‘इंडिया’का गेम बिगाड़ देंगी माया! यूपी में हाथी की ‘सीधी’ चाल का गुणा-गणित जानिए

मेरठ : सुप्रीमो ने अपने बर्थ डे पर इंडिया गठबंधन को बड़ा सरप्राइज दिया। इंडिया गठबंधन में शामिल होने के अटकलों पर विराम लगाते हुए उन्होंने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर दिया। कांग्रेस के यूपी प्रभारी ने बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) से चुनावी तालमेल को हवा दी थी। बसपा प्रमुख ने को भी खरी-खोटी सुनाते हुए सपा के फ्रेंडली फाइट के मंसूबे पर भी पानी फेर दिया। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं, इनसे बचकर रहना चाहिए। मायावती ने कहा कि विरोधी दल उनके संन्यास की अफवाह फैला रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह अभी संन्यास लेने वाली नहीं हैं। वह अंतिम समय तक पार्टी के लिए काम करती रहेंगी। बीएसपी चीफ के ऐलान के बाद तय हो गया है कि उत्तर प्रदेश में 2024 का लोकसभा चुनाव त्रिकोणीय होगा। बीजेपी, बीएसपी और सपा-रालोद-कांग्रेस के गठबंधन के बीच यूपी में फाइनल मुकाबला होगा। मायावती के फैसले से नेताओं ने राहत की सांस ली होगी, क्योंकि 80 लोकसभा सीटों पर वन-टु-वन फाइट के मंसूबे भी ध्वस्त हो गए हैं। 80 लोकसभा सीटों पर अब नहीं होगी वन टु वन फाइट2024 में बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए नीतीश कुमार ने सभी लोकसभा सीटों पर वन-टु-वन फाइट का फॉर्मूला दिया था। इंडिया गठबंधन भी इस फॉर्मूले पर राजी था। विपक्षी दलों को कोशिश है कि 2024 में बीजेपी के सामने विपक्ष की ओर से सिर्फ एक उम्मीदवार हो। 1977 के लोकसभा चुनाव में तब के विपक्षी दलों ने जनता पार्टी इसी फॉर्मूले पर बनाई थी। तब जनता पार्टी ने ताकतवर इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी को हराकर केंद्र की सत्ता हासिल की थी। इंडिया गठबंधन में भी सभी विपक्षी दल एक छतरी के नीचे इकट्ठा हुए। विपक्षी दलों को नरेंद्र मोदी के खिलाफ बड़ी जीत के लिए 80 लोकसभा सीटों वाले में ज्यादा से ज्यादा सहयोगियों की दरकार थी। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच समझौते की राय बनी। दलों ने बीएसपी प्रमुख मायावती को भी गठबंधन में शामिल करने की कोशिश की, मगर वह नहीं मानी। कुछ दिन पहले बीएसपी सांसद मलूक नागर ने गठबंधन में शामिल होने के लिए मायावती को पीएम कैंडिडेट बनाने की शर्त रख दी। इससे बसपा के इंडिया गठबंधन में शामिल होने की अफवाह को हवा मिल गई। मगर अपने जन्मदिन पर मायावती ने लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर सपा-कांग्रेस गठबंधन को तगड़ा झटका दे दिया।उत्तर प्रदेश में 2019 के चुनाव परिणाम पार्टीकुल सीटवोट प्रतिशत नुकसान/फायदासीटों का परिवर्तनबीजेपी 6249.987.359 सीटों का नुकसानसपा519.43-4.24कोई अंतर नहीं बीएसपी1018.11-0.3410 सीटों का फायदाकांग्रेस16.36-1.171 सीट का नुकसान2019 में बीजेपी का वोटर शेयर बढ़ा था, मगर सीटों का हुआ था नुकसान 2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी और सपा गठबंधन ने बीजेपी को झटका दिया था। दोनों दलों ने मिलकर बीजेपी से 9 सीटें छीन ली थीं। 2014 में 71 सीट जीतने वाली बीजेपी को 2019 में 62 सीटें मिली थीं। पिछले चुनाव में वोट शेयर का खेल भी जबर्दस्त रहा। 