जोड़कर आई वाश करने की कोशिश की। लेकिन सच्चाई यह भी दिखी इन तमाम कोशिश के बाद बीजेपी के तीन विधायकों ने भेड़चाल से खुद को अलग रखा साथ ही अविश्वास प्रस्ताव से खुद को अलग भी रखा।बाड़ेबंदी आरजेडी और कांग्रेस ने भी कीअविश्वास तो आरजेडी नेतृत्व को अपने विधायकों पर भी नहीं रहा। पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने तो सरकारी आवास को बाड़ा बना दिया। और दो दिन तक राजद के विधायक उसी आवास में रहे। कांग्रेस ने तो अपने विधायकों को बिहार में भी नहीं रखा और उन्हें हैदराबाद ले कर चले गए। विधायकों को बाजार का घोड़ा बना दिया: बागीवरीय पत्रकार प्रवीण बागी कहते हैं कि विश्वास प्राप्त करने की प्रक्रिया में पूरी तरह से अविश्वास का माहौल तैयार किया गया। इसके लिए पार्टी के नेतृत्वकर्ता जिम्मेवार हैं। सारे विधायक डरे सहमे नजर आए। एक साजिश के तहत अफवाह भी खूब फैलाई गई। इससे नेताओं की प्रतिष्ठा गिरी। ये सब नेताओं का संविधान पर भरोसा नहीं होने के कारण हो रहा है। ये सर्व सत्तावादी राजनीति के उदाहरण हैं। पर इतना तो जरूर हुआ कि नेताओं के बयान ने विधायकों को बाजार का घोड़ा बना डाला। जहा प्रलोभन का बाजार चरम पर दिखा।