चतुरानंद मिश्र की चतुराई के किस्से जानकर कहेंगे ‘बाबा रे बाबा…’, आप तो बुजुर्गों-किसानों के हैं ‘भगवान’

पटना: बिहार में जहरीली शराब से मौत को लेकर आज सियासत तेज है। राज्य की राजनीति में शराबबंदी का मुद्दा आजादी के पहले से ही हावी रहा है। प्रख्यात वामपंथी चतुरानन मिश्र ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के साथ ही सामाजिक सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया। वे भी बिहार में शराबबंदी के पक्षधर थे। बिहार में मधुबनी के नाहर गांव में जन्मे चतुरानंद मिश्र ने बचपन में ही अपने गांव में शराब पीने से कई लोगों के घर-परिवार को बिखरते देखा था। यही कारण है कि 1925 में जन्मे चतुरानन मिश्र ने युवावस्था में स्वतंत्रता की लड़ाई में हिस्सा लेने के साथ ही शराब पर अंकुश लगाने की मांग की थी। हालांकि उस वक्त देश की आजादी की लड़ाई का मसला प्रमुख था और इस आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लेने के कारण उन्हें अपने गांव-घर को छोड़ कर नेपाल में शरण लेना पड़ा। बाद में अंग्रेजों की पकड़ में आ गए और उन्हें दरभंगा जेल में महीनों रहना पड़ा। आजादी के बाद चतुरानन मिश्र हजारीबाग आ गए और कोयला मजदूरों के शोषण के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की। इस दौरान उन्होंने लोगों से शराब नहीं पीने और महाजनी प्रथा के खिलाफ भी आवाज बुलंद की।

1969 में पहली बार विधायक बनने पर वृद्धापेंशन योजना का प्रस्ताव रखा

चतुरानन मिश्र बिहार में 1969 में पहली बार विधायक बनने के बाद वृद्धापेंशन योजना की शुरुआत का प्रस्ताव रखा, बाद में ये व्यवस्था देश के अन्य राज्यों में भी शुरू हुई। वहीं 1996 में जब वे केंद्र में कृषि मंत्री बने, तो पहली बार देश में राष्ट्रीय कृषि फसल योजना की शुरुआत की गई। चतुरानन मिश्र की गिनती देश के अग्रणी वापमंथी नेताओं में होती रही। वे 1969 से 1980 के बाद तीन विधायक, 1984 और 1990 में राज्यसभा सदस्य और 1996 में लोकसभा सदस्य रहे।

बिहार के ‘लेनिन’ नाम से चर्चित चतुरानन ने कई की बदली तकदीर

गिरिडीह में कोयला मजदूरों के बीच लगातार काम करने की वजह से क्षेत्र में काफी लोकप्रिय हो गए। उन्होंने लोगों से शराब का बहिष्कार करने की अपील की। तीन बार गिरिडीह से निर्वाचित होने चतुरानन मिश्र को बिहार का लेनिन कहा जाने लगा। उनके आंदोलन से गांव में रहने वाले कई लोगों की जिन्दगी बदली। दो बार राज्यसभा सदस्य रहने के कारण सीपीआई में उनकी पकड़ काफी मजबूत बन गई। यही कारण है कि 1996 में जब वे मधुबनी से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे तो संयुक्त मोर्चा सरकार में एच.डी. देवेगौड़ा और आई.के. गुजराल के प्रधानमंत्रित्व काल में वे कृषि मंत्री बने। केंद्र में कृषि मंत्री रहने के दौरान उन्होंने देश में पहली बार राष्ट्रीय फसल बीमा योजना की शुरुआत की। जबकि विधायक रहते उन्होंने ही वृद्धावस्था पेंशन का प्रस्ताव बिहार विधानसभा में रखा था। वहीं देवगौड़ा सरकार में मंत्री रहते हुए चतुरानन मिश्र और इंद्रजीत गुप्त ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर संसद में पहली बार लोकपाल विधेयक पेश किया, पर ये पारित न हो सका।

मंडल कमीशन का समर्थन करने से लालू यादव का मिला साथ

चतुरानन मिश्र ऐसे कम्युनिस्ट नेता थे, जिन्होंने सरकारी नौकरियों में जाति आधारित आरक्षण (मंडल कमीशन) का खुला समर्थन किया। इस कारण उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का भी समर्थन मिला। इस वजह से चारा घोटाले मामले में सीपीआई के तमाम विरोध प्रदर्शन के बावजूद 1996 के लोकसभा चुनाव में चतुरानन मिश्र को लालू प्रसाद ने मधुबनी में समर्थन देने का काम किया था।

पिछड़े मुसलमानों को अनुसूचित जाति को सुविधा देने की मांग का समर्थन

मिथिला के ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के बावजूद चतुरानन मिश्र ने न केवल कम्युनिस्ट विचाराधारा को अपनाया, बल्कि आजीवन कम्युनिस्ट बने रहे। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था- जनता ने हमेशा इस देश की एक मजबूत धर्मनिरपेक्ष छवि बनाने में मदद की है। अक्टूबर में जब पिछड़े मुसलमानों को अनुसूचित जाति की सुविधा देने की मांग उठी, तो उन्होंने इसका खुलकर समर्थन किया। बिहार में बाढ़ के स्थायी समाधान को लेकर वे काफी चिंतित रहते थे।