राम मंदिर आंदोलनकारियों पर गोली चलवाकर लालू से बड़े राष्ट्रीय नेता बन गए मुलायम सिंह यादव

साल 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाकर राष्ट्रीय स्तर सुर्खियों में आए मुलायम सिंह यादव इस गोलीकांड के बाद देशभर में
मुसलमानों के पसंदीदा नेता बन गए थे. हालांकि इस घटना के बाद राम मंदिर आंदोलन की कमान संभालने वाली बीजेपी को संजीवनी मिली. इसी गोली कांड को भुनाकर बीजेपी पहली बार 1991 यूपी की सत्ता में आई. आज वो केंद्र के साथ करीब डेढ़ दर्जन राज्यों में सत्ता में है. लेकिन ये भी सच्चाई है कि राम मंदिर आंदोलन को दबाने की कोशिश करने वाले मुलायम सिंह यादव भी उसी गोली कांड की बदौलत एक बड़े राष्ट्रीय नेता के तौर पर उभरे. केंद्र की राजनीति में उन्होंने लंबे समय तक अहम भूमिका निभाई.
मुलायम सिंह यादव ने बतौर मुख्यमंत्री 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाई थी. उनका ये फैसला उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा और विवादित फैसला रहा है. पहली बार 30 अक्टूबर, 1990 को कारसेवकों पर गोलियां चली. इसमें 5 लोगों की मौत हुई थीं. इसके दो दिन बाद ही 2 नवंबर को उस वक्त गोली चली जब हजारों कारसेवक बाबरी मस्जिद के बिल्कुल करीब हनुमान गढ़ी के पास पहुंच गए थे. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इसमें करीब ढेड़ दर्जन लोगों की मौत हो गई. मुलायम सिंह के इस कदम से उस समय बाबरी मस्जिद तो बच गई थी, लेकिन भारतीय राजनीति की दशा और दिशा हमेशा के लिए बदल गई. बीजेपी को यहीं से राजनीतिक संजीवनी मिली. जबकि मुलायम सिंह यादव की छवि हिंदू विरोधी बन गई. ये हिंदू विरोधी छवि अब तक मुलायम सिंह और उनकी पार्टी का पीछा नहीं छोड़ रही.
क्या थी गोली कांड के पीछे की राजनीति?
कारसेवकों पर गोली चलवाने का फैसला अचानक लिया गया था या फिर इसके पीछे कोई राजनीतिक वजह थी? इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश तभी से की जा रही है. दरअसल उस समय देश में बड़े पैमाने पर बने सांप्रदायिक माहौल में लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव के बीच मुसलमानों का बड़ा हमदर्द बनने की होड़ थी. लालकृष्ण आडवाणी अयोध्या में राम मंदिर बनाने के हक में
माहौल तैयार करने के मकसद से सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा पर निकले हुए थे. लालू प्रसाद यादव ने 23 अक्टूर को बिहार में आडवणी को गिरफ्तार करके उनकी रथयात्रा रोक दी थी. इस कदम से वो मुसलमानों की खूब हमदर्दी बटोर रहे थे. आडवाणी की गिरफ्तारी के बावजूद 30 अक्टूबर को कार सेवा करने के लिए अयोध्या में लाखों कारसेवक जुटे गए थे. बेकाबू कारसेवकों पर गोली चलवाकर मुलायम सिंह यादव मुसलमानों के बीच आडवाणी को गिरफ्तार करने वाली लालू प्रसाद यादव से बड़े हीरो बन गए थे.
गोलीकांड के बाद मुल्ला कहलाए मुलायम
इस गोलीकांड के बाद मुलायम सिंह यादव मुसलमानों के बड़े हीरो के रूप में उभरे. जबकि हिंदू संगठनों ने समाज में उनके खिलाफ नफरत फैलाई. उन्हें मुल्ला मुलायम और मौलाना मुलायम कहा जाने लगा. बीजेपी ने मुलायम सिंह की छवि हिंदू विरोधी नेता के रूप में बनाई. इसका खामियाजा उन्हें 1991 में अपनी सरकार गंवाकर चुकाना पड़ा. 1991 में राम लहर पर सवार होकर बीजेपी पूर्ण बहुमत से उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई. 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने के बाद मुल्ला मुलायम वाली छवि ही मुलायम के के काम आई. उन्होंने बसपा के साथ गठबंधन करके 1993 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को पटखनी दे दी. तब ये नारा खूब उछल था, मिले मुलायम कांशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम. उनका इस जीत ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े नेता के रूप में पहचान दिलाई. यहीं से उनके राष्ट्रीय नेता बनने के सफर की भी शुरुआत
हुई.
केंद्र की राजनीति में कदम
1995 में सपा से गठबंधन तोड़कर मायावती बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गईं थी. उसके बाद मुलायम सिंह यादव ने केंद्र की राजनीति में कदम रखा. तब से वो लगातार केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे. 1996 में उन्होंने पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते. तब उनकी पार्टी लोकसभा में 16 सीटें जीती थी. चुनाव के बाद बने संयुक्त मोर्चा का हिस्सा बने. संयुक्त मोर्चा और इसकी सरकार बनाने में मुलायम सिंह यादव की अहम भूमिका थी. यही वजह थी कि एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व में बनी संयुक्त मोर्चा की पहली सरकार में वो रक्षा मंत्री बने. करीब 10 महीने बाद इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने तो भी मुलायम सिंह यादव रक्षा मंत्री बन रहे. संयुक्त मोर्चा सरकार गिरने के बाद उनकी पार्टी केंद्र में किसी सरकार का हिस्सा नहीं रही. इसके बावजूद मुलायम सिंह यादव केंद्र की राजनीति को प्रभावित करते रहे.
