एमसीडी चुनाव में मोदी फैक्टर, केजरीवाल का बढ़ता कद और आप के सामने बड़ा चैलेंज

नई दिल्ली: दिल्ली नगर निगम के चुनाव परिणाम सामने है। 134-104 के स्कोर के साथ बहुमत के आंकड़े के पार है। के लिए खुशी का पल है तो आम आदमी पार्टी के लिए चिंतन का भी पल है। 53 फीसदी वोट इनको दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिले थे। अभी जब दिल्ली नगर निगम के नतीजे आ चुके हैं तो साफ दिख रहा है कि आप को 11 परसेंट वोटों का नुकसान हो रहा है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी को 39 फीसदी वोट मिला है जो थोड़ा ज्यादा है। फिर भी भाजपा के लिए गम का दिन है क्योंकि 15 साल बाद विदाई हो रही है। एमसीडी चुनाव परिणाम से साबित कर दिया है कि दिल्ली से भी कांग्रेस साफ हो रही है और भविष्य में आप और भाजपा के बीच 50-50 वाला मुकाबला होगा। हालांकि लोकसभा का अंदाज और मिजाज अलग होता है, इसलिए 2024 में क्या असर होगा, कहना मुश्किल है।

2017 में जब तीनों नगर निगम अलग-अलग थे तब आम आदमी पार्टी को सिर्फ 48 सीटें मिली थीं। इस बार लोगों ने एमसीडी की छोटी सरकार की चाबी भी अरविंद केजरीवाल को थमा दी है। एग्जिट पोल के मुकाबले भाजपा ने शानदार फाइट दी। भाजपा के लिए सबसे बड़ी सीख है कि हर इलेक्शन नरेंद्र मोदी के नाम पर नहीं जीत सकते। पार्टी को चाहिए कि वो कोई चेहरा आगे रखे। अगर हम एमसीडी के चुनावों को सांसदों के परफॉरमेंस के आधार पर देखें तो पाएंगे कि मीनाक्षी लेखी, हंसराज हंस, रमेश विधूड़ी के इलाकों में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी है। अब अगर वोटर्स के सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइल को देखें तो मीनाक्षी लेखी के इलाके में भाजपा के वोटर्स ज्यादा थे। इस बार का इलेक्शन कई मायनों में भाजपा और आप दोनों को सीधा संदेश देने वाला है। सीलमपुर जैसे पिछड़े इलाके में आप का हारना और भाजपा का जीतना इस धारणा को खारिज करता है कि लाभार्थी होने के लालायित वोटरों का झुकाव अरविंद केजरीवाल की तरफ है। साथ ही अल्पसंख्यक वोटरों के ट्रेंड पर भी नजर रखनी होगी। आखिर वो किधर गए हैं। किसको छोड़ा है।

गौतम गंभीर की शानदार पॉलिटिकल बैटिंगआम आदमी पार्टी के मैनिफेस्टो में अरविंद केजरीवाल ने जो दस गारंटी गिनाई वो मुफ्त रेवड़ी संस्कृति का अगला संस्करण है। इसमें कूड़े के पहाड़ खत्म करने, कॉन्ट्रैक्ट वालों की नौकरी पक्की करने, पार्किंग और भ्रष्टाचार मिटाने के वादे शामिल हैं। इस पर भाजपा को 15 साल की सत्ता विरोधी लहर का भी सामना करना पड़ा। इस लिहाज से पार्टी का प्रदर्शन इतना खराब नहीं है जितना एग्जिट पोल्स में बताया गया था। भाजपा इस चुनाव में अपने एजेंडे पर डटी रही। पूर्वी दिल्ली में दंगे वाले इलाकों में पार्टी का प्रदर्शन ठीक रहा। बेरोजगारी का मुद्दा एक भावनात्मक मुद्दा है। हालांकि हाल ही में मोदी सरकार ने सरकारी वैकेंसी भरने के बाद जॉब मेले लगाकर इस मुद्दे को काटने की कोशिश की। एक बड़ा मुद्दा जेजे कालोनी का है। इनके पुनर्वास के लिए हाल ही में जिस तरीके के बहुमंजिला इमारत बनाए गए उससे भाजपा ने डैमेज कंट्रोल किया। लेकिन कोई चेहरा नहीं था जो अरविंद केजरीवाल या मनीष सिसोदिया के आगे प्रोजेक्ट किया हो।

