जोशीमठ का दर्दः दोस्त सख़्त बीमार है, ज़रा दुआएं कीजिए

सुबह के 3 बज रहे हैं। बस ऋषिकेश में खड़ी है। ठंड बहुत है। ऋषिकेश में सुबह-सुबह गंगा को छूती हुई हवा सर्र सर्र बहती है। और यह तो फिर जनवरी का पहला हफ्ता है। गर्म कपड़ों के बावजूद ठंड बदन पर नश्तर सी अंदर तक घुस रही है। दिल्ली से गोपेश्वर वाली रोडवेज की यह बस दिल्ली के कश्मीरी गेट से रोज साढ़े आठ बजे छूटती है। सुबह ढाई से तीन बजे ऋषिकेश पहुंचकर दो घंटे रुकती है। सुबह चार बजे गेट खुलने के बाद बस ड्राइवर बदलकर चमोली के लिए चल पड़ती है। दिल्ली से चलने वाली यह बेहद औसत सी सरकारी बस एक तरह से सबसे कम किराए और समय में गोपेश्वर पहुंचने की एक्सप्रेस सेवा है। रात आठ बजे से अगली दोपहर 12 से 1 बजे तक बस में गुजारने होते हैं। यह दोपहर 12 बजे तक गोपेश्वर पहुंचेगी।

इसी बस में सफर किया है। इसलिए यात्रा इतनी कठिन मालूम नहीं पड़ रही। इसकी आदत सी हो गई है। इस बार यात्रा कुछ अलग है। चमोली में उतरकर बदरीनाथ वाले रास्ते पर आगे बढ़ूंगा। दोस्त सख्त बीमार है। उसका हालचाल लेने निकला हूं। इस दोस्त का नाम जोशीमठ है। शहर भी तो दोस्त जैसे होते हैं! नहीं क्या? किसी से बचपने की यारी रहती है। कोई सफर में मिल जीवन का गहरा हिस्सा बन जाता है। जोशीमठ से पहले कई दफे मिला हूं। औली के ऊपर गोरसों होते हुए लॉर्ड कर्जन ट्रैक की तरफ जाते हुए। बद्रीनाथ-माणा की तरफ निकलते हुए। उसके पास हर बार ठहरा हूं। मुझ जैसे न जाने कितने गुजरे होंगे, मिले होंगे जोशीमठ से। पता नहीं क्यों मुझे यह राजेश खन्ना की फिल्म आनंद का बाबू मोशाय लगता है। देह में कैंसर को पाले हुए है। लेकिन हरदम मुस्कुराता रहता है।

भगवान बद्रीविशाल के प्रदेश द्वार पर है जोशीमठ। चीन सीमा पर इसे आप आखिरी शहर भी कह सकते हैं। लेकिन इस दोस्त की हालत इनदिनों बेहद नाजुक दिख रही है। अलकनंदा और धौली के बाएं किनारे पर 30 से 40 डिग्री के ढलान पर बैठे जोशीमठ के बदन पर दरारें दिन-ब-दिन चौड़ी होती जा रही हैं। दो महीने से तो कंपा देने वाले लक्षण दिख रहे हैं। सुबह नींद खुलती है, जो जिस्म पर एक और दरार दिखती है। या पहले वाली और गहरी दिखती है।

क्या हो गया है जोशीमठ को! क्या भगवान विष्णु के छठे अवतार नरसिंह का शाप लग गया है इसे! क्या वह अभिशप्त कथा सच है जिसका जिक्र घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन 1953 के अपने यात्रा संस्मरण में एक जगह करते हैं। क्या राजा वासुदेवका के कर्मों का फल वह भोग रहा है? केदारखंड की सनत संहिता की वह भविष्यवाणी सच हो जाएगी क्या! जो कहती है कि नरसिंह की कमजोर होती दाईं भुजा टूटेगी और बद्रीनाथ का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाएगा! क्या यह सुंदर शहर शापित हो गया है। उजड़ना, बसना, डूबना ही इसकी किस्मत में बदा है!

जोशीमठ के जिस्म में भूधंसाव का यह कैंसर न जाने कब से पल रहा है। 1000 साल से! जैसा कुछ लिख गए हैं। लेकिन इसका पहला बड़ा लक्षण 1976 के मार्च की हल्की बारिश में दिखा। उसके शरीर पर पड़ी दरार पहली बार सबने देखी। तब दरार में एक पूरा डाक बंगला समा गया था। उसी साल अप्रैल में उसके इलाज के लिए मिश्रा कमिटी बनी। कुछ सख्त परहेज, दवाइयां और सिफारिशें सुझाई गईं। लेकिन इंसानी लालच में कौन परवाह करता इस गरीब की। उसे कंकरीट के बोझ से लाद दिया गया। उसके जिस्म में एक पूरी सुरंग घुसा दी गई। वह कराहता रहा। हंसते-हंसते दर्द सहता रहा। उसकी दरारें दिनोंदिन गहरी होती रहीं। लेकिन अब उसकी हालत बेहद नाजुक है। लग रहा है जोशीमठ का सब्र अब जवाब दे रहा है। क्या होगा इस प्यारे दोस्त का?

चार बज चुके हैं। बस निकल चुकी है।