लोकसभा रिजल्ट ने बिहार में बदली राजनीति की बयार तो मोदी ने चल दिया बड़ा दांव, तेजस्वी का क्या होगा?

नई दिल्ली: लोकसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद बिहार में नई राजनीतिक गतिशीलता उभर रही है। मोदी 3.0 कैबिनेट में बिहार से सात सांसदों को जगह मिली है, जिनमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तीन और सहयोगी दलों के चार लोग शामिल हैं। इनमें उजियारपुर से नित्यानंद राय और बेगूसराय से गिरिराज सिंह शामिल हैं। मौजूदा कैबिनेट में अन्य सदस्य नए चेहरे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी और दिवंगत रामविलास पासवान के बेटे को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। डॉ. मुजफ्फरपुर से मल्लाह समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं, सामाजिक न्याय के मसीहा और दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के बेटे भी मंत्रिमंडल में शामिल हुए हैं।बिहार में तेजस्वी को फांसने जाल बिछा रही है भाजपाएनडीए सहयोगियों को केंद्र सरकार में शामिल करने से पता चलता है कि भाजपा आगामी बिहार विधानसभा चुनावों के लिए राजनीतिक लामबंदी पर फोकस कर रही है। आरजेडी और उसके नेता को घेरने के लिए उसकी एक प्रमुख रणनीति अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) और दलित वोटों को अपने फोल्ड में रखना है। बिहार सरकार के जाति सर्वेक्षण के बाद ईबीसी वोटों का महत्व बढ़ गया है क्योंकि सर्वेक्षण में पता चला है कि राज्य की आबादी का 63% हिस्सा ओबीसी हैं। ईबीसी इसकी वर्ग का हिस्सा हैं। दलितों और आदिवासियों को जोड़ने पर आंकड़ा 85% तक पहुंच जाता है। इससे 85 बनाम 15 यानी पिछड़ा बनाम अगड़ा का नैरेटिव पुष्ट होता है जो 1980 के दशक से बिहार की जाति राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू रहा है।बिहार में बन रहा नया-नया खेमामंडल के बाद की राजनीति में पिछड़ी जाति के पॉलिटिक्स का महत्व बढ़ा है। लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने गैर-यादव ओबीसी, खासकर कुशवाहा समुदाय पर दांव लगाया। उन्होंने लोकसभा चुनाव में MY BAAP (मुस्लिम यादव, बहुजन, आदिवासी, आधी आबादी-महिला, पिछड़ा) का फॉर्म्युला दिया। चुनाव में तेजस्वी के राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) का गठबंधन था। सहनी निषाद समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें नदी से जुड़े व्यवसायों में शामिल लगभग 22 जातियां शामिल हैं। मुजफ्फरपुर से भाजपा सांसद राज भूषण चौधरी मूल रूप से सहनी की वीआईपी के सदस्य थे जो 2019 का लोकसभा चुनाव हार गए थे। बिहार के चुनावी पटल पर सहनी का उदय बताता है कि निषाद समुदाय के भीतर नए नेताओं के लिए अवसर है। सहनी ने कहा, ‘हम वोट देकर दूसरों को नेता बना रहे हैं, अब हम अपने लोगों को नेता बनाएंगे और अपने वोट की ताकत बढ़ाएंगे।’ईबीसी जातियों का नया नेता कौन?कई ईबीसी जातियों के लिए नेतृत्व एक निरंतर चुनौती रही है, जिसके कारण उत्तर प्रदेश और बिहार में छोटी जाति-आधारित पार्टियां बनी हैं। भाजपा ने हिंदुत्व की राजनीति के प्रतीकों का लाभ उठाकर कई ईबीसी समुदायों के वोट बैंक में बड़ी हिस्सेदारी हासिल की है। हालांकि, जाति जनगणना से अगड़ा बनाम पिछड़ा के नैरेटिव ने बिहार में राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन के पास ईबीसी वोट की वापसी संभव दिख रही है।नीतीश ने की ईबीसी पॉलिटिक्स की शुरुआत ने कल्याणकारी योजनाओं और विकासपरक नीतियों से ईबीसी वोटों पर अपना प्रभाव बनाए रखा है। हालांकि, उनके अस्थिर गठबंधन और घटती व्यक्तिगत अपील ने संदेह जरूर पैदा कर दिया है कि क्या भविष्य में भी उनकी पकड़ मजबूत रहेगी। जेडीयू की मौजूदगी के बावजूद इसके कम वोट शेयर से पता चलता है कि 2025 के विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार की व्यक्तिगत लोकप्रियता को कड़ी जांच का सामना करना पड़ेगा।2025 विधानसभा चुनावों में क्या होगा?मोदी सरकार में ईबीसी और दलित नेताओं को शामिल करना 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर उठाया गया एक रणनीतिक कदम है। इन समुदायों के नेताओं को केंद्रीय मंत्री बनाकर भाजपा आगामी राज्य चुनावों के लिए मंच तैयार कर रही है। भाजपा बिहार में तेजस्वी यादव के खिलाफ चिराग पासवान को भी एक दावेदार के रूप में पेश कर सकती है। चिराग एक प्रगतिशील युवा नेता के रूप में देखे जाते हैं। पासवान समुदाय के भीतर उनकी अपील और उनका व्यापक सपोर्ट बेस तेजस्वी यादव की बढ़ती लोकप्रियता के लिए खतरा हो सकता है। तेजस्वी यादवों के नेता के रूप में अपनी छवि नहीं बनने देना चाहते। इसके लिए उन्होंने माई-बाप का फॉर्म्युला गढ़ा। लोकसभा चुनाव के नतीजों से स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि बिहार नए नेतृत्व का इंतजार कर रहा है। आगामी 2025 के विधानसभा चुनाव इस मायने में काफी दिलचस्प होगा कि क्या कोई नेता यह इंतजार पूरा कर पाएगा।