गौतम गंभीर के इलाके में 22 वार्ड पर भाजपा जीती और सिर्फ 11 पर आम आदमी पार्टी। ये संयोग नहीं हो सकता। गंभीर हमेशा केजरीवाल सरकार को निशाने पर लेते रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिए वो यमुना की गंदगी और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर केजरीवाल सरकार को घेरते रहते हैं। इस लिहाज
का रहा। बाकियों के इलाके में भाजपा कमजोर रही। खुद भाजपा अध्यक्ष आदेश गुप्ता के इलाके में चारों सीटें भाजपा हार गई। कहीं न कहीं लोकल लेवल पर सांसदों का प्रदर्शन भी मायने रखता है। ये दोनों पार्टियों पर लागू होती है। मनीष सिसोदिया अपने पटपड़गंज इलाके में आप को बढ़त नहीं दिला पाए। वहीं, सत्येंद्र जैन के इलाके में रानीबाग, पश्चिम विहार और सरस्वती विहार में आप की हार हो गई। इसलिए नेताओं की छवि और उनके काम का असर किसी भी चुनाव में हो सकता है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। भाजपा को अब ये समझना होगा कि देश का हर चुनाव नरेंद्र मोदी के चेहरे पर नहीं जीता जा सकता। हैदराबाद नगर निगम हो या दिल्ली नगर निगम, पीएम का चेहरा तभी असरदार होगा जब लोकल मुद्दे उससे हल होंगे। अब ऐसा होता दिखता नहीं है। स्थानीय स्तर पर स्थानीय चेहरों को वोटर देखना पसंद करता है। इसीलिए नगर निकाय, विधानसभा और लोकसभा यानी त्रिस्तरीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक ही वोटर अलग-अलग मुद्दों पर वोट करने लगा है।

अब ये तय है कि मेयर आम आदमी पार्टी का होगा। पर रोचक ये है कि इस चुनाव में दल बदल कानून लागू नहीं होता। इसी बिना पर आदेश गुप्ता दावा कर रहे हैं कि मेयर भाजपा का होगा। दरअसल सात सांसद भी मेयर चुनाव में वोट करते हैं जो भाजपा के हैं। इसलिए भाजपा कोशिश करेगी पर 30 पार्षदों के अंतर को पाटना टेढी खीर है।

केजरीवाल के सामने चैलेंजकुछ भी पर केजरीवाल का कद बढ़ा है। राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के सामने कहां तक टिक सकते हैं, ये बता पाना मुश्किल है। लेकिन गुजरात में भी अच्छा खासा वोट शेयर लेने जा रही है। इस नजरिए से मोदी के सामने अरविंद केजरीवाल जरूर खड़े मिलते हैं। अब अगर नीतीश कुमार, लालू यादव, केसीआर, नवीन पटनायक से तुलना करें तो जरूर केजरीवाल ने पांव पसार दिया है। अब न सिर्फ आप राष्ट्रीय पार्टी बनने की तरफ अग्रसर है बल्कि अरविंद केजरीवाल भी एक राज्य से बाहर निकल कर राष्ट्रीय स्तर पर जाने की कोशिश करते दिख रहे हैं। हालांकि महागठबंधन में केजरीवाल के नाम पर सहमति बने, ये नामुमकिन लगता है। इसका बड़ा कारण ये है कि अरविंद केजरीवाल की मजबूरी अकेले चलने की है। पार्टी का वोट बैंक ये बर्दाश्त नहीं करेगा कि केजरीवाल कांग्रेस या किसी उस पार्टी के साथ चले जाएं जिसके साथ उनका वोटर जाना नहीं चाहता। इस लिहाज से एकला चलो की नीति के साथ ही केजरीवाल को आगे बढ़ना होगा और यूपी-बिहार, एमपी, राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में उनके सामने बड़ी चुनौती है।

केजरीवाल के सामने बड़ी चुनौती अपने वोट बैंक को बचाए रखने की है। वो बचते बचाते ही राजनीति करने वाले हैं। राष्ट्रवाद के मुद्दे पर या नरेंद्र मोदी पर सीधे अटैक करने से वो बचते रहेंगे। उनको पता है कि आप का वोटर ही लोकसभा में मोदी के लिए वोट करता है। इसलिए बीच का रास्ता जिस चतुराई से केजरीवाल ने निकाला है, मुझे लगता है वो उसी रास्ते पर चलेंगे। सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार के दाग को साफ कर
बनाए रहने की है। पर, उनका एक मंत्री जेल में है। अमानतुल्ला खान अवैध हथियार और कैश के साथ अरेस्ट हुए। भगवंत मान और केजरीवाल दोनों अपने कैबिनेट के मंत्रियों को भ्रष्टाचार के मामले में बर्खास्त कर चुके हैं।