2014 के मुकाबले बीजेपी को 2019 में 7.35 फीसदी वोट ज्यादा मिले थे, मगर उसकी सीटों की संख्या कम हो गई। समाजवादी पार्टी का वोट 4.4 फीसदी कम हुआ था और बीएसपी को .34 प्रतिशत वोट का मामूली नुकसान हुआ। सीटों का फायदा बीएसपी को ज्यादा हुआ। बीएसपी को 10 और समाजवादी पार्टी को 5 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। तब अखिलेश यादव का बयान आया कि सपा के वोट तो बीएसपी को ट्रांसफर हुए मगर बीएसपी के वोटर बीजेपी की तरफ चले गए। बीएसपी अपने वोटरों को गठबंधन के पक्ष में नहीं ला सकीं। अकेले चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस को कुल 6.36 फीसदी वोट मिले थे, मगर वह सिर्फ एक सीट रायबरेली में ही जीत हासिल कर सकी थी। कांग्रेस के वोट प्रतिशत में 1.17 फीसदी की गिरावट आई थी। 2024 के बिसात पर विपक्ष की बाजी पलटी हुई नजर आ रही है। 2017 के बाद से दूसरी बार कांग्रेस और सपा एक बार फिर साथ-साथ है और मायावती अकेली हैं। गैर जाटव वोट बीजेपी के साथ, बुंदेलखंड और वेस्टर्न यूपी में भाजपा को फायदासवाल यह है कि बीएसपी के फैसले से किसे नुकसान होगा? बीजेपी या विपक्षी गठबंधन को। बीजेपी इस चुनाव में 70 प्लस सीटों का लक्ष्य लेकर चल रही है। महागठबंधन की ओर से समाजवादी पार्टी 65 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी है। राष्ट्रीय लोकदल और कांग्रेस के खाते में कितनी सीटें आएंगी, यह तय नहीं है। पिछले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने वेस्टर्न यूपी की चार सीटों बिजनौर, नगीना, सहारनपुर और अमरोहा में जीत हासिल की थी। पार्टी ने पूर्वांचल की छह सीटों गाजीपुर, श्रावस्ती, घोसी, जौनपुर, लालगंज और आंबेडकर नगर पर कब्जा किया था। यूपी विधानसभा चुनाव में बीएसपी इन सभी इलाकों में हार गई। विधानसभा चुनाव में बीएसपी को सिर्फ 13 फीसदी वोट मिले थे। विश्लेषण में यह सामने आया कि एक दशक पहले तक बीएसपी के कोर वोटर माने जाने वाले दलितों का एकमुश्त वोट बीएसपी को नहीं मिला। यूपी के 22 फीसदी दलित वोटरों का एक तबका बीजेपी की ओर चला गया। गैर जाटव वोटर ही बीजेपी की ओर शिफ्ट हो गए। यूपी में 12 फीसदी जाटव और 10 वोटर गैर जाटव दलित वोटर हैं। गैर जाटव वोटरों के सपोर्ट के कारण बुंदेलखंड की सभी 4 सीटों पर जीत हासिल की थी। वेस्टर्न यूपी की 29 में 23 सीटों की जीत में जाट और दलित वोटरों की जुगलबंदी बीजेपी को रास आई। 2024 में त्रिकोणीय मुकाबले में बीएसपी के कोर वोट बैंक यानी दलित वोटर किधर जाएंगे। बीजेपी के अलावा समाजवादी पार्टी की नजर भी दलित वोटरों पर लगी है। बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिये दलितों को लुभाने का कवायद कर रखी है। पिछले लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के अनुसार, अगर बीएसपी, सपा और कांग्रेस साथ होते तो करीब 44 फीसदी वोटरों एकजुट होते और मुकाबला दोतरफा होता। मगर सपा और कांग्रेस के एकसाथ होने से करीब 26 फीसदी वोट गोलबंद होगा, जो बीजेपी के 49 फीसदी के मुकाबले के लिए काफी कम है। यूपी की सवर्ण जातियां बीजेपी की ओर मानी जाती हैं। राम मंदिर के प्रभाव के कारण ओबीसी वोटर का पलड़ा भाजपा की ओर झुकने का अनुमान है। 18 फीसदी वाले बहुजन समाज पार्टी अगर चुनाव में उतरेगी तो विपक्ष का वोट बांटेगी, जिसका फायदा भाजपा को मिल सकता है।