उमेश पाल मर्डर केस : कितना बदल गया है मायावती की सियासत का तरीका

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय उमेश पाल मर्डर केस सुर्खियों में है। बेहतर कानून व्यवस्था और बुलडोजर मॉडल की चर्चा के जरिए सत्ता में आने वाली योगी आदित्यनाथ सरकार के समक्ष दिनदहाड़े वकील उमेश पाल की हत्या ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल सरकार की माफिया और अपराधियों के खिलाफ नीति की साख पर लगा है। असर साफ दिख रहा है। विधानसभा में मामले पर चर्चा करते समय सीएम योगी आदित्यनाथ का आक्रोश इसका परिणाम है।

घटना में शामिल अपराधियों को मिट्‌टी में मिला देंगे का दावा, सीएम योगी भरे सदन में करते हैं। समाजवादी पार्टी लगातार हमलावर है। घटनाक्रम को लेकर आरोप सीधे तौर पर अतीक अहमद पर लग रहे हैं। माफिया अतीक अहमद पर बहुजन समाज पार्टी के विधायक राजू पाल की हत्या का आरोप लगा था। इसके बाद से वे बसपा के निशाने पर थे। हालांकि, अब बसपा प्रमुख मायावती अतीक अहमद की पत्नी शाइस्ता परवीन और बेटे का बचाव करने में लगी है। एक समय था जब मायावती को कड़े प्रशासक के रूप में जाना गया था। पुलिस बुलवाकर उन्होंने सांसदों को गिरफ्तार कराया था। लेकिन, आज उमेश पाल की हत्या में नामजद अतीक अहमद के बेटे और पत्नी को पार्टी से बाहर निकालने के लिए वे गुनाह साबित होने की बात कर रही हैं। उनकी इस नीति ने सवाल खड़े कर दिए हैं। इन बयानों के बीच छिपी राजनीति को तलाशा जाना शुरू कर दिया गया है।

प्रयागराज में वकील उमेश पाल की हत्या के बाद समाजवादी पार्टी लगातार हमलावर है। योगी सरकार को निशाने पर रखे हुए है। हत्या के आरोपियों को लेकर सवाल किए जा रहे हैं। वहीं, प्रदेश की कानून व्यवस्था को भी ध्वस्त बताया जा रहा है। अखिलेश यादव से लेकर शिवपाल यादव तक प्रदेश की भाजपा सरकार को घेर रहे हैं। योगी सरकार गठन के बाद उत्तर प्रदेश के माफियाओं के खिलाफ बड़ी कार्रवाई हुई। इसमें निशाने पर बाहुबली मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद लगातार रहे हैं। मुख्तार अंसारी के बाद उनके बेटे अब्बास अंसारी भी मनी लांड्रिंग केस में जेल में बंद हैं। पिछले दिनों चित्रकूट जेल मामले के बाद अब्बास अंसारी की पत्नी निकहत अंसारी को भी जेल जाना पड़ा है।

दूसरी तरफ, योगी सरकार ने लगातार अतीक अहमद की संपत्तियों को कुर्क करने का सिलसिला जारी रखा हुआ है। लगातार कार्रवाई के बावजूद अतीक अहमद पर जिस प्रकार से उमेश पाल की हत्या का आरोप लगा है, उसने विपक्ष को हमले का एक मौका तो जरूर दे दिया है।मायावती के ऐक्शन को किया जा रहा यादसवाल बसपा प्रमुख मायावती पर भी उठ रहे हैं। दरअसल, राजू पाल बसपा विधायक थे। जब उनकी हत्या हुई हत्या का आरोप अतीक अहमद पर लगा, तो वे भी उनके खिलाफ खड़ी थीं। अब अतीक अहमद की पत्नी और बेटे के पक्ष में खड़ी दिख रही हैं। इसको लेकर उनके पुराने रूप को याद किया जा रहा है। विधानसभा में भी उनकी पार्टी के विधायक इस बात को रखते नजर आए थे।

दरअसल, मायावती ने अपनी पार्टी के नेताओं को ही गिरफ्तार कराया था। बात वर्ष 2007 की है। मछली शहर से पार्टी के तत्कालीन सांसद उमाकांत यादव को मायावती ने अपने सरकारी आवास 5, कालिदास मार्ग पर बुलाकर गिरफ्तार करा दिया था। तत्कालीन सांसद पर आजमगढ़ में एक महिला की जमीन हड़पने का आरोप था। फरार चल रहे थे। मायावती ने उन्हें अपने सरकारी आवास पर बुलवाया। आवास के बाहर पहले से खड़ी पुलिस से उन्हें गिरफ्तार करवा दिया। इसके बाद उमाकांत यादव को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा था।मायावती का एक और किस्सा मशहूर है।

सीएम रहते उन्होंने 10 जून 2008 को पूर्व मत्स्य पालन राज्यमंत्री जमुना प्रसाद निषाद को लखनऊ से गिरफ्तार करवाया था। महाराजगंज जिले में थाने में बवाल करने और एक सिपाही की हत्या का आरोप लगने के बाद उन्हें मंत्रिमंडल से हटाया गया। दरअसल, जमुना निषाद गोरखपुर की पिपराइच सीट से विधायक थे। उन पर आरोप था कि वह महाराजगंज कोतवाली में एक शिकायत लेकर गए थे। हथियारबंद समर्थक साथ में थे। पुलिसकर्मियों के साथ किसी बात पर कहा-सुनी हुई और कोतवाली में उनके समर्थकों ने फायरिंग शुरू कर दी। इसमें एक कांस्टेबल की मौत हो गई। घटना के बाद मंत्री और उनके समर्थकों के खिलाफ केस दर्ज किया गया था।

उमेश पाल की हत्या का क्या है पूरा मामला?

