जेडीयू की कीमत पर लालू यादव बनने की कोशिश कर रहे हैं नीतीश कुमार

नई दिल्ली: जंग जीतने के लिए रणनीति जरूरी है। अगर तैयारी सही नहीं है तो मुश्किल हो सकती है। आपको अपने दुश्मन को परखना होता है। उसकी कमजोरियों पर फोकस करना होता है और उतना ही फोकस उसकी ताकत पर करना होता है। अगर बिना तैयारी आप दंगल में कूद पड़े तो वार उलटा पड़ सकता है। चाहे हथियार जैसा भी हो। राजनीति में इसका ध्यान तो खास तौर पर रखना होता है। यहां जंग दंगल में नहीं जुबान से ज्यादा होती है। बिना उठा पटक किए आप अटैक करते हैं और जनता की तालियां बटोरते हैं। ये तालियां ही वोट में कन्वर्ट होती है। तो साफ है कि जुबानी अटैक दुश्मन के कमजोर पक्ष पर किया जाए। नाकामियों को उधेड़ कर रख दीजिए। विफलता का तिल है तो उसे तार बना दीजिए। चलेगा। जनता समझेगी। लेकिन अगर दुश्मन की मजबूती पर चोट करेंगे जो उसे जनता के समर्थन से मिली है और जिसके लिए उसके वोटर खुद पर फख्र महसूस करते हैं तो आप खुद के पैर पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री को ये बात समझ लेनी चाहिए। अगर मुकाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से करना है तो तैयारी से दंगल में उतरना होगा। यहां तो बिखरा विपक्ष उन्हें मोदी से दो-दो हाथ करने लायक मानता भी है या नहीं, यही क्लियर नहीं है। फिर नीतीश तो चतुर चपल नेता रहे हैं। उम्मीद की जा रही थी कि भाजपा से तलाक के बाद वो मोदी के खिलाफ कोई ठोस रणनीति बना रहे होंगे। लेकिन राजनीति में उनकी संगिनी रही भाजपा के सबसे बड़े नेता पर जिस तरह से उन्होंने कमेंट किया है उसका असर बिहार में उलटा पड़ सकता है।

नीतीश के लिए जनता की चलनीये 2013 में मोदी से नाराज हुए नीतीश कुमार नहीं हैं। खुद अपने डिप्टी सीएम की नजर में पलटूराम नीतीश कुमार बन चुके हैं। इसलिए विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहे नीतीश की हर एक बात जनता चलनी में चालती है। अगर नीचे चला गया तो ठीक नहीं तो विश्वसनीयता का और क्षरण हो जाता है। नए साल पर नीतीश कुमार अचानक भड़क गए। गुस्सा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और नरेंद्र मोदी पर था। पटना में एक कार्यक्रम में नीतीश काफी नाराज दिखे। आरएसएस का कोई योगदान रहा है आजादी की लड़ाई में। जिन लोगों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, उनके बारे में पिताजी ने एक-एक बात बताई। हम देख रहे थे। एगो कौन बोली है.. देखे हैं न अखबार में। नए भारत के नए पिता। क्या किए हैं भारत के लिए। कुछ काम किए हैं। कहां भारत आगे बढ़ा। कौन सा काम हुआ।

मोदी को कोई हरा सकता है क्या..
तो क्या नीतीश वास्तव में संघ के बारे में यही राय रखते हैं। संघ की ताकत के कारण ही तो वो 2005 में बिहार की कुर्सी पर पहली बार काबिज हुए थे। 1996 से 2013 तक भाजपा के साथ सफर में संघ तो मजबूत ही हो रहा था। हां, मोदी के आने के बाद जब लालू के साथ 2015 का चुनाव जीत लिए तो नीतीश कुमार को संघ में खराबी दिखी। 16 अप्रैल, 2016 को उन्होंने संघमुक्त भारत का आह्वान किया। एक तरह से कांग्रेसमुक्त भारत के भाजपाई अभियान का जवाब वो दे रहे थे। लेकिन तस्वीर 2019 में बदल जाती है। तब नीतीश पलटकर भाजपा के समर्थन से सीएम थे। 16 जनवरी, 2019 को उन्होंने एबीपी न्यूज चैनल के एक प्रोग्राम में संघ की जमकर तारीफ की। उन्होंने क्या क्या कहा था। पढ़ लीजिए।

  • मैं तो छात्रजीवन से आरएसएस को जानता हूं। जब मीसा कानून के तहत गया जेल गया तो वहां गोविंदाचार्य से भेंट हुई थी
  • मैंने जेल में आरएसएस साहित्य का अध्ययन किया। ये अलग बात है कि जेपी और लोहिया से मैं ज्यादा प्रभावित रहा हूं।
  • संघ तो 1925 से लगातार काम करता आ रहा है। ये एक बड़ा संगठन है। आप उनसे सहमत हों या नहीं लेकिन उनकी प्रतिबद्धता की सानी नहीं।
  • पूर्वोत्तर में जो उन्होंने काम किया है, कोई कल्पना भी कर सकता है क्या.. वहां तो कई राज्यों में हिंदू आबादी बहुत कम है लेकिन वहां ये लगातार काम करते रहे हैं।
  • जेपी कहा करते थे कि संघ के काम का सिर्फ आठवां हिस्सा जनता के बीच आता है, बाकी किसी को दिखाई नहीं देता। मैं जेपी से पूरी तरह सहमत था।

