मोदी 3.0 : विदेश नीति को लेकर भारत के सामने कौन सी हैं चुनौतियां, समझ लीजिए एक-एक बात

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने अपनी तीसरी पारी शुरू कर दी है। नई सरकार में विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी एक बार फिर से को सौंपी गई है। ऐसे में सवाल है कि नरेंद्र मोदी सरकार की तीसरी पारी में विदेश नीति कैसी हो सकती है? विदेश मंत्रालय में शीर्ष पर कोई बदलाव न होने से मोटे तौर पर निरंतरता का संकेत मिलता है। हालांकि, बदलती वैश्विक स्थिति और भारतीय रणनीतिक अनिवार्यताओं के आधार पर विशिष्ट क्षेत्रों के लिए एजेंडे में कुछ बदलाव और चीजें फिर से तय हो सकती हैं। ऐसे में अगले पांच साल भारतीय विदेश नीति के लिए चुनौतियों के साथ ही अवसर भी लेकर आएगा। नजर डालते हैं कि भारत के समक्ष विदेश मोर्चे पर क्या चुनौतियां आने वाली हैं।चीन की चुनौतीसीमा पर गतिरोध अपने पांचवें साल में प्रवेश करने वाला है। मोदी 3.0 के सामने कार्य कठिन और पेचीदा है। भारत ने कहा है कि जब तक सीमा पर स्थिति सामान्य नहीं हो जाती, तब तक सब कुछ ठीक नहीं हो सकता। नई दिल्ली पूरी तरह से पीछे हटना और फिर तनाव कम करना चाहता है। सीमा के दोनों ओर से 50,000-60,000 सैनिकों और हथियारों को हटाने में बहुत समय लगेगा। उच्च स्तरीय संपर्क, विशेष रूप से जुलाई के पहले सप्ताह में कजाकिस्तान में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ मोदी की बैठक, इस स्थिति को खोलने की संभावना को बढ़ा सकती है। पाकिस्तान के साथ संबंध2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ समेत सार्क देशों के नेताओं को आमंत्रित किया था। साल 2014 और 2015 में पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों में उतार-चढ़ाव आया, लेकिन 2016 में पठानकोट और उरी में हुए आतंकवादी हमलों के बाद यह संबंध और भी खराब हो गए। 2019 में पुलवामा हमले और बालाकोट में अटैक के बाद पाकिस्तान के साथ संबंधों को एक गंभीर झटका लगा। अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म किया गया। इस वजह से दोनों देशों के राजनयिक संबंधों में गिरावट आई। तब से पाकिस्तान में स्थिति बदल गई है। 2019 में प्रधानमंत्री रहे इमरान खान जेल में हैं। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है। अब नवाज शरीफ जिन्हें अब सेना का समर्थन प्राप्त है, सत्ता में वापस आ गए हैं। नवाज उनके भाई, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने शांति का संदेश दिया है। यह कह चुके हैं कि पाक समर्थित आतंकवाद का मुकाबला करना भारत की प्राथमिकता है। पिछले नौ वर्षों से नई दिल्ली की नीति यही रही है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। पिछले कुछ दिनों में जम्मू-कश्मीर में हुए सिलसिलेवार आतंकी हमलों ने संभावित बातचीत के पक्ष में जनमत के निर्माण की संभावना को खत्म कर दिया है। नेपाल की नाजुक चुनौती नेपाल के साथ संबंध एक नाजुक चुनौती पेश करते हैं। नेपाल में चीन की मजबूत राजनीतिक पकड़ है। काठमांडू की सरकार जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं, माना जाता है कि वह नई दिल्ली के खिलाफ बीजिंग कार्ड का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है। नेपाल की एकतरफा रूप से फिर से बनाई गई सीमाओं को राष्ट्रीय मुद्रा पर रखने का निर्णय बताता है कि यह जारी रहेगा। नई दिल्ली को नेपाली लोगों का विश्वास फिर से हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी, जिसे 2015 की आर्थिक नाकेबंदी के बाद झटका लगा था।