बीबीसी डॉक्यूमेंट्री को लेकर घमासान, खिलाफत आंदोलन की कोख से निकली जामिया का इतिहास जानिए

नई दिल्ली: देश के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में से एक जामिया विश्वविद्यालय एक बार फिर चर्चा में है। यूं तो इस यूनिवर्सिटी से निकलने वाले लोगों ने देश-विदेश में झंडे गाड़ रखे हैं लेकिन विवादों से भी इसका खूब नाता रहा है। साल 1920 को अलीगढ़ से शुरू हुई यह संस्था और बाद में सेंट्रल यूनिवर्सिटी की उपाधि पाने वाले इस विश्वविद्यालय की चर्चा एक डॉक्यूमेंट्री को लेकर हो रही है। असल में गुजरात दंगे को लेकर बीबीसी की एक डॉक्यूमेंट्री है जिसे सरकार ने बैन कर दिया है। लेकिन आज वहां मौजूद छात्र संगठन ने शाम 6 बजे इसकी स्क्रीनिंग रखी थी। उससे पहले ही पुलिस फोर्स ने कुछ संगठन के कुछ छात्रों को हिरासत में ले लिया। जामिया गेट न. 7 के बाहर रैपिड एक्शन फोर्स और बाकी जवान लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। खिलाफत और असहयोग आंदोलन की कोख से जन्मी जामिया के बार में हम स्थापना से लेकर विवाद समेत हर वो चीज बताएंगे। गुजरात दंगों पर डॉक्यूमेंट्री और चर्चा में जामिया देश के सबसे प्रमुख विश्वविद्यालयों में से एक जामिया मिल्ली इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों का कहना है कि उन्हें गुजरात दंगों पर बनी बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री देखनी है। इसके लिए आज शाम 6 बजे उसकी स्क्रीनिंग रखी गई थी। इस डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग ऐसे समय पर रखी गई है जब केंद्र सरकार ने उसे बैन कर दिया है और जेएनयू में इसे लेकर पहले भी विवाद हो रहा है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लेफ्ट विचारधारा वाले छात्रों ने बैन के बावजूद इस डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग की। जिसके बाद माहौल बिगड़ गया और डॉक्यूमेंट्री देखने वाले लोगों का आरोप है कि ABVP के छात्रों ने जबरन लाइट बंद की और पत्थरबाजी हुई। जेएनयू के बाद अब जामिया भी इस विवाद में कूद गया है। हालांकि स्क्रीनिंग के पहले ही पुलिसवालों ने कुछ छात्रों को हिरासत में ले लिया। हिरासत में लिए जाने के बाद वहां मौजूद अन्य छात्रों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। इसके बाद स्क्रीनिंग पर कोई फैसला नहीं हो पाया है। वहीं जामिया प्रशासन ने कहा कि बिना किसी पर्मिशन के कोई भी स्क्रीनिंग या छात्रों की बैठक नहीं होगी। आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल की जादवपुर यूनिवर्सिटी में भी आज डॉक्यूमेंट्री दिखाने की योजना है। जामिया का इतिहास जान लीजिए देश की आजादी के लिए चलाए जा रहे असहयोग और खिलाफत आंदोलन से जन्मे जामिया विश्वविद्यालय की स्थापना साल 1920 में अलीगढ़ में एक संस्थान के रूप में की गई थी। जामिया के संस्थापकों की लिस्ट में अली ब्रदर्स यानि मोहम्मद अली जौहर और शौकत अली जौहर थे। वहीं इसकी आधारशिला स्वतंत्रता सेनानी रहे मौलाना मोहम्मद हसन ने रखी थी। आपको जानकर खुशी होगी कि जामिया की स्थापना में राष्टपिता महात्मा गांधी की भी अहम भूमिका थी। 1920 के बाद साल 1925 में इसे दिल्ली लाया गया। दिल्ली में इसे पहले करोल बाग शिफ्ट किया गया था। इसके बाद 1935 में इसे दिल्ली के ओखला लाया गया। 