2014 वाले 24 में नहीं रहेंगे..तो ये सब कहने वाले नीतीश अब मोदी से जंग के मूड में हैं लिहाजा संघ पर निशाना जरूरी है। लेकिन जैसा कि मैंने पहले भी कहा जनता चलनी लिए तैयार बैठी है क्योंकि आरएसएस नीतीश कुमार के मन के मुताबिक जनता के लिए कभी अच्छा और कभी बुरा नहीं हो जाएगा। निरंतरता के अकाल से जूझ रहे नीतीश ने नए साल पर एक और गलती की। नरेंद्र मोदी पर सीधा अटैक करके। उन्होंने बिना किसी तैयारी के कमजोर पक्ष पर हमला करने के बदले सीधे फैसला सुना दिया कि .. मोदी ने कोई काम नहीं किया है। यही नीतीश कुमार हैं जिन्होंने 31 जुलाई, 2017 के दिन कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2019 के इलेक्शन में हराने वाला कोई नहीं है। कोई उनकी बराबरी ही नहीं कर सकता। तब वो तेजस्वी यादव को डंप कर भाजपा के साथ आए ही थे। अब 10 अगस्त,2022 को नीतीश ने कैसे पलटी मारी वो देखिए। भाजपा छोड़ तेजस्वी संग शपथ लेते ही उन्होंने कहा – हम रहें या न रहें, वो 2024 में नहीं रह जाएंगे। 2014 वाले 2024 में नहीं रहेंगे।

कमाल के हैं नीतीश कुमार। मोदी पर फ्रंटल अटैक से पहले ये जानना जरूरी है कि अब हमारा देश पांच खरब डॉलर की इकॉनमी होने जा रही है, मेक इन इंडिया के तहत आईफोन बन रहे हैं, रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर तमाम अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भारत बड़ी ताकत बन कर उभरा है, कोरोना से मुकाबले के मोदी मॉडल का लोहा दुनिया मान रही, दो पड़ोसी दुश्मनों से कैसे निपटा जाए और घर में घुसकर कैसे वार किया जाए इसे भी जनता देख रही है। ये सब तो टॉप अप है क्योंकि राम मंदिर और धारा 370 का कोर एजेंडा तो लागू हो चुका है। तीन तलाक बैन करने के बाद अगला रास्ता समान नागरिक संहिता का है। फिर नीतीश कुमार ब्रांड मोदी पर अटैक करने की गलती करेंगे तो भाजपा को और मजबूत बनाते जाएंगे।

दिल्ली निकलने की जल्दबाजीमहंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर फोकस करते तो ठीक लेकिन जेनरिक हमले जनता की चलनी के पार नहीं हो सकते। इस मामले में नीतीश कुमार को अरविंद केजरीवाल, वाईएस राजशेखर रेड्डी जैसे क्षत्रपों से सीखना चाहिए। मोदी के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर सवाल उठाएंगे तो फंसते जाएंगे। ये इन नेताओं ने अच्छी तरह समझ लिया। नीतीश भी समझते थे। 2013 से 2015 के बीच रैलियों में और पत्राकरों से बातचीत में मोदी का नाम तक नहीं लेते थे नीतीश। उनको, वो.. जैसे शब्दों से काम चलता था। 2015 में बिहार के डीएनए वाला मुद्दा उन्होंने बेहतर ढंग से उठाया था। पर, इस बार तो नीतीश जल्दबाजी में दिख रहे। बिहार संभल नहीं रहा और लग रहा दिल्ली की तरफ झटक कर चलने की जल्दबाजी हो। अगर मोदी से मुकाबला करना है तो केजरीवाल मॉडल को देख लें नीतीश। दंगों के बाद केजरीवाल ने हनुमान चालीसा कराए, देशभक्ति सिलेबस लागू कर दिया, जनता को तीर्थ करा रहे, केंद्र से पहले खुद ही चीन के सामान पर बैन लगाने की मांग कर रहे। मतलब भाजपा के हथियार से राजनीति। इनको पता है कि मोदी पर निजी अटैक का असर खराब हो सकता है।

लालू यादव बनने की कोशिशमोदी के लिए राक्षस, चौकीदार चोर है, मौत का सोदागर, नीच आदमी, रावण, टुकड़े-टुकड़े करने की बात, नमक हराम, गंदी नाली .. जैसे शब्दों के इस्तेमाल जिसने भी किए ये हमें और आपको पता है। और ये भी पता है कि मोदी ने इन हमलों को कैसे हथियार बना लिया। इसलिए बिहार के सीएम को सतर्क रहने की जरूरत है। संघ और मोदी पर लालू यादव बनने की कोशिश जेडीयू को रसातल में पहुंचा सकती है। लालू यादव की पूरी राजनीति ही संघ के खिलाफ रही है। भाजपाविरोधी राजनीति में कभी टस से मस नहीं होने वाले लालू के आगे नीतीश कुमार की क्रेडिबिलिटी खत्म हो चुकी है। लालू के वोटर्स को पता है कि उनके नेता का जो कद है वो विचारधारा की मजबूती से बना है। नीतीश कुमार के पास क्या बचा है… न वोटर, न ही विचारधारा।