अब विधानसभा में भी पीना होगा खून का घूंट, राहुल नार्वेकर के फैसले से कैसे मजबूर हुए उद्धव ठाकरे

मुंबई : स्पीकर के एक फैसले ने (यूबीटी) प्रमुख को मुश्किल में डाल दिया है। अक्टूबर तक होने वाले विधान परिषद के सत्रों में उन्हें शिंदे गुट के साथ सत्ता की ओर बैठना पड़ेगा। इसके साथ ही उनसे मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी खत्म हो जाएगा। विधानसभा में उनके बेटे आदित्य ठाकरे भी शिंदे गुट के साथ बैठने को मजबूर होंगे। जुलाई 2022 में उद्धव ठाकरे को सत्ता से बेदखल चुके हैं। हालांकि शिवसेना यूबीटी गुट ने स्पीकर के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का ऐलान किया है, मगर कोर्ट का निर्णय आने तक उन्हें खून का घूंट पीना पड़ेगा। इसके अलावा ठाकरे को समर्थन देने वाले सभी 14 विधायकों को भी शिंदे गुट के व्हिप के अनुसार सरकार के पक्ष में मतदान करना होगा। उद्धव और आदित्य ठाकरे अगर व्हिप का उल्लंघन करेंगे तो उनकी सदस्यता भी खतरे में पड़ जाएगी। स्पीकर राहुल नार्वेकर ने पार्टी के दोनों धड़ों के किसी विधायक की सदस्यता रद्द नहीं की थी मगर उन्होंने शिंदे गुट को असली शिवसेना होने का निर्णय दिया था। शिंदे की शिवसेना असली, अब उद्धव के विधायक को भी मानना पड़ेगाविधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर विधायकों की अयोग्यता की 6 अलग-अलग याचिकाओं पर 10 जनवरी को फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट की डेडलाइन देने के बाद अपने फैसले में स्पीकर ने शिंदे गुट के 16 और ठाकरे गुट के 14 विधायकों की सदस्यता बहाल रखी थी। अपने फैसले में उन्होंने शिवसेना के 1999 के संविधान और चुनाव आयोग में पार्टी के बॉयलॉज को आधार बनाया था। पार्टी के संविधान के अनुसार, पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ही किसी नेता को पार्टी से निकालने का निर्णय ले सकती है। संविधान के आधार पर ही उन्होंने उद्धव ठाकरे के पार्टी प्रमुख पद को सर्वोच्च मानने से इनकार कर दिया। स्पीकर ने फैसले में बताया कि चूंकि एकनाथ शिंदे के पास 37 विधायक हैं, इसलिए शिंदे की शिवसेना ही असली है। राहुल नार्वेकर के फैसले के कई पहलू हैं। चूंकि स्पीकर ने शिवसेना के किसी सदस्य को अयोग्य नहीं किया और शिंदे को विधानसभा में शिवसेना नेता मान लिया, इस आधार पर अब ठाकरे गुट के विधायकों के नेता भी एकनाथ शिंदे हो गए। विधानसभा अध्यक्ष ने शिंदे गुट के विधायक भरत गोगावले के चीफ व्हिप माना है, इस आधार पर पूरे शिवसेना विधायक दल को उनकी ओर से जारी व्हिप को भी मानना होगा। असली शिवसेना का फैसला होने के बाद ठाकरे गुट के विधायक भी सत्ता पक्ष के माने जाएंगे, इसलिए विधानसभा में यूबीटी के सभी विधायक शिंदे गुट के साथ नजर आएंगे। यह आदेश विधान परिषद में भी लागू होगा। उद्धव ठाकरे मई 2020 में विधान परिषद के सदस्य चुने गए थे, अब विधान परिषद में विधायक दल यानी एकनाथ शिंदे की ओर से नामित नेता शिवसेना का नेतृत्व करेंगे। यह परिस्थिति उद्धव के लिए असहज है।विधान परिषद में भी सत्ता दल के माने जाएंगे ठाकरे समर्थक एमएलसीउद्धव ठाकरे के लिए स्पीकर का फैसला गले की हड्डी बन गया है। विधान परिषद में उन्हें व्यक्तिगत रूप से शिवसेना के विधेयकों को सपोर्ट करना होगा और पार्टी के व्हिप को मानना होगा। विधान परिषद के शिवसेना के 11 एमएलसी हैं, जिनमें उद्धव भी शामिल हैं। 9 एमएलसी ठाकरे समर्थक माने जाते हैं। एकनाथ शिंदे ने एमएलसी विप्लव बाजोरिया को विधान परिषद में अपना चीफ व्हिप नियुक्त किया है। अभी इस पर फैसला नहीं आया है। विधान परिषद में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है। विधानसभा में अब एकनाथ शिंदे शिवसेना के 56 विधायकों के नेता माने जाएंगे। विधानसभा में बीजेपी के 105, कांग्रेस के 44, एनसीपी के 53 सदस्य है। एनसीपी के अजित गुट के पास 37 विधायक हैं, जबकि छोटे पवार 40 से अधिक विधायकों के समर्थन का दावा करते हैं। में 288 सीट है। बहुमत के लिए 145 सदस्यों का समर्थन जरूरी है। अब स्पीकर के फैसले के बाद सरकार के पक्ष में 201 विधायक गिने जाएंगे।