उमेश पाल की हत्या के मामले को समझने के लिए 19 साल पहले की उस घटना को जानना जरूरी है। दरअसल, वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में फूलपुर लोकसभा सीट से अतीक अहमद ने सपा के टिकट पर जीत हासिल की। उस समय अतीक अहमद इलाहाबाद पश्चिम सीट से विधायक थे। सांसद बनने के बाद यह सीट खाली हुई। उन्होंने छोटे भाई अशरफ को यहां से उम्मीदवार बना दिया। बसपा ने उनके खिलाफ राजू पाल को उम्मीदवार बनाया। उप चुनाव में राजू पाल में अशरफ अहमद को हरा दिया। इसके बाद अतीक अहमद खेमा बेचैन हो गया। विधायक बनने के बाद राजू ने पूजा पाल से शादी कर ली। 25 जनवरी 2005 को राजू पाल की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस हत्याकांड में दो अन्य देवी पाल और संदीप यादव भी मारे गए। हत्याकांड ने यूपी की राजनीति गरमा दी।पूजा पाल ने सांसद अतीक अहमद और अशरफ को राजू पाल मर्डर केस में नामजद अभियुक्त बनाया। मामले की जांच शुरू हुई।

सपा सांसद अतीक अहमद और उनके भाई समेत 11 लोगों के खिलाफ पुलिस ने चार्जशीट दायर किए। इस हाईप्रोफाइल मर्डर केस में राजू पाल की पत्नी पूजा पाल का चचेरा भाई उमेश पाल चश्मदीद गवाह था। केस की छानबीन आगे बढ़ने के बाद उमेश पाल को धमकी मिलने लगी। 2006 में उमेश पाल को अगवा कर बंधक बनाने का आरोप लगाया गया। इसके बाद उमेश पाल ने कोर्ट में जाकर राजू पाल हत्याकांड में अतीक अहमद के पक्ष में गवाही दी। इस कारण पूजा पाल काफी नाराज हुई थी।अतीक अहमद के चंगुल से मुक्त होने के बाद उमेश पाल ने उसके खिलाफ थाने में केस दर्ज कराया और अगवा कर जबरन अपने का पक्ष में गवाही का आरोप लगाया। 12 दिसंबर 2008 को मामले की छानबीन से नाराज राजू पाल परिवार ने सरकार के समक्ष गुहार लगाई। जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी गई।

10 जनवरी 2009 को सीबीसीआईडी ने पांच आरोपियों के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दायर किया। इसमें मुस्तकिल मुस्लिम उर्फ गुड्डू, गुल हसन, दिनेश पासी और नफीस कालिया को आरोपी बनाया गया। सीबी-सीआईडी की जांच से राजू पाल का परिवार खुश नहीं था। उन्होंने 22 जनवरी 2016 को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सीबीआई जांच की मांग की।सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया। सीबीआई जांच की बात सामने आने के बाद उमेश पाल ने पूजा पाल के घर जाकर उससे माफी मांगी और सहयोग करने की बात कही। पक्ष में गवाही देने की बात कही। 20 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने राजू पाल हत्याकांड में नए सिरे से केस दर्ज किया। मामले की जांच शुरू हुई। 3 साल की जांच के बाद सभी आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई।

1 अक्टूबर 2022 को राजू पाल हत्याकांड की सुनवाई करते हुए सीबीआई की स्पेशल जज कविता मिश्रा ने 6 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए। इसमें पूर्व सांसद अतीक अहमद के भाई पूर्व विधायक अशरफ और अन्य लोग शामिल थे। राजू पाल हत्याकांड में उमेश यादव की गवाही पर ही बाहुबली अतीक अहमद समेत सभी आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई थी। 24 फरवरी 2023 को उनकी हत्या कर दी गई।क्या है मायावती की रणनीति?यूपी की राजनीति में मायावती इन दिनों अलग रणनीति पर काम करती दिख रही हैं। समाजवादी पार्टी पर लगातार अल्पसंख्यक समाज के नेताओं को नजरअंदाज करने का आरोप लग रहा है। आजम खान से लेकर अन्य तमाम पार्टी नेताओं, विधायकों पर सरकार या जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बाद समाजवादी पार्टी या अखिलेश यादव की ओर से कोई बड़ा विरोध नहीं हुआ। मायावती इस मामले को अलग रूप में पेश कर रही हैं।

दरअसल, यूपी चुनाव 2022 में मुस्लिम वोट बैंक एकमुश्त समाजवादी पार्टी की तरफ गया और बहुजन समाज पार्टी को इससे करारा झटका लगा। बसपा की राजनीति हमेशा दलित- मुस्लिम गठजोड़ की रही है। मुस्लिम वोट बैंक छिटकने के बाद पार्टी की पकड़ प्रदेश की राजनीति में कमजोर होती जा रही है। इसको देखते हुए अतीक अहमद की पत्नी और बेटे के बचाव में खड़ी रहकर वह एक बड़े वर्ग को संदेश देने की कोशिश कर रही हैं। इमरान मसूद को साधकर उन्होंने पहले ही इस वर्ग में सेंधमारी की कोशिश शुरू की थी। सपा के माय (मुस्लिम-यादव) समीकरण को तोड़ने की कोशिश के रूप में मायावती के इस प्रयास को देखा जा रहा है।