1936 में इसे नए कैंपस में शिफ्ट किया गया। यहीं जामिया के सभी संस्थान बनाए गए। साल 1988 में जामिया को संस्थान से विश्वविद्यालय का दर्जा मिल गया और तब से लेकर अबतक यह सेंट्रल यूनिवर्सिटी के रूप में स्थापित है। जामिया मिल्लिया का अर्थ है राष्ट्रीय विश्वविद्यालय। एक वक्त बंद करने की भी आ गई थी नौबत क्या आपको पता है कि देशभर में अपनी शिक्षा के लिए मशहूर जामिया पर कभी आर्थिक तंगी भी आई थी। जी हां एक वक्त ऐसा भी आया था जब जामिया को बंद करने की नौबत आ गई थी। तब जामिया को इस तंगी से उबारने के लिए स्वयं महात्मा गांधी ने कमान संभाली थी। उन्होंने तब कहा था कि वह जामिया को बचाने के लिए कटोरा लेकर भीख मांगने को भी तैयार हैं। जामिया के बारे में रवींद्रनाथ टौगोर और सरोजनी नायडू ने भी तारीफ की थी। रवींद्र नाथ ने कहा कि यह भारत के सबसे प्रगितशील संस्थानों में से एक है वहीं सरोजनी नायडू ने कहा कि तिनका-तिनका जोड़कर और कई कुर्बानियों के बाद जामिया का निर्माण किया गया है। जामिया और विवाद सीएए-एनआरसी के विरोध में बुलंद हुई आवाज जामिया विश्वविद्यालय जितना अपने एजुकेशन को लेकर मशहूर है वहीं दूसरी ओर विवादों से भी इसका गहरा नाता रहा है। केंद्र सरकार की ओर से लाए गए CAA-NRC कानून पर हुआ विवाद तो याद ही होगा। कई महीनों तक जामिया के पास शाहीन बाग की सड़क को जाम कर दिया गया था। एक विशेष समुदाय के लोगों ने इसके खिलाफ बिगुल फूंक दिया था। इस विरोध की आग जामिया तक भी पहुंची थी। दिसंबर 2019 में केंद्र सरकार सीएए-एनआरसी पर जैसे ही बिल लेकर आई। संसद से पैदा हुई विरोध के स्वर बाहर आ गए। 10 दिसंबर को आईडी ऑफ सिटीजनशिप पर चलने वाला यह कार्यक्रम दोपहर 2 बजे खत्म हो गया। इसके बाद बड़ी संख्या में छात्र जामिया परिसर में जमा हुए। बिल को विरोध में नारेबाजी के बाद यह प्रदर्शन खत्म हो गया। 13 दिसंबर को संसद तक मार्च करने का निर्णय लिया गया। इसकी सूचना सोशल मीडिया पर पहले ही दे दी गई थी। 13 दिसंबर को तय समय के अनुसार, जामिया के छात्र हाथ में तख्तियां लेकर विरोध प्रदर्शन करते हुए संसद की ओर बढ़ चले। कुछ दूर चलने के बाद छात्रों के समूह को पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स ने रोक लिया और लाठीचार्ज किया। दिल्ली पुलिस और छात्रों के बीच इस झड़प में आरोप यह भी था कि उनके जवान भी घायल हुए हैं। इसमें छात्रों को हिरासत में लिया गया और कुछ घायल भी हुए। इसके बाद आपको पता ही है कि कैसे CAA-NRC के विरोध की यह आग दिल्ली से पूरे देश में फैल गई थी। जामिया मे घुसी पुलिस और खूब हुआ हंगामा सीएए-एनआरसी का विरोध जामिया कैंपस में खूब देखा गया था। 17 दिसंबर के आस-पास की बात है। जामिया के छात्रों पर आरोप था कि उन्होंने सीएए-एनआरसी के विरोध में हिंसक प्रदर्शन किया। पत्थरबाजी की गई। रविवार को पुलिस जामिया कैंपस के अंदर चली गई। छात्रों का कहना था कि पुलिस ने लाइब्रेरी के अंदर घुसकर छात्रों के साथ मारपीट की। कई छात्र घायल हो गए। छात्रों ने बताया कि पुलिस ने बेरहमी से हमपर हमला किया। दरवाजे तोड़े, घुटने और सिर पर वार किए। छात्रों ने वीसी और पुलिस के खिलाफ खूब नारे लगाए गए थे। पूछा गया कि किसके आदेश पर पुलिस की एंट्री हुई थी। दिल्ली पुलिस का कहना था कि सीएए- एनआरसी के विरोध में छात्रों ने आगजनी और तोड़फोड़ की थी। इसके बाद पुलिस को एक्शन लेना पड़ा बीबीसी डॉक्यूमेंट्री पर अब भी बवाल बीबीसी डॉक्यूमेंट्री पर अब भी टेंशन जारी है। पुलिस का कहना है कि स्क्रीनिंग टाइम के बाद ही उन्हें रिहा किया जाएगा। वहीं छात्र संगठन के सदस्यों ने कहा कि जबतक हिरासत में लिए गए छात्रों को रिहा नहीं किया जाता तबतक डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग की जाएगी। हालांकि यह फैसला लिया है कि आज डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग नहीं की जाएगी। SFI ने हिरासत में लिए छात्रों के बाद यह फैसला लिया गया है।