AMU पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में खोल दिया आजादी के पहले वाला राज, आप भी हो जाएंगे हैरान

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने को बताया कि (एएमयू) की स्थापना की वकालत करने वाले मुसलमानों ने खुद ही संस्थान के सांप्रदायिक चरित्र का त्याग कर दिया था और 1920 में इसके प्रशासन पर सरकारी नियंत्रण के अधीन सौंप दिया था। उन्होंने खुद कहा था कि एएमयू के गठन के पीछे उद्देश्य राष्ट्रीय महत्व का एक संस्थान बनाना था।राष्ट्रीय महत्व का संस्थान बनाना था उद्देश्यसॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले में 1967 के फैसले पर पुनर्विचार करने के खिलाफ तर्क दिया जिसमें एएमयू को गैर-अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किया गया था। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एफिलियेटेड मुहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल (एमएओ) कॉलेज की गवर्निंग सोसाइटी का विघटन 1920 एक्ट के तहत कर दिया गया था ताकि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के समान एक राष्ट्रीय संस्थान बनाया जा सके।एएमयू के संरक्षकों ने ही उठाया था कदमएसजी तुषार मेहता ने इस बात पर जोर डाला कि एएमयू के सांप्रदायिक चरित्र और इसके प्रशासन पर मुस्लिम नियंत्रण को त्यागने के लिए एमएओ कॉलेज के संरक्षकों को समुदाय के भीतर ही विरोध का सामना करना पड़ा था। ये संरक्षक अंग्रेजों के वफादार माने जाते थे। मेहता ने कहा कि जामिया मिलिया इस्लामिया को एक वैकल्पिक संस्थान के रूप में बनाया गया था जिसने संविधान पूर्व और संविधान के बाद के युग के दौरान सेंट स्टीफंस कॉलेज के समान अपने अल्पसंख्यक दर्जे को बरकरार रखा था।ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण से बचने का विकल्प नहीं चुना एएमयू संरक्षकों का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार से मान्यता प्राप्त एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना था, जिससे छात्र क्राउन के तहत रोजगार के लिए पात्र हो सकें। मेहता ने जोर देकर कहा कि एमएओ कॉलेज के पास खुद की अल्पसंख्यक संस्थान की पहचान जारी रखकर ब्रिटिश नियंत्रण से बचने का विकल्प था। हालांकि, उन्होंने यह विकल्प नहीं चुना।मेहता ने आगे कहा कि अंग्रेजों के वफादारों ने एएमयू की स्थापना के दौरान प्रशासन का अधिकार छोड़ दिया था ताकि ब्रिटिश शासन उसके लिए कानून बना सके। इस व्यवस्था को संविधान लागू होने के बाद बदला नहीं जा सकता है, क्योंकि एएमयू के प्रशासन का फैसला तब हो चुका था जब ‘मौलिक अधिकार’ की संकल्पना आई नहीं थी।एएमयू पर ‘मौलिक अधिकार’ का प्रावधान लागू नहीं होताउन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह संविधान बनने से पहले जो संस्थान अस्तित्व में आ गए थे, उसे संविधान के अनुच्छेद 30 के चश्मे से नहीं देखा जा सकता, जो शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन के लिए भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की गारंटी देता है। मेहता ने तर्क दिया कि एएमयू की स्थापना की ओर ले जाने वाली घटनाओं ने संकेत दिया कि यह एक सांप्रदायिक संस्थान नहीं था।एएमयू के इस तर्क के जवाब में कि 1920 के अधिनियम का उसके अल्पसंख्यक चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और इसका उद्देश्य केवल अपनी डिग्री को मान्यता देना था, मेहता ने बताया कि एएमयू का अस्तित्व 1920 के अधिनियम में निहित था जिसने ब्रिटिश सरकार को व्यापक नियंत्रण प्रदान किया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों को स्थापित करने का विकल्प अल्पसंख्यक समुदायों को आरक्षण और रेग्युलेशन जैसे अन्य संवैधानिक दायित्वों का पालन करने से छूट नहीं देता है। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने जोर देकर कहा कि अल्पसंख्यकों की पसंद की स्वतंत्रता को संवैधानिक रूप से स्वीकृत रेग्युलेशनों और आवश्यकताओं को कमजोर नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक राज्य उस विकल्प का उल्लंघन नहीं करता है, तब तक अनुच्छेद 30 बरकरार रहता है। बहस बुधवार को भी जारी रहेगी।