प्रधानमंत्री बनते – बनते रह गए थे !
कहा जाता है कि संयुक्त मोर्चा सरकार में मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए थे. ये सरकार मई 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार गिरने के बाद के बाद 30 मई को एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व में बनी थी. तब वामपंथी दल संयुक्त मोर्चे हिस्सा थे और कांग्रेस सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी. तब पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव कांग्रेस के अध्यक्ष थे. लेकिन सितंबर में सीताराम केसरी नमरसिंह राव को हटाकर कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए थे. अप्रैल 1997 में अचानक कांग्रेस ने सरकार से समर्थन वापिस ले लिया था. कांग्रेस संयुक्त मोर्चा को अपना नेता बदलने की शर्त पर समर्थन देने को राजी हुई. कहा जाता है कि तब सबसे वरिष्ठ वामपंथी नेती और नेता सीपीएम के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत देवगौड़ा की जगह मुलायम सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के हक में थे. लेकिन लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान के विरोध के चलते इंद्र कुमार गुजराल के नाम पर सहमति बनी थी.
दावे पर रहा है विवाद
हालांकि इस दावे पर विवाद रहा है. मुलायम सिंह यादव ने खुद कई बार ये दावा किया है कि हरकिशन सिंह सुरजीत ने प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम आगे किया था. उस वक्त की खबरों के मुताबिक जब नेता तय करने के लिए संयुक्त मोर्चा की बैठक चल रह थी तब ये खबर मीडिया में लीक हो गई थी कि मुलायम सिंह यादव अगले प्रधानमंत्री हो सकते है. इस खबर के लीक होते ही प्रधानमंत्री को सुरक्षा देने वाली एसपीजी ने मुलायम सिंह के घर पर मोर्चा संभाल लिया था. उनके घर पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई थी. हरकिशन सिंह सुरजीत ने माना था कि मुलायम सिंह यादव उनके पसंदीदा नेता थे. लेकिन उन्होंने उस बात से इनकार किया था कि उन्होंने प्रधानमंत्री बनाने के लिए उनके नाम की पैरवी की थी. वहीं लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान हमेशा इस मुद्दे पर गोलमोल बात कहते रहे. इस तरह ये दावा हमेशा विवादित बना रहा.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में थी पहले से थी धाक
मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक सफर बहुत लंबा रहा. इस दौरान उन्होंने कई उतार चढ़ाव देखे. 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाने से पहले ही वो उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी धाक जमा चुके थे. मुलायम सिंह यादव 1967 से लेकर 1996 तक 08 बार उत्तर प्रदेश में विधानसभा के लिए चुने गए. एक बार 1982 से 87 तक विधान परिषद के सदस्य रहे. 1977 में जनता पार्टी की सरकार में वो पहली बार बार मंत्री बने. तब उन्हें कॉ-ऑपरेटिव और पशुपालन विभाग दिया गया. 1980 में लोकदल का अध्यक्ष पद संभाला. 1985-87 में उत्तर प्रदेश में जनता दल के अध्यक्ष रहे.1989 में मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. 1993-95 में सपा-बसपा गठबंधन में वो दूसरी बार मुख्यमंत्री बने. 2003 में तीसरी बार रालोद और कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने और करीब चार साल तक गद्दी पर रहे.
केंद्र की राजनीति में मुलायम सिंह यादव बरसों तक तीसरे मोर्चे के निर्विवाद नेता बने रहे. वो वामपंथियों की नजर में संघ और बीजेपी से लड़ने वाले सबसे बड़े नेता रहे. माना जाता था कि कभी तीसरे मोर्चे की सरकार बनी तो मुलायम सिंह प्रधानमंत्री होंगे. लेकिन 2008 में यूपी की सरकार बचाने के लिए उठाए गए उनके कदम से वो वामपंथियों की नजरों से उतर गए. उत्तर प्रदेश में बीजेपी को लोकसभा चुनाव में लगातार कमजोर करनें में उनकी अहम भूमिका रही. लेकिन 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी को डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाने की सलाह देकर उन्होंने गजब का राजनीतिक दांव चला था. इससे राष्ट्रपति के चुनाव में विपक्षी एकता ताश के पत्तों की तरह बिखर गई थी. वहीं जब 2019 के लोकसभा चुनाव में समूचा विपक्ष एकजुट होकर पीएम मोदी को हराने की कोशिश कर रह थी तब मुलायम सिंह यादव ने लोकसभा के आखिरी सत्र के आखिरी दिन मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद देकर सबको चौंका दिया था. अपने इसी तरह को चौंकाने वाले फैसलों के लिए मुलायम सिंह हमेशा याद किए जाएंगे.