मालदीव से बातचीत की तैयारीपीएम मोदी के शपथग्रहण समारोह में राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू मौजूद थे। उनकी यह यात्रा विशेष रूप से महत्वपूर्ण थी। मुइज्जू सरकार के अनुरोध पर भारत की तरफ से मालदीव में भारतीय वायु सेना के सैन्य कर्मियों को हटाकर प्रशिक्षित तकनीकी कर्मियों को नियुक्त करने के बाद, नई दिल्ली और मालदीव बातचीत के लिए तैयार दिखाई दिए। अफगानिस्तान से राजनयिक संबंध नहींअगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से काबुल के साथ कोई राजनयिक संबंध नहीं है। मानवीय सहायता में मदद करने के लिए नियुक्त एक तकनीकी टीम के माध्यम से निम्न-स्तरीय जुड़ाव है, लेकिन अभी उच्च-स्तरीय जुड़ाव से इनकार किया गया है। कामकाजी संबंध जारी रहने की संभावना है।म्यांमार पर रहेगी नजर पीएम मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में म्यांमार को न्योता नहीं दिया है। फिलहात भारत की चुनौती जुंटा सरकार से जुड़ने की रही है जो आंतरिक रूप से सशस्त्र प्रतिरोध में व्यस्त रही है। अक्टूबर 2023 में लड़ाई शुरू होने के बाद से म्यांमार की सरकारी सेना रक्षात्मक मुद्रा में है। भारतीय रणनीतिक हलकों में यह सुझाव दिया गया है कि सरकार के गिरने की संभावना को देखते हुए, नई दिल्ली को विपक्षी समूहों से जुड़ना शुरू कर देना चाहिए।बांग्लादेश के साथ साझा उद्देश्य घुसपैठियों के बारे में चुनावी बयानबाजी ने अक्सर ढाका के साथ संबंधों को खराब किया है। मोदी 3.0 के दौरान सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्यों द्वारा अधिक संयम बरतना फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि दोनों पक्षों का चरमपंथ, कट्टरपंथ और आतंकवाद का मुकाबला करने का एक ही उद्देश्य है। भूटान: बेहतर संबंध जारी रहने की उम्मीद भारत थिम्पू को उसकी पंचवर्षीय योजना, वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज और गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी परियोजना में सहायता देने के लिए तैयार है। ऐसा जारी रहने की उम्मीद है, खासकर तब जब चीन अपनी शर्तों पर भूटान के साथ सीमा पर बातचीत करने की कोशिश कर रहा है। भारत चाहता है कि भूटान, जो दो एशियाई दिग्गजों के बीच फंसा हुआ है, उसके पक्ष में हो। श्रीलंका: अर्थव्यवस्था मजबूत करने पर जोर श्रीलंका के आर्थिक संकट से निपटने में मदद करने के बाद भारत ने श्रीलंका की सड़कों पर जो सद्भावना अर्जित की थी, वह तमिलनाडु में चुनाव से पहले कच्चातीवु मुद्दे को बेवजह उछालने से खतरे में पड़ गई। इस साल के अंत में होने वाले चुनावों से पहले वित्तीय सहायता के साथ-साथ निवेश के जरिए श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करना एक अहम काम होगा। पश्चिमी देश: जुड़ाव रहेगा जारीमोदी सरकार का पश्चिम के साथ जुड़ाव पिछली कई सरकारों की तुलना में अधिक लेन-देन वाला रहा है। इसने अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध भी विकसित किए हैं। पश्चिमी मीडिया में सरकार की आलोचना से उकसावे के तौर पर अभियान के दौरान पश्चिमी ‘हस्तक्षेप’ के बारे में बहुत शोर मचा था। आक्रामक भारतीय प्रतिक्रिया ने दिखाया कि सरकार, सत्ता में एक दशक के बाद भी, पश्चिम में टिप्पणियों के प्रति बेहद संवेदनशील है। साथ ही कभी-कभी पश्चिमी सरकारों की हल्की टिप्पणियों के प्रति भी। चुनाव के मौसम में अमेरिका और जर्मनी जैसी मित्रवत पश्चिमी सरकारों के खिलाफ डेमार्के जारी किए गए। अमेरिका के साथ भारत के संबंधों को दोनों दलों का समर्थन प्राप्त है। नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों से इस पर कोई असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। रक्षा और अत्याधुनिक तकनीक ही आगे चलकर संबंधों को आगे बढ़ाएगी। फ्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों के साथ आर्थिक और राजनीतिक संबंधों में सुधार हुआ है। ब्रिटेन भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) करने के लिए उत्सुक है। भारत और यूरोपीय संघ भी अपनी अर्थव्यवस्थाओं के पारस्परिक लाभ के लिए FTA करने के इच्छुक हैं। कनाडा के साथ राजनीतिक संबंधप्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो द्वारा भारत पर एक और खालिस्तानी अलगाववादी की हत्या में हाथ होने का आरोप लगाने के बाद से ही लगातार गिर रहे हैं। इसके कम से कम 2025 के कनाडाई चुनावों तक तनावपूर्ण बने रहने की संभावना है। हालांकि, आर्थिक संबंधों और कनाडा में छात्रों के प्रवाह पर कोई असर नहीं पड़ा है। पश्चिमी देश चाहेंगे कि मोदी 3.0 आलोचना और टिप्पणियों के प्रति कम संवेदनशील हों। उनके साथ जुड़ने और व्यापार करने के लिए तैयार हों। नई दिल्ली के दृष्टिकोण से, आदर्श परिदृश्य यह होगा कि भारतीय हितों को सुरक्षित रखा जाए। पश्चिमी पूंजी और टेक्नोलॉजी का फायदा उठाया जाए, जबकि उसे अपने घरेलू मामलों पर व्याख्यान नहीं दिया जाए। इटली में जी7 में प्रधानमंत्री की भागीदारी इस दिशा में कदम उठाने का संकेत दे सकती है। रूस : यूक्रेन युद्ध बना परीक्षारूस के साथ भारत के संबंधों की परीक्षा यूक्रेन में चल रहे युद्ध के कारण हो रही है। रक्षा संबंधी जरूरतें भारत की रूस पर निर्भरता का मुख्य कारण हैं। साथ ही सस्ते तेल की उपलब्धता ने अब ऊर्जा को भी इसमें शामिल कर दिया है। रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के सामने नहीं झुका है। अब उसे व्यापक रूप से युद्ध में बढ़त हासिल है। भारत के स्विटजरलैंड में 15-16 जून को होने वाले उच्चतम स्तर के शांति सम्मेलन में भाग न लेने की संभावना है। इसकी वजह है कि रूस उसमें नहीं होगा। हालांकि, भारत से आधिकारिक स्तर पर प्रतिनिधित्व करने और संवाद और कूटनीति पर जोर देने की उम्मीद है। शांति के लिए, रूस और यूक्रेन दोनों को बातचीत की मेज पर आना चाहिए। जबकि मोदी 3.0 इस प्रक्रिया में योगदान देना चाहेगा, वह खुद को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा। पश्चिम एशिया : बहुत कुछ दांव परपश्चिम एशिया में बहुत कुछ दांव पर लगा है। मोदी 1.0 और मोदी 2.0 ने सऊदी अरब से लेकर इजरायल, यूएई से लेकर ईरान, कतर से लेकर मिस्र तक के देशों और नेताओं के साथ संबंध बनाए हैं। ऊर्जा सुरक्षा, निवेश और इस क्षेत्र में 9 करोड़ की संख्या में भारतीय प्रवासी भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण रहे हैं। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी), आई2यू2, अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण पारगमन गलियारा (आईएनएसटीसी) सभी को गेम चेंजर माना जाता है, लेकिन इजरायल-हमास संघर्ष ने अनिश्चितता पैदा कर दी है। भारत गाजा में युद्ध का अंत देखना